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सिगरेट के पैकेट से भी कम कीमत पर बेची जाती हैं बेटियां : कैलाश सत्यार्थी

Updated at : 22 May 2017 6:01 PM (IST)
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सिगरेट के पैकेट से भी कम कीमत पर बेची जाती हैं बेटियां : कैलाश सत्यार्थी

रांची : सपनों का टूटना बुरा होता है, उस पर से अगर वह सपना किसी बच्चे का हो तो वह बहुत ही बुरा होता है. उक्त बातें आज नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने कही. वे झारखंड राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग और ‘सेव दि चिल्ड्रेन’ की तरफ से आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे. […]

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रांची : सपनों का टूटना बुरा होता है, उस पर से अगर वह सपना किसी बच्चे का हो तो वह बहुत ही बुरा होता है. उक्त बातें आज नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने कही. वे झारखंड राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग और ‘सेव दि चिल्ड्रेन’ की तरफ से आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे.

कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि झारखंड से मैंने अपने काम की शुरुआत की थी. हालांकि उस वक्त यह झारखंड राज्य नहीं था. यहां से कई लड़कियों को बाहर भेजा जाता है, जहां उन्हें बेच दिया जाता है और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि एक सिगरेट के पैकेट से भी कम कीमत पर बेटियों को बेचा जाता है.

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यह दुखद है और यह स्थिति 16वीं या 17वीं सदी की नहीं हैं, बल्कि आज की है. आज भी हमारे समाज में बच्चों के अधिकार सुनिश्चित नहीं है. उनका शोषण हो रहा है. उन्होंने एक घटना के जिक्र करते हुए बताया कि लगभग डेढ़ साल पहले गुमला की लड़की के पिता ने हमसे संपर्क किया. उनकी बेटी वर्षों से मिल नहीं रही थी. वे उसे ढूंढ कर परेशान थे. काफी परिश्रम के बाद के दिल्ली के इलाके से वह लड़की मिली. जब वह लड़की मिली, तो वह हमसे या अपने पिता से बात नहीं करना चाह रही थी. कारण यह था कि वह गर्भवती थी. कई लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया था. वह कह रही थी कि मैं गंदी हो चुकी हूं. हम यह सोच रहे थे कि कैसे उसके पिता को बता पायेंगे कि उसकी बेटी के साथ क्या हुआ है.

यह स्थिति हमारे समाज में आज भी व्याप्त है. इसलिए जरूरी है कि आज बाल अधिकार के लिए धरातल में योजनाएं बनायीं जायें और उनका कार्यान्वयन हो. कार्यालय में बैठकर इस संबंध में योजनाएं नहीं बनायी जा सकतीं, क्योंकि ऐसी योजनाएं सफल नहीं होतीं हैं, तब इस योजना पर कार्य करने वालों पर सवाल उठाया जाता है.

गौरतलब है कि कैलाश सत्यार्थीं दो दिवसीय दौरे पर रांची आये हैं. वे कल विधानसभा के कार्यक्रम में भी शिरकत करेंगे. वर्ष 2014 में सत्यार्थी को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया था. इन्होंने बाल अधिकारों को सुनिश्चित करने और बाल श्रम के विरोध में पुरजोर आंदोलन चलाया. आज इनके ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ की गूंज विश्व भर में सुनाई देती है.

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