चारा घोटाला मामला : सीबीआइ के विशेष कोर्ट में लालू प्रसाद से पूछे गये 34 सवाल

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date
सवाल : घोटाले की जांच की मांग पर मंत्री का विभाग क्यों बदला
जवाब : कई मंत्रियों के विभाग बदले थे, तो उनका भी बदला
लालू अदालत में पहुंचे तो मची अफरा-तफरी
रांची : सीबीआइ के विशेष न्यायाधीश एसके शशि की अदालत में गुरुवार को पशुपालन घोटाला से जुड़े सबसे बड़े मामले (कांड संख्या आरसी - 47 ए /96) में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सह राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद का बयान दर्ज किया गया. रिम्स से कोर्ट पहुंचने पर उनके समर्थकों और आम लोगों की भीड़ पहुंची थी. लालू जैसे ही अदालत में पहुंचे, वैसे ही परिसर में अफरा-तफरी की स्थिति बन गयी़ लोग उन्हें देखने के लिए सीबीआइ कोर्ट के प्रथम व दूसरे तल्ले पर भी खड़े थे़
इस मामले मामले में अगली सुनवाई 20 जनवरी को होगी़ लालू प्रसाद ने सीबीआइ की ओर से पूछे गये 34 सवालों का जवाब दिया. पशुओं को कार, टेंपो, स्कूटर व जीप से ढाेने के अलावा अन्य महत्वपूर्ण सवाल पूछे गये. उन्होंने कहा कि मैंने जांच का आदेश दिया था़ घोटाले की जानकारी होने के बाद 1990 में तत्कालीन पशुपालन मंत्री रामजीवन सिंह ने सीबीआइ से जांच कराने की मांग की थी, लेकिन उनका विभाग ही बदल दिया गया़ इस पर लालू ने कहा कि कई मंत्रियों के विभाग बदले गये थे. इसी क्रम में उनका भी विभाग बदला गया था.
Qआपने गवाहों का बयान समझा है?
जवाब : हां.
Q1990 से 1997 के बीच आप मुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री थे?
जवाब : हां मैं मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री था़
Qआपने पशुपालन विभाग के पदाधिकारियों एवं अन्य लोगों के साथ मिलकर साजिश कर 139. 35 करोड़ रुपये की निकासी कपटपूर्वक करने में सहायता पहुंचाई?
जवाब : ऐसा नहीं है़ मैंने निकासी में कोई सहायता नहीं पहुंचायी थी.
Qआपको यह मालूम है कि उक्त रुपये का इस्तेमाल नेताओं व पदाधिकारियों की सुविधा के लिए हवाई टिकट खरीदने तथा होटल खर्च में भी किया गया है?
जवाब : हमें जानकारी नहीं है़ सीएम के नाते एयर टिकट क्यों लेंगे़
Q पांच अक्तूबर 1990 को अकाउंटेंट जनरल ने कपटपूर्वक निकासी बतायी थी, जिसमें पशुओं को कार, स्कूटर, टेंपो, जीप से ढोने की बात कही थी?
जवाब : ऐसी बात नहीं है. हमने उचित जांच का आदेश दिया था़
Q अवैध ट्रांसपोर्ट के संबंध में निगरानी द्वारा केस संख्या-34/90, दिनांक 9 अगस्त 1990 को पशुपालन विभाग के अधिकारियों एवं आपूर्तिकर्ता के विरुद्ध रजिस्टर्ड किया था जिसकी जानकारी आपको थी लेकिन आपने कोई कदम नहीं उठाया?
जवाब : मैंने उचित कार्रवाई का निर्देश दिया था़
Qआपके सचिवालय में निगरानी जांच की संचिका काफी दिनों तक पड़ी रही, आपने निगरानी जांच का आदेश लोक लेखा जांच समिति को ही दिया, क्यों?
जवाब : लोक लेखा जांच समिति, संवैधानिक जांच समिति है जिसमें विपक्ष के नेता भी रहते है़ं इसलिए जांच के लिए वहां भेजा गया़
Qतत्कालीन पशुपालन मंत्री रामजीवन सिंह ने 18 अगस्त 1990 को पशुपालन घोटाले की जांच के लिए सीबीआइ जांच की मांग की थी, लेकिन सह अभियुक्त जगन्नाथ मिश्रा के साथ मिल कर सीबीआइ जांच नहीं करायी गयी. बल्कि क्षेत्रीय विकास अधिकारी एमसी सुवर्ण ने जांच के लिए लिखा. उस समय जगन्नाथ मिश्रा के एक रिश्तेदार पशुपालन के क्षेत्रीय निदेशक केएन झा थे?
जवाब : ऐसी बात नहीं है़ पशुपालन सचिव कमला प्रसाद ने बताया था कि सीबीआइ के डायरेक्टरों ने ऐसे केस को लेने से इनकार किया था़
Qआपने पशुपालन मंत्री रामजीवन सिंह का विभाग क्यों बदल दिया?
जवाब : ऐसी बात नहीं है़ कई विभागों के मंत्री बदलते रहते हैं. इसी क्रम में उनका विभाग भी बदला गया था़
Qवित्त विभाग के विरोध के बावजूद आपने
श्याम बिहारी सिन्हा व आरपी दास का सेवा विस्तार किया?
जवाब : ऐसी बात नहीं है. जगन्नाथ मिश्रा की अनुशंसा पर नियमानुसार सेवा विस्तार किया गया था.
Qकई बार विधान परिषद में सदस्य कृपानंद पाठक, शत्रुघ्न प्रसाद सिंह और सुशील मोदी आदि के द्वारा पशुपालन विभाग में चल रहे मामले को उठाया गया. लेकिन इसे यह कह कर टाल दिया गया कि यह जांच लोक लेखा समिति कर रही है?
जवाब : लोक लेखा समिति संवैधानिक संस्था है़ जिसमें विरोधी पक्ष के भी सदस्य होते है़ं सभी पार्टियों के एक-एक सदस्य होते है़ं इसलिए जांच की जिम्मेदारी लोक लेखा समिति को दी गयी थी.
Qजगदीश शर्मा के साथ मिल कर चारा घोटाला जांच को रोका गया?
जवाब : ऐसा कुछ भी नहीं है.
Qजानबूझ कर पशुपालन विभाग में चल रहे अवैध निकासी को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाया?
जवाब : ऐसी बात नहीं है. एजी,डीसी या फाइनेंस डिपार्टमेंट ने नहीं बताया था़
Qएसडी शर्मा ने आरके राणा के माध्यम से पांच लाख, एक लाख और एक करोड़ रुपये विजय मलिक के द्वारा आपको दिये गये थे. वहीं, आरके राणा ने आपको 1996 में 10 करोड़ रुपये दिये थे?
जवाब : ऐसा कुछ नहीं है और किसी से रुपये नहीं लिए है़ं इसका जवाब आरके राणा ही दे सकते है़ं हम नहीं दे सकते़
Qजब चारा घोटाला उजागर हुआ तो आपने हिचकिचाते हुए मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया?
जवाब : ऐसी बात नहीं है़ जैसे ही यह मामला वित्त विभाग द्वारा मेरे सामने लाया गया मैंने केस करने का आदेश दिया था.
Qआपको गवाही देनी है?
जवाब : हां. सीबीआइ ने मेरी छवि को बदनाम करने के लिए झूठा मुकदमा किया है़
दुमका कोषागार से निकासी मामले में हुई है 14 साल की सजा
लालू का चारा घोटाले के पांचवें मामले (आरसी - 47 ए /96) में गुरुवार को बयान दर्ज हुआ़ दुमका, देवघर और चाईबासा कोषागार के दो मामले में सीबीआइ कोर्ट ने सजा सुनायी है़ अवैध निकासी के दुमका (आरसी - 38 ए /96)मामले में 14 तथा चाईबासा के दो मामले (आरसी - 20 व 68 ए /96) में लालू को पांच-पांच साल की सजा हुई है़ देवघर कोषागार से जुड़े मामले में साढ़े तीन साल की सजा सुनाई गयी थी़ मालूम हो कि लालू प्रसाद को 17 मार्च 2018 को पहले रिम्स, फिर दिल्ली एम्स में भर्ती किया गया था. कोर्ट ने 11 मई को इलाज के लिए छह हफ्ते की मोहलत देते हुए उनका पेरोल मंजूर किया था. इसके बाद कोर्ट ने 30 अगस्त को लालू को कोर्ट में सरेंडर करने का निर्देश दिया.
पॉकेटमारों ने नेता व पत्रकार सहित कई को बनाया निशाना
अदालत में चप्पे-चप्पे पर पुलिसकर्मी तैनात थे. इसके बावजूद पॉकेटमारों ने अपना काम कर लिया़ राजद के प्रदेश महासचिव विनोद सिंह यादव का पर्स चुरा लिया. पर्स में 25 हजार रुपये, चार एटीएम कार्ड, पैन व आधार कार्ड थे. इसके अलावे रंजन कुमार का मोबाइल व पत्रकार राणा प्रताप का पर्स (महत्वपूर्ण दस्तावेज) पर हाथ साफ कर दिया. इसके अलावा कई लोगों के पर्स उड़ाने की सूचना है.
कोर्ट परिसर में थे सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
लालू प्रसाद की पेशी को लेकर कोर्ट परिसर में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये गये थे. चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल तैनाती थी़ कोर्ट परिसर पुलिस छावनी में तब्दील हो गया था़ कोर्ट के बरामदे में एक लाइन से दोनों ओर दो डीएसपी के नेतृत्व में पुलिसकर्मी तैनात थे़
और क्या-क्या कहा
पशुओं को कार, टेंपो, स्कूटर व जीप से ढोने के बारे मेें पूछे गये प्रश्न, कहा : जांच का आदेश दिया था
सदर डीएसपी के वाहन से ले जाया गया कोर्ट
रांची : बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव की पेशी गुरुवार को सिविल कोर्ट में होनी थी. सुबह 9.20 बजे राजद विधायक भोला यादव रिम्स पहुंचे.
इसके बाद लगभग 10 बजे लालू यादव रिम्स से राजद विधायक भोला यादव और डॉक्टर के साथ बाहर निकले. उन्हें जिस वाहन से पेशी के लिए ले जाना था, वह समय पर नहीं पहुंच पाया. स्थिति को देखते हुए तुरंत सदर डीएसपी के वाहन से कोर्ट ले जाने का आदेश हुआ. वाहन में लगे बोर्ड को आनन-फानन में पुलिसकर्मी ने ढंका. इसी बीच वो गाड़ी भी पहुंच गयी, जिससे उन्हें ले जाना था. लेकिन तब तक लालू प्रसाद सदर डीएसपी के वाहन में बैठ चुके थे. काफिले के साथ एंबुलेंस भी थी.
राष्ट्रीय अध्यक्ष ने विस्तार से जवाब दिया : भोला
कोर्ट से लौटने के बाद लालू यादव को रिम्स में छोड़ कर बाहर निकलने पर राजद विधायक भोला यादव ने कहा कि कोर्ट ने केस से संबंधित विभिन्न बिंदुओं पर सवाल पूछा, जिसका जवाब राष्ट्रीय अध्यक्ष ने विस्तार दिया. उन पर एक ही बड़ा आरोप है षड्यंत्र का.
जब नीचे के पदाधिकारी को सजा नहीं सुनायी गयी, सीधे एक पूर्व मुख्यमंत्री को दोषी करार दिया गया, तो इस मामले में साफ है कि चेन बनी हुई है, उसी के हिसाब से फाइल आती है. भोला यादव से जब मीडिया ने पूछा कि जब लालू प्रसाद खुली हवा में बाहर निकले, तो कैसा महसूस किया.
इस पर कहा कि 10 बाइ 10 के कमरे में रहनेवाले व्यक्ति की मनोदशा क्या होगी, यह हम और आप समझ सकते हैं. राजद के प्रदेश महासचिव सह मुख्य प्रवक्ता अनिल सिंह आजाद ने रिम्स परिसर में कहा कि लालू यादव की सेहत ठीक नहीं है. लंबे समय से रिम्स में भत्ती हैं. उम्र और स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए.
लालू यादव की हालत स्थिर : रिम्स में लालू यादव का इलाज कर रहे डॉ डीके झा ने कहा कि लालू यादव की हालत स्थिर है. उन्होंने मीठा कुछ भी नहीं खाया है. सुबह में नाश्ता करके कोर्ट में गवाही देने गये थे.
पत्रकारों को कोर्ट के अंदर जाने से दो डीएसपी ने रोका
रांची : लालू प्रसाद के बयान के दौरान दो डीएसपी ने सीबीआइ के विशेष न्यायाधीश एसके शशि की अदालत के अंदर जाने से पत्रकारों को रोक दिया.
इसका पत्रकारों ने विरोध किया और कहा कि ट्रायल की रिपोर्टिंग पर रोक नहीं है़ अदालत के अंदर कोतवाली डीएसपी अजीत कुमार विमल व सदर डीएसपी दीपक पांडेय बैठे हुए थे. सुनवाई शुरू होने के पहले पत्रकार अदालत में कक्ष में प्रवेश करने लगे, तो उक्त पुलिस अधिकारियों ने रोक दिया. दोनों डीएसपी का कहना था कि जज साहब ने अदालत कक्ष के अंदर आने से मना किया है
सुनवाई के पूर्व विशेष न्यायाधीश एसके शशि ने बताया कि किसी भी पत्रकार को रोकने के लिए उन्होंने नहीं कहा है. उनका कहना था कि जब सुप्रीम कोर्ट में पत्रकारों को नहीं रोका जाता है, तो सिविल कोर्ट में क्यों रोका जायेगा. पत्रकारों को रोकने के मुद्दे पर झारखंड हाइकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल अंबुज नाथ से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि इसकी सूचना नहीं है.

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