वेलेंटाइन डे पर विशेष : प्रेम प्रकृति में सबसे शक्तिशाली, संपूर्ण सृष्टि ईश्वर के प्रेम पर आधारित

By Prabhat Khabar Digital Desk
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प्रेम क्या है. इस विषय पर वेलेंटाइन डे की पूर्व संध्या पर प्रभात खबर की वरीय संवाददाता लता रानी ने योगदा सत्संग मठ के संन्यासी स्वामी ईश्वरानंद जी से लंबी बातचीत की. उन्होंने प्रेम की परिभाषा का विस्तृत वर्णन बखूबी दिया़ पेश है संन्यासी स्वामी ईश्वरानंद से विस्तृत बातचीत.
प्रेम के बारे में उनका कहना है प्रेम प्रकृति में सबसे शक्तिशाली है , उन्होंने कहा था संपूर्ण सृष्टि ईश्वर के प्रेम पर आधारित है लेकिन आज हम जिस प्रेम की बात कर रहें हैं उसे समझना कठिन है. इस प्रेम को समझने से पहले यह समझना होगा कि ये दिव्य प्रेम ना शरीर पर आधरित है ना ही शारीरिक आकर्षण पर. दिव्य प्रेम का आधार ईश्वर है. योगानंद जी का कहना है हम दिव्य प्रेम या ईश्वर को प्रेम करे, या उसे ईश्वर कहे, क्योंकि ईश्वर ही प्रेम है.
मेरे प्रति प्रेम रहेगा, तो मैं तुम्हारे साथ रहूंगा
दयामाता जी योगानंद की शिष्या थी, गुरुजी के बाद योगदा सत्संग सोसाइटी की तीसरी अध्यक्ष बनीं. संस्था में उन्होंने 20 साल योगदान दिया. सात मार्च 1952 को योगानंद जी ने अपना शरीर छोड़ दिया.
छह मार्च को उन्होंने दया माता को यह बता दिया था. उन्हें कहा था कि तुम्हें पता है कि मैं धरती पर कुछ ही घंटे रहूंगा, दयामाता बहुत दुखी हुई. कहा : इस संस्था में आपकी जगह कौन ले सकता है, तो उन्होंने कहा जब मैं नहीं रहूंगा तो केवल प्रेम ही वह जगह ले सकता है. मेरा शरीर नहीं भी रहे पर तुम्हारे मन में प्रेम रहे तो मैं रहूंगा. संत और ईश्वर एक होते हैं.जो संत हाेते हैं वो ईश्वर के साथ एक होते हैं. तुम्हारे मन में मेरे प्रति प्रेम रहेगा तो मैं तुम्हारे साथ रहूंगा.
भारत की संस्कृति में प्रेम, ईश्वर को अगर पाना हो प्रेम का होना जरुरी
भारतीय संस्कृति में भक्ति संप्रदाय में महान संत हुए. मीराबाई , संत तुलसी दास , रविदास . भगवान कृष्ण के जीवन काल में गोपियां थी. भारत संस्कृति में ईश्वर के प्रति भक्ति और प्रेम बहुत प्रचलित है. कोई नयी बात नहीं है.
यहां तक की हमारे संत चाहे किसी भी मार्ग के हो, उन सब ने यही कहा कि ईश्वर को अगर पाना हो प्रेम का होना आवश्यक है. ईश्वर को पाने के चार मार्ग है- ज्ञान मार्ग , कर्म योग मार्ग, भक्ति मार्ग, ध्यान योग मार्ग . लेकिन इन चारों मार्गों में बताया जाता है कि ईश्वर पाने में भक्ति के बिना ईश्वर प्राप्त नहीं हो सकती . ईश्वर के लिए प्रेम इतना महत्वपूर्ण है आधात्मिक मार्ग में. ये चार मार्ग अंत में प्रेम की ओर ले जाते हैं.
प्रेम ईश्वर ही है क्योंकि वाे हमारे अंदर ही हैं. हमारे सृष्टा है. इसलिए हम किसी से प्रेम कर पाते हैं. नहीं तो हमारे अंदर एक जड़ हो जायेगा. हम पत्थर हो जायेगे. संपूर्ण सृष्टि प्रेम की ही लीला है. यह हमारे शास्त्रों में भी लिखा गया है.
इसलिए एक दूसरे से प्रेम करना नेचुरल है. लेकिन जब इसमें स्वार्थ आ जाता है, तो प्यार में क्रोध व भय आ जाता है, प्रेम भय में बदल जाता है. योगानंद जी का कहना है कि भगवान अनेक रूपों में है. वे ही अनेक रूप में प्रेम कर है. इसके द्वारा वापस अपनी ओर बुला रहे हैं. उसको पहचानो वहां अनंत प्रेम है, ये है प्रेम का संपूर्ण स्वरूप .
समाज प्रेम को बुरा नहीं मानता. यहां लड़के-लड़की के वेलेंटाइन बनने पर इसलिए बुरा माना जाता है कि पाश्चात्य समाज में तो इसकी स्वीकृति है. पर भारतीय समाज में इसलिए नहीं माना जाता है क्योंकि हमारे लिए नयी बात है.
इसे समाज के लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. क्योेंकि हमारी संस्कृति व संस्कार यही है कि लड़की-लड़का अलग रहेंगे. शादी के बाद ही मिलने की स्वीकृति है. वाे सही भी है लेकिन भारत में अरेंज मैरेज होते हैं. शादियां बनती है. उसकी रिवाज है, वही एक तरीका है इन्हें मिलाने का. लड़के लड़की को बहुत स्वतंत्रता दे जायेगी तो उन्हें कैसे कैसा पार्टनर मिल जायेगा, जात पात और धर्म का भी डर रहता है. यही डर का कारण है.
एक लड़का लड़की प्रेम करते है तो आगे चल कर शादी करेंगे. लेकिन भारत में एक लड़का लड़की की शादी नहीं होती, दाे दो परिवारों की भी शादी होती है. दोनों परिवार मिलकर कई काम करते हैं . लड़के लड़की का परिवार देखा जाता है कि दोनों मिल पायेगा कि नहीं यह एक सामाजिक प्रथा है और इसमें परिवर्तन तो आते रहेंगे.
भारतीय संस्कृति में रामायण व महाभारत में स्वंयर रचाने की प्रथा थी. अब ये कहां सुनते हैं. भारतीय संस्कृति में गंधर्व विवाह होता था. अब परिवर्तन आया है. परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं. इसलिए हम इसे बुरा मानते हैं.
भारतीय संस्कृति भी यही कहती है, हम लोग भी स्वीकार करते हैं. संत महात्मा भी इस बात को स्वीकार करते हैं. शारीरिक संबंध विवाह के बाद ही ठीक है. जब तक इसे व्यक्ति आपस में कमिट न दे, आपस में हम जीवन में साथ रहेंगे. तब तक शारीरिक संबंध सही नहीं है. यह केवल हिंदू धर्म में ही नहीं हर धर्म में है. इससे कई तरह के यौन रोग, बड़ी बीमारियों से बचा जा सकता है. समाज ने नियम बनाये हैं.लेकिन शादी के पहले लड़के लड़की को नहीं मिलना चाहिए.
फ्रेंडशिप नहीं करनी चाहिए, ये भी सही नहीं है. जिसे व्यक्त को जानते नहीं उनके साथ जीवन कैसे बिता दे. पहले तो ऐसा नहीं था पर अब तो युवाओं को मौका देना चाहिए लेकिन यह याद रखना चाहिए कि हद पार ना हो. योगानंद जी ने कहा है कि आप अगर किसी के प्रति आकर्षित हो रहे हैं, तो कम से कम एक साल तक एक दूसरे को समझने की जरूरत है. अगर दोनों का मन नहीं मिल रहा हो तो शादी के पहले ही अलग हो जाना चाहिए.
ब्वॉय फ्रेंड-गर्ल फ्रेंड का प्रेम आकर्षण होता है
साधारण प्रेम, जैसे प्रति पत्नी का प्रेम , ब्वॉय फ्रेंड, गर्ल फ्रेड का प्रेम अफेक्शन होता है. वो आकर्षण होता है. शारीरिक आकर्षण होता है. अधिकतर लोग वेलेंटाइन इसी पर फोकस करते हैं, यह कोई गलत बात नहीं. ये शारीरिक आकर्षण ही प्रेम का माध्यम बन सकता है. इस कारण सच्चा प्रेम हो सकता है. लेकिन अगर कोई कपल अपना प्रेम शारीरिक आकर्षण तक ही रखते है, तो वो प्रेम ज्यादा दिन चलता नहीं है.
इसलिए वास्तव में प्रेम का सच्चा स्वरूप क्या है. यह समझना जरूरी है. किस तरह के वातावरण में प्रेम जीवित रहता है और किस तरह के वातावरण में प्रेम मर जाता है. मित्रता के क्या लक्षण है, एक तो स्वार्थ पर आधारित नहीं होना चाहिए. अगर स्वार्थ पर आधारित है तो बहुत दिनों तक प्रेम नहीं बच सकता है. ईर्ष्या प्रेम को खत्म कर देती है. वही प्रेम में स्वतंत्रता भी जरूरी है.
भारत पुरुष प्रधान देश है तो यहां पत्नी को ही सुनना चाहिए, यह मान्यता है. पर भारतीय पुरुषों को समझना जरूरी है कि आपस में सम्मान होना चाहिए . एक दूसरे के प्रति लाॅयलिटी होनी चाहिए. लाॅयलिटी का मतलब होता है, जाे वचन दिया है उसे निभाना, किसी और से संबंध नहीं बनाना. आपके पार्टनर में कुछ कमियां हो सकती है पर ये जानना चाहिए कि यहां कोई भी परफेक्ट नहीं होता. योगानंद जी का कहना है कि यदि हम इन सब बातों को फॉलो करेंगे तो प्रेम बढ़ता है.
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