झारखंड में बिना विधायी समीक्षा के बन रही नियमावली, विधानसभा पहुंचने में लग रहे हैं 9 साल

Updated at : 23 Dec 2023 3:06 AM (IST)
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झारखंड में बिना विधायी समीक्षा के बन रही नियमावली, विधानसभा पहुंचने में लग रहे हैं 9 साल

दिव्यांगजन के अधिकार को लेकर केंद्र सरकार ने वर्ष 2016 में कानून बनाया. कल्याण विभाग ने इस कानून के आलोक में वर्ष 2018 में नियमावली बनायी और पांच वर्ष बाद इसे विधानसभा के वर्तमान सत्र में रखा.

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आनंद मोहन, रांची :

केंद्रीय कानून के क्रियान्वयन के लिए नियम बनाने में राज्य सरकार को पांच से सात वर्ष लग रहे हैं. वहीं, इन कानूनों पर बननेवाली नियमावली को विधानसभा पहुंचने में नौ वर्ष लग जाते हैं. विभाग विधानसभा की समीक्षा के बिना ही उन नियमावली पर काम भी कर रहा है. बिना विधायी समीक्षा के कानून को लेकर नियमावली बन रही है. वर्तमान शीतकालीन सत्र में केंद्रीय कानून के आलोक में बनायी गयी चार नियमावली सदन पटल पर आयीं.

केंद्र सरकार ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण व कल्याण अधिनियम वर्ष 2007 में बनाया. राज्य सरकार को इस अधिनियम की धारा 32-एक के आलोक में नियमावली बनाना था. सात वर्ष बाद यानि 2014 में यह अधिनियम विधानसभा में रखा गया. विभाग द्वारा बनायी गयी नियमावली नौ वर्ष बाद यानि 2023 के इस शीतकालीन सत्र में सदन पटल पर रखी गयी. दिव्यांगजन के अधिकार को लेकर केंद्र सरकार ने वर्ष 2016 में कानून बनाया. कल्याण विभाग ने इस कानून के आलोक में वर्ष 2018 में नियमावली बनायी और पांच वर्ष बाद इसे विधानसभा के वर्तमान सत्र में रखा. इसी तरह जुबेनाइल जस्टिस को लेकर 2015 के केंद्रीय कानून में वर्ष 2016 में संशोधन हुआ.

संशोधित कानून के आलोक में नियमावली एक वर्ष बाद बन गयी, लेकिन विभाग इसे विधानसभा में रखना ही भूल गया. विधानसभा की प्रत्यायुक्त समिति ने जब जवाब मांगा, तो इसे वर्तमान सत्र में रखा गया. विधानसभा की प्रत्यायुक्त समिति ने इस संबंध में कई विभागों नियमावली बनाने में हो रही देरी और कानून को किस आधार, नियम-परिनियम के तहत लागू किया जा रहा है, पर जवाब मांगा है. प्रत्यायुक्त समिति के जवाब-तलब के बाद विभागों की नींद खुली है और सदन के पटल पर नियमावली रखी जा रही हैं.

विभागों को जानकारी नहीं नियमावली भेजना है विधानसभा

वर्षों तक नियमावली विधानसभा के पटल पर नहीं रखे जाने के बाबत संबंधित विभागों से जवाब-तलब किया गया. विभागों का जवाब था कि उन्हें पता ही नहीं था कि नियमावली को विधानसभा में भेजना है. कई विभागों ने कहा कि नियमावली को लेकर विधि-विभाग में मामला है. वहीं, कुछ विभागों ने बताया कि नियमावली छापेखाने में है, छप रही है. छप के आने के बाद उसे विधानसभा में रखा जायेगा.

कानून का नाम- कब बनी नियमवाली- विधानसभा में कब रखा

माता पिता व वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण तथा कल्याण अधिनियम-2007—2014-2023

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम-2016—2018-2023

जूबेनाइल जस्टिस, एक्ट-2015—2017-2023

झारखंड राज्यमार्ग नियमावली-2007—2011

झारखंड जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रीकरण नियमवाली-2009—2012

झारखंड उत्पाद होलोग्राम नियमावली-2011—2012

विभागों को नियमावली एक्ट के प्रावधान के अनुरूप बनाना है. नियमावली प्रावधान के अनुरूप है कि नहीं यह भी देखना विधानसभा का काम है. कानून बनाने का काम विधानसभा का है. लेकिन, विभाग अपने स्तर से नियमावली बना लेते हैं. कई बार कानून के इतर नियमावली होती है और मामला कोर्ट में फंसता है. कार्यपालिका का काम कानून के क्रियान्वयन का है. लेकिन, नियमावली के विरोधाभास के कारण उधेड़बुन की स्थिति होती है. हमने कई विभागों से जानकारी मांगी है कि नियमावली कब बनायी है और उसे कब विधानसभा में रखा गया है.

विनोद सिंह, सभापति, प्रत्यायुक्त समिति

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