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Durga Puja 2021 : बेलवरण पूजा के साथ रातू किला में शुरू होगी दुर्गा पूजा, आम लोगों के लिए कब खुलेगा द्वार

रातू किला में बांग्ला मतानुसार दुर्गा पूजा होती चली आ रही है. यहां रांची समेत बिहार, बंगाल, ओडिशा समेत अन्य राज्यों से लोग पहुंचते हैं. किला के मुख्य द्वार के पास का तोप लोगों को पुराने जमाने की याद दिलाता है. अंदर आते ही विशाल किला व मां दुर्गा का मंदिर दिखता है.

By Prabhat khabar Digital
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Durga Puja 2021 : रातू किला
Durga Puja 2021 : रातू किला
प्रभात खबर

Durga Puja 2021, रांची न्यूज (संजय कुमार) : शारदीय नवरात्र को लेकर रांची के रातू व आसपास के क्षेत्र में भक्ति का माहौल है. कोविड-19 के कारण सरकार के दिशानिर्देश के साथ दुर्गोत्सव की तैयारी की जा रही है. ऐतिहासिक रातू किला में प्रतिमा निर्माण को अंतिम रूप दिया जा रहा है. षष्ठी तिथि सोमवार (11 अक्तूबर) को शाम सात बजे से बेलवरण पूजा के साथ रातू किला में दुर्गा पूजा आरंभ होगी. सप्तमी मंगलवार (12 अक्तूबर) को नव पत्रिका पूजन के बाद सुबह 10 बजे रातू किला का मुख्य द्वार आम लोगों के लिए खोल दिया जायेगा. कोविड-19 के दिशानिर्देश का पालन करते हुए भक्त मां दुर्गा का दर्शन कर किला का अवलोकन कर सकेंगे.

अष्टमी तिथि बुधवार (13 अक्तूबर) को रात्रि 11.41 बजे संधि पूजा तथा नवमी तिथि गुरुवार (14 अक्तूबर) को दोपहर एक बजे विशेष पूजा कर शाक्त बलि प्रदान की जायेगी. दशमी शुक्रवार (15 अक्तूबर) को शाम पांच बजे महाराजा तालाब में प्रतिमा का विसर्जन कर किला का मुख्य द्वार आम लोगों के लिए बंद कर दिया जायेगा. किला के दामोदर मिश्रा ने बताया कि कोरोना संक्रमण के कारण इस वर्ष किला के सामने मेला नहीं लगाया जायेगा. किला के अंदर सीमित संख्या में श्रद्धालुओं के प्रवेश की अनुमति दी जाएगी.

रातू किला में बांग्ला मतानुसार दुर्गा पूजा होती चली आ रही है. यहां रांची समेत बिहार, बंगाल, ओडिशा समेत अन्य राज्यों से लोग पहुंचते हैं. किला के मुख्य द्वार के पास का तोप लोगों को पुराने जमाने की याद दिलाता है. अंदर आते ही विशाल किला व मां दुर्गा का मंदिर दिखता है. भक्त माता का दर्शन कर किला, सौ वर्ष पुरानी धूप घड़ी, गार्डन समेत विभिन्न प्रजाति के पक्षी का अवलोकन करते हैं.

रातू किला में दुर्गा पूजा का आयोजन नागवंश के प्रथम महाराजा फणि मुकुट राय के समय से हो रहा है. मूर्ति पूजा करीब 170 वर्षों से हो रही है. इससे पूर्व कलश स्थापित कर पूजा की जाती थी. उस परंपरा को महाराजा चितामणि शरण नाथ शाहदेव व युवराज गोपाल शरण नाथ शाहदेव ने कायम रखा. उनके निधन के बाद महाराजा की पुत्रवधु विदर्शनी शाहदेव व पुत्री माधुरी, कल्पना कुमारी देवी परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं.

Posted By : Guru Swarup Mishra

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