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आधुनिक विकास की धारा में खत्म हो रही है नैतिकता : फेलिक्स पडेल

प्रवीण मुंडा रांची : क्रमिक विकासवाद का सिद्धांत दुनिया को देनेवाले चाल्र्स डार्विन के परपोते फेलिक्स पडेल शनिवार को रांची पहुंचे. वे एक मानव विज्ञानी हैं. उन्होंने आउट ऑफ दिस वर्ल्ड, द सेक्रिफाइस ऑफ ह्यूमन बीइंग : ब्रिटिश रूल एंड द कोंड्स ऑफ ओड़िशा सहित अन्य पुस्तकें लिखी है. वे पिछले कई वर्षो से ओड़िशा […]

प्रवीण मुंडा
रांची : क्रमिक विकासवाद का सिद्धांत दुनिया को देनेवाले चाल्र्स डार्विन के परपोते फेलिक्स पडेल शनिवार को रांची पहुंचे. वे एक मानव विज्ञानी हैं. उन्होंने आउट ऑफ दिस वर्ल्ड, द सेक्रिफाइस ऑफ ह्यूमन बीइंग : ब्रिटिश रूल एंड द कोंड्स ऑफ ओड़िशा सहित अन्य पुस्तकें लिखी है. वे पिछले कई वर्षो से ओड़िशा के आदिवासियों पर शोध कर रहे हैं. प्रस्तुत है उनसे बातचीत का मुख्य अंश:
आप ओड़िशा में संभवत: दस वर्षो से काम कर रहे हैं इसकी शुरुआत कैसे हुई?
इसका जवाब आसान नहीं है. आप कह सकते हैं कि इंडीजिनस या ट्राइबल सोसाइटी मुङो आकर्षित करती है. इसी वजह से मैं ओडिशा आया. वहां के आदिवासियों के जीवन व परिस्थितियों को समझने के लिए. उनके बारे में अध्ययन करने के लिए आया.
ओड़िशा में आदिवासियों के बीच काम करने का अनुभव कैसा रहा?
शिक्षाविद, राजनीतिज्ञ व अन्य लोग कहते हैं कि आदिवासी पिछड़े हैं. दरअसल आदिवासी मुख्यधारा के समाज से अलग है. मुख्यधारा के समाज में प्रतिस्पर्धा है.आदिवासी समाज में सहभागिता की भावना अधिक है. एक दूसरे से शेयरिंग की भावना है. शेयरिंग प्रतिस्पर्धा से हमेशा बेहतर है. हां आदिवासी समाज में गरीबी है. और इसका कारण है उनका शोषण.
औद्योगिकीकरण को विकास से जोड़कर देखा जाता है. आपकी नजर में विकास की क्या परिभाषा है?
आजकल विकास का क्या मतलब है? क्या सिर्फ थोड़ी सड़कें बना देने या कारखानों को बनाना विकास है? भारत में आजादी के इतने वर्षो के बाद भी क्या विकास हुआ है? समुदाय का विकास हुआ या नहीं? लाइफ की क्वालिटी सुधरी या नहीं इस पर बात नहीं की जाती.
सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. सुरक्षा किन लोगों को मिल रही हैं? जो पूंजीपति हैं. या जो प्रभावशाली लोग है. आम लोग की सुरक्षा अब भी एक सवाल ही है.
माओवादियों का दावा है कि वे जनता के मुद्दों पर संघर्ष कर रहे हैं.
माओवादियों का अपना दावा है कि वे आदिवासियों या जनता के मुद्दों को उठा रहे हैं. ऐसा ही दावा कुछ और लोग भी करते हैं. पर हो क्या रहा है. क्या आदिवासी या आम लोगों के मुद्दे उठ रहे हैं? ऐसा नहीं दिखता है.
आप विकास को किस तरह से परिभाषित करते है?
चाल्र्स डार्विन ने दुनिया को कॉन्सेप्ट ऑफ इवोल्यूशन दिया. कैसे हजारों प्रजातियां विकसित होती है. किस तरह से चिंपैंजी से इंसान बना. जहां तक विकास की बात है इस मामले में आदिवासी समाज रास्ता दिखा सकता है. यहीं रास्ता सबसे ज्यादा सस्टेनेबल है.
आदिवासी समाज चीजों का इस्तेमाल जरूरत के हिसाब से करता है. वहां लालच नहीं है. वे उतना ही लेते हैं जितनी जरूरत है. विकास की वर्तमान धारा जो इस समय दुनिया में चल रही है वह सस्टेनेबल नहीं है. यह धारा आदिवासी समाज को भी खत्म कर रही है.
क्या विकास का इनसान की नैतिकता से कोई संबंध है? क्या आप मानते हैं कि जैसे जैसे इनसान विकसित हो रहा है उसकी मानवीयता खत्म हो रही है?
बिल्कुल. तथाकथित विकास की इस धारा से नैतिकता कम हो रही है. आदिवासी समाज में नैतिकता सबसे ज्यादा है. पर जब आज से डेढ़ दो सौ वर्ष पूर्व ब्रिटिश यहां आये तो नैतिकता कम होने लगी. यह अब लगातार कम हो रही है.
क्या औद्योगिकीकरण से बेरोजगारी दूर हो सकती है?
बिलकुल नहीं. बल्कि इससे समुदाय व गांव खत्म हो रहे हैं. पारंपरिक रोजगार खत्म हो रहे हैं. औद्योगिकीकरण से सबसे ज्यादा आदिवासी समाज व उनकी पारंपरिक व्यवस्था को हुआ है.
आपने लिखा है कि खनन उद्योग असली विकास का प्रतिनिधित्व नहीं करता?
खनन उद्योग क्या है? मेरे एक पूर्वज इंगलैंड में कोयला खदान के मालिक थे. वे समझते थे कि खदान से लोगों को रोजगार दे रहे हैं. पर उस कोयला खदान के आसपास बड़ी संख्या में बेरोजगार लोग रहते थे जो बुरी हालत में थे.
वेल्स में आज से 250 वर्ष पूर्व हजारों लोग खदानों की वजह से प्रभावित हुए. उनके बारे में नहीं सोचा गया. खनन उद्योग से मुनाफे के बारे में अधिक सोचा जाता है न कि वहां के कामगारों के बारे में. औद्योगिकीकरण और मुनाफा तभी संभव होता है जब इसानों का बलिदान हो.
चाल्र्स डार्विन ने क्रमिक विकासवाद का सिद्धांत दिया था. यह बताये कि मनुष्य जाति का क्या भविष्य देखते हैं?
चाल्र्स डार्विन ने जब क्रमिक विकासवाद की बात कही तो उनको बड़ा संकोच था. उनके कई दोस्त क्रिश्चियन थे जो यह मानते थे कि ईश्वर ने मनुष्य को बनाया है. डार्विन की थ्योरी थी कि मनुष्य चिंपैंजी से इनसान बना.
जानवर व इनसानों में कई तरह की समानताएं है और कई तरह के फर्क भी. इनसान को फिर से प्रकृति से सीखना होगा. उसके अनुरूप जीना होगा. अगर नहीं सीखे तो तो फिर इनसान की नियति तय है वह खत्म होगा.
Prabhat Khabar Digital Desk
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