झारखंड विधानसभा चुनाव 2019 : कुल 81 सीटों में से सात पर एक और 39 पर जीतते रहे हैं दो पार्टी के प्रत्याशी

Updated at : 07 Dec 2019 7:01 AM (IST)
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झारखंड विधानसभा चुनाव 2019 : कुल 81 सीटों में से सात पर एक और 39 पर जीतते रहे हैं दो पार्टी के प्रत्याशी

संजय शेष 35 सीटों पर जीती है दो से अधिक पार्टियां लातेहार सीट से हर बार नयी पार्टी की जीत कांके के प्रत्याशी बदलते गये, पार्टी वही रही रांची : झारखंड विधानसभा की कुल 81 सीटों में से सात पर किसी एक पार्टी का एकाधिकार रहा है. ये पार्टियां यहां अजेय सी हो गयी हैं. […]

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संजय
शेष 35 सीटों पर जीती है दो से अधिक पार्टियां
लातेहार सीट से हर बार नयी पार्टी की जीत
कांके के प्रत्याशी बदलते गये, पार्टी वही रही
रांची : झारखंड विधानसभा की कुल 81 सीटों में से सात पर किसी एक पार्टी का एकाधिकार रहा है. ये पार्टियां यहां अजेय सी हो गयी हैं. यह बहुत साफ नहीं है कि इन सीटों से विजयी उम्मीदवारों का व्यक्तित्व व काम बड़ा है या उनकी पार्टी. कांके अकेली सीट है, जिसने पार्टी के बड़े होने की बात पुख्ता की है. झारखंड गठन वाले वर्ष 2000 में तत्कालीन बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में कांके से भाजपा के रामचंद्र बैठा जीते थे.
बाद में 2005 में इसी प्रत्याशी तथा इसी पार्टी ने यहां जीत दोहरायी. पर 2009 में पार्टी ने अपना प्रत्याशी (रामचंद्र नायक) बदल कर कांके से जीत हासिल की. वर्ष 2014 में भी यही प्रयोग दोहराया गया. तब डॉ जीतू चरण राम प्रत्याशी बनाये गये व जीते भी. अब 2019 में भाजपा ने फिर से बदले प्रत्याशी समरी लाल के साथ पार्टी की ताकत अाजमाने की सोची है. यानी इस सीट पर अब तक पार्टी का कद बड़ा रहा है.
कांके के अलावा जमशेदपुर पूर्वी, रांची व खूंटी झारखंड गठन के बाद से भाजपा के अजेय गढ़ रहे हैं. दूसरी अोर बरहेट, लिट्टीपाड़ा व शिकारीपाड़ा में झामुमो ने अब तक मात नहीं खायी है.
इन सीटों में से शिकारीपाड़ा से झामुमो के नलिन सोरेन, जमशेदपुर पूर्वी से भाजपा के रघुवर दास, रांची से भाजपा के सीपी सिंह तथा खूंटी से भी भाजपा के नीलकंठ सिंह मुंडा ने गत चार चुनावों में जीत हासिल की है. इन सीटों पर पार्टी तथा प्रत्याशी का व्यक्तित्व, यानी दोनों फैक्टर जीत का कारण हो सकते हैं. उधर शिकारीपाड़ा भी झामुमो की ऐसी ही सीट है.
यहां नलिन सोरेन बार-बार हर बार सदाबहार रहे हैं. वहीं बरहेट व लिट्टीपाड़ा में झामुमो के प्रत्याशी बदलते रहे तथा पार्टी जीतती रही है. बरहेट से हेमलाल मुर्मू, थॉमस हांसदा व हेमंत सोरेन अलग-अलग चुनावों में प्रत्याशी थे. वहीं लिट्टीपाड़ा में झामुमो ने अब तक सुशीला हांसदा, साइमन मरांडी तथा डॉ अनिल मुर्मू को प्रत्याशी बनाया था.
लातेहार है अकेला उदाहरण: लातेहार, झारखंड विधानसभा की अकेली सीट है, जहां से हर बार नयी पार्टी को जीत मिलती है. लगता है यहां के मतदाता इस बात से इत्तफाक रखते हैं कि लोकतंत्र में सत्ता व पार्टी का बदलाव तवे पर पकती रोटी की तरह होना चाहिए. लातेहार के मतदाता सचमुच बेहतर रोटी पकाने वाले हैं. तथ्य भी इस बात की पुष्टि करते हैं.
दरअसल 2000 से 2014 के चुनाव तक लातेहार सीट से हर बार नयी पार्टी को जीत हासिल हुई है. वर्ष 2000 में जदयू (बैद्यनाथ राम), 2005 में राजद (प्रकाश राम), 2009 में भाजपा (बैद्यनाथ राम) तथा 2014 में झाविमो (प्रकाश राम). अब गौर करने लायक बात यह है कि यहां जीतनेवाली पार्टी तो बदलती गयी, पर प्रत्याशी दो ही रहे.
बैद्यनाथ राम व प्रकाश राम. अब 2019 में वर्तमान विधायक प्रकाश राम ने फिर से अपनी पार्टी बदल ली है. पहले राजद के बाद झाविमो तथा अब वह भाजपा में हैं. वहीं उनके प्रतिद्वंद्वी बैद्यनाथ राम ने भाजपा छोड़ झामुमो का दामन थाम लिया है. झामुमो को अब तक लातेहार में सफलता नहीं मिली है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी बदलते हुए रोटी पकाने वाले लातेहार के मतदाताअों का इस बार कैसा रुख रहता है. पार्टी बदली गयी या रोटी पलटी गयी. इन दोनों परिस्थितियों में लाभ बैद्यनाथ राम को मिलना है. पर क्या परंपरा व जन भावना के बीच कोई संबंध है? यह जनता तय करेगी.
39 सीटों पर दो व 35 पर जीती हैं तीन पार्टियां
वर्ष 2000 से लेकर 2014 के विधानसभा चुनाव तक सिंगल पार्टी वाली सात सीटों (बरहेट, लिट्टीपाड़ा व शिकारीपाड़ा तथा जमशेदपुर पूर्वी, खूंटी, रांची व कांके) तथा लातेहार (चार पार्टी) को छोड़ विधानसभा की 39 सीटों पर बदल-बदल कर सिर्फ दो पार्टियों की ही जीत हुई है. वहीं शेष 34 सीटों पर मतदाताअों ने निर्दलीय सहित तीन पार्टियों को समर्थन दिया है. पर क्या वर्ष 2019 का चुनाव इस गणित में उलटफेर करेगा? यह देखना होगा.
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