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हेसालौंग में 1952 से हो रही दुर्गा पूजा

Updated at : 27 Sep 2025 6:39 PM (IST)
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हेसालौंग में 1952 से हो रही दुर्गा पूजा

मैक्लुस्कीगंज सहित पूरे कोयलांचल में दुर्गोत्सव की तैयारी अंतिम चरण पर है

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मैक्लुस्कीगंज. मैक्लुस्कीगंज सहित पूरे कोयलांचल में दुर्गोत्सव की तैयारी अंतिम चरण पर है, सभी जगहों पर पूजा पंडाल लगभग सज चुके हैं. मैक्लुस्कीगंज में हेसालौंग का पंडाल इस वर्ष श्रेष्ठ माना जाना रहा है. हेसालौंग निवासी त्रिबेनी साहू (92) के अनुसार हेसालौंग में एसके मित्रा नामक बंगाली परिवार ने बंगाल से पुरोहित बुलवाया था और विधि विधान से सन 1952 में दुर्गा पाठ शुरू किया था. एसके मित्रा के निधन के पश्चात पुत्र अजित मित्रा ने दुर्गा पाठ के लिए डेली फार्म नामक जगह में स्थान दिया. वरिष्ठ ग्रामीण 100 वर्षीय कमल साहू (100) व त्रिबेनी साहू के अनुसार 60 के दशक में हेसालौग गांव एवं आसपास के प्रबुद्धजनों ने पूजा का बीड़ा उठाया. हेसालौंग निवासी बलदेव साहू, शिवनारायण साहू, बंधु साहू, प्रयाग साहू, बंगाली साहू, बिरजू साहू, सरधन साहू, झूमक साहू, सोहराय मुंडा, भुखल मुंडा, जोराठी गंझू, कृष्णा गंझू (उक्त सभी अब नहीं रहे) सहित गांव के अन्य माननीयों ने आपसी सहमति व सहयोग से डेली फार्म से दुर्गा पाठ को शिफ्ट कर हेसालौंग गांव के बीचों बीच जगह देकर आयोजन को भव्य रूप दिया. इनके नेतृत्व में हेसालौंग में पहली बार मां दुर्गा व अन्य प्रमुख देवी-देवता की भी प्रतिमा स्थापित कर पूजा की गयी. उस समय वरिष्ठ पुरोहित महंगू पाठक के पुत्र चंदरु पाठक ने विधि से पूजा अनुष्ठान कराया. इस परंपरा को आज भी पुरोहित मनोज पांडेय निभा रहे हैं.

बाण सिंह देवता को दी जाती है बलि

हेसालौंग गांव के भोक्ता समाज के वरिष्ठों व पुजारियों के नेतृत्व में बाण सिंह की पूजा भी की जाती है. आह्वान के पश्चात बकरे की बलि दी जाती है. समाज के लोगों का मनाना है कि बाण सिंह देवता की पूजा विधि-विधान से करने से गांव में व्याप्त काली बुरी शक्तियों से रक्षा मिलती है. साथ ही अच्छी बारिश होती है व फसलों की पैदावार बढ़ती है. महामारी से बचाव कर गांव में खुशहाली छायी रहती है.

ऐतिहासिक है हेसालौंग में लगने वाला भूत मेला

ऐतिहासिक भूत मेला के साथ दुर्गोत्सव का समापन होता है. मेला का आयोजन कब से हो रहा है. इस बात की कोई ठोस जानकारी किसी के पास नहीं है. बुजुर्गों ने बताया कि भूत मेला का आयोजन पहले रात में होता था. काली शक्तियों की सिद्धि और अन्य तांत्रिक अनुष्ठान के लिए प्रसिद्ध इस मेला में विशेष शक्तिशाली लोगों का कब्जा हुआ करता था. रात में आयोजित होने वाले इस मेले में नवविवाहितों सहित बच्चों के प्रवेश पर पाबंदी थी. धीरे-धीरे स्थिति बदली मेला अब दिन में लगता है. रांची, लातेहार, लोहरदगा, हजारीबाग, रामगढ़ अन्य जगहों से माता रानी के दर्शन हेतु श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और लोग मेले में जम कर खरीदारी भी करते हैं. वहीं हेसालौंग व आसपास के गांवों की महिला, बच्चे, नौजवान व बुजुर्गों की मेला में भागीदारी रहती है.

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डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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ROHIT KUMAR MAHT

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By ROHIT KUMAR MAHT

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