रांची : निर्धारित फीस 29 हजार रुपये, पर लिया जा रहा 45 हजार

Updated at : 02 Sep 2019 9:18 AM (IST)
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रांची : निर्धारित फीस 29 हजार रुपये, पर लिया जा रहा 45 हजार

गोला पॉलिटेक्निक के संचालन में समझौता शर्त का हो रहा उल्लंघन, सरकार की ओर से भी नहीं लिया जा रहा संज्ञान पीपीपी मोड वाले तकनीकी संस्थान बने कमाई के स्रोत, लेकिन विभाग नहीं बना रहा मॉनिटरिंग कमेटी 600 छात्रों के लिए 25 शिक्षक होने चाहिए, पर हैं सिर्फ 15 संजय रांची : उच्च व तकनीकी […]

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गोला पॉलिटेक्निक के संचालन में समझौता शर्त का हो रहा उल्लंघन, सरकार की ओर से भी नहीं लिया जा रहा संज्ञान
पीपीपी मोड वाले तकनीकी संस्थान बने कमाई के स्रोत, लेकिन विभाग नहीं बना रहा मॉनिटरिंग कमेटी
600 छात्रों के लिए 25 शिक्षक होने चाहिए, पर हैं सिर्फ 15
संजय
रांची : उच्च व तकनीकी शिक्षा विभाग के तहत पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मोड में संचालित तकनीकी संस्थानों में गड़बड़ी की खबरें लगातार आ रही हैं.
टेक्नो इंडिया, कोलकाता द्वारा संचालित सिल्ली पॉलिटेक्निक तथा रामगढ़ व चाईबासा इंजीनियरिंग कॉलेजों की शिकायतें पहले से मिलती रही हैं. अब ताजा मामला गुरु नानक टेक्निकल फाउंडेशन द्वारा संचालित गोला पॉलिटेक्निक, रामगढ़ का है. इस संस्थान के भ्रमण के बाद जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि विभागीय शुल्क निर्धारण समिति ने इसकी फीस सालाना 29 हजार रुपये निर्धारित की है.
लेकिन संस्थान छात्रों से 45 हजार रुपये सालाना शुल्क ले रहा है, जो सरकार व फाउंडेशन के बीच हुए समझौता शर्तों की कंडिका-9.2(डी) का उल्लंघन है. दूसरी अोर यहां 600 छात्रों के लिए 25 शिक्षक होने चाहिए, जबकि संस्थान सिर्फ 15 शिक्षक से काम चला रहा है. संस्थान की प्रयोगशाला, कर्मशाला (वर्कशॉप) व पुस्तकालय में मशीन, उपकरण और पुस्तकों की कमी है. इस तरह यह संस्थान एआइसीटीइ तथा झारखंड यूनिवर्सिटी अॉफ टेक्नोलॉजी के मानकों को पूरा नहीं करता है.
पीपीपी मोडवाले संस्थान कमाई के स्रोत बन गये हैं
सरकार ने पीपीपी मोड वाले सभी तकनीकी संस्थानों का निर्माण करोड़ों की लागत से खुद किया है, लेकिन यहां विद्यार्थियों से सबसे अधिक फीस ली जा रही है.
वहीं पठन-पाठन सहित अन्य सुविधाओं तथा संस्थान संचालन संबंधी मॉनिटरिंग के लिए सरकार को प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग कमेटी गठित करनी थी, जो जनवरी-13 में हुए समझौते के छह साल बाद आज तक गठित नहीं हुई है. ऐसे में संस्थान प्रबंधन की मनमानी जारी है तथा संस्थान उनकी कमाई का स्रोत बन गये हैं.
सवाल है कि जब सरकार ने अपने खर्च से संरचना (भवन व अन्य) का निर्माण किया है, तो राज्य के अपने ही बच्चे इन संस्थानों में दूसरे निजी संस्थानों के मुकाबले अधिक फीस क्यों दे रहे हैं? इसे लेकर बार-बार सवाल उठ रहा है.
गोला पॉलिटेक्निक में ये कमियां भी छात्रों, शिक्षकों व शिक्षकेतर कर्मियों में प्राचार्य की कार्यशैली को लेकर असंतोष संस्थान की चल व अचल संपत्ति की खरीद संबंधी पंजी निर्धारण नहीं संस्थान परिसर व भवन में साफ-सफाई सहित पानी-बिजली की भी कमी मेस सह छात्रावास शुल्क देय सुविधा की तुलना में अधिक (चार हजार रुपये)
छात्रावास में टेबुल-कुर्सी भी नहीं, मेस में कोयले से बनता है खाना, जिससे लगातार छात्रों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है
छुट्टियों में भी छात्रों से लिया जाता है मेस चार्ज, लापरवाही की ओर ध्यान दिलाने पर भी नहीं िलया जा रहा है संज्ञान
पीपीपी मोड वाले संस्थान
इंजीनियरिंग कॉलेज : दुमका, चाईबासा व रामगढ़ इंजीनियरिंग कॉलेज (टेक्नो इंडिया). पॉलिटेक्निक संस्थान : सिल्ली पॉलिटेक्निक (टेक्नो इंडिया), पाकुड़, गुमला व मधुपुर पॉलिटेक्निक (भुवनेश्वर पॉलिटेक्निक साइबोटेक कैंपस के सहयोग से), गोला तथा चांडिल पॉलिटेक्निक(गुरुनानक पॉलिटेक्निक फाउंडेशन), बहरागोड़ा पॉलिटेक्निक बहरागोड़ा (बालाजी एजुकेशनल ट्रस्ट भुवनेेश्वर) तथा गढ़वा पॉलिटेक्निक गढ़वा (चंद्रवंशी एजुकेशनल फाउंडेशन).
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