ये आयुर्वेदिक दवा नहीं, नशे का डोज है, जिसे खाकर बच्चे हो रहे हैं विक्षिप्त

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 08 Jul 2019 7:11 AM

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-राजीव पांडेय- झारखंड के हर जिले के बस पड़ाव, चौक चौराहे की पान गुमटी, परचून दुकानों में खुलेआम बिक रहा नशे का डोज. मुनक्का, आनंद और रॉकेट के नाम से बिकनेवाली यह पुड़िया प्रतिबंधित दवा की श्रेणी में आती है. किशोर व युवा इसका सेवन कर मानसिक रूप से बीमार हो रहे हैं. वहीं औषधि […]

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-राजीव पांडेय-
झारखंड के हर जिले के बस पड़ाव, चौक चौराहे की पान गुमटी, परचून दुकानों में खुलेआम बिक रहा नशे का डोज. मुनक्का, आनंद और रॉकेट के नाम से बिकनेवाली यह पुड़िया प्रतिबंधित दवा की श्रेणी में आती है.
किशोर व युवा इसका सेवन कर मानसिक रूप से बीमार हो रहे हैं. वहीं औषधि विभाग भी बेपरवाह है. राज्य में हर माह करीब 50 लाख रुपये से अधिक का कारोबार होता है. यह नशीला पदार्थ पटना और मध्य प्रदेश से झारखंड आता है.
रांची : राजधानी समेत राज्य के सभी जिलों के बस स्टैंड, चौक-चौराहों स्थित परचून व पान दुकानों पर आयुर्वेदिक औषधि के नाम पर खुलेआम टॉफी के रैपर में दो रुपये में बिक रही है प्रतिबंधित नशे की पुड़िया. प्रभात खबर की टीम ने रांची में मेन रोड समेत कई इलाकों में इसकी पड़ताल की.
पड़ताल के दौरान पाया गया कि बस पड़ाव स्थित पान व परचून दुकानदारों से कई युवकों और किशोरों ने मुनक्का या रॉकेट की मांग की. दुकानदार ने पैसे लिये और उन्हें नशे की पुड़िया दे दी. एक पुड़िया की कीमत दो रुपये होने के कारण कई तो तीन से चार पुड़िया खरीदकर ले गये. खास बात यह है कि इस पुड़िया को खरीदनेवालों में 14 साल के किशोर से लेकर 25 वर्ष के युवा भी शामिल थे. यही स्थिति जमशेदपुर, धनबाद, देवघर, मेदिनीनगर, गढ़वा, हजारीबाग, चतरा, कोडरमा व अन्य जगहों पर भी देखने को मिली.
पान की दुकानों पर बिकनेवाली नशे की इस पुड़िया पर बकायदा ‘आयुर्वेदिक औषधि’ लिखा होता है. इसका उपयोग चिकित्सक के परामर्श पर करने की सलाह दी गयी है. पुड़िया के पीछे शिड्यूल E (1) ड्रग बताया गया है.
यह प्रतिबंधित दवा की श्रेणी में आती है. यानी इसे पान की दुकान पर बेचना गैरकानूनी है. चौंकाने वाली बात यह है कि पुड़िया पर उत्पादक का नाम और उत्पादन के स्थान की जानकारी भी नहीं दी गयी है.
पटना व मध्य प्रदेश से आती है खेप
राज्य में आनंद, रॉकेट व मुन्नका के नाम से बिकनेवाला नशीला पदार्थ पटना और मध्यप्रदेश झारखंड में पहुंचता है. सूत्रों की मानें, तो आनंद व मुन्नका की खेप पटना से आती है. वहीं, रॉकेट के नाम से बिकनेवाला नशीला पदार्थ मध्यप्रदेश से आता है. प्रतिबंधित होने के नाते इसका कारोबार चोरी-छिपे होता है. राजधानी में इसका कारोबार कुछ सफेदपोश लोग करते हैं. उनके तीन-चार लोग दुकानदारों को माल मुहैया कराते हैं.
पान और परचून दुकानों में लंबे समय से हो रही बिक्री, नहीं हो रही कार्रवाई
धनबाद, जमशेदपुर, देवघर, पलामू, हजारीबाग, कोडरमा, गुमला, रामगढ़, चतरा समेत हर जिले के चौक-चौराहे पर मिल रही नशे की टॉफी
दो रुपये में मुनक्का, आनंद और रॉकेट नाम से है उपलब्ध
नशे का सेवन कर किशोर व युवा हो रहे मानसिक विकृति के शिकार, खत्म हो जाती है बौद्धिक क्षमता
पुड़िया पर लिखा होता है आयुर्वेदिक औषधि, साथ ही प्रतिबंधित दवा भी बतायी जाती है
पुड़िया पर न तो उत्पादक का नाम लिखा होता है और न ही उत्पादन का स्थान अंकित होता है
हर दिन तीन से चार नये मरीज आ रहे हैं
मनोचिकित्सक डॉ सुयेश सिन्हा ने बताया कि इस तरह के प्रतिबंधित नशे की पुड़िया के उपयोग से पागलपन का दौरा पड़ सकता है. इसे ए मोटिवेशनल सिंड्रोम कहते हैं. इस स्थिति में उस व्यक्ति का व्यवहार चिड़चिड़ा हो जाता है और वह मारपीट की प्रवृत्तिवाला हो जाता है.
इससे उसके पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर दुष्प्रभाव पड़ने लगता है. इस मानसिक रोग से ग्रसित 15 से 40 वर्ष के लोग इलाज कराने उनके पास आते हैं. उन्होंने कहा कि ओपीडी में हर दिन तीन से चार नये मरीज इलाज के लिए आ रहे हैं.
आयुर्वेदिक औषधि के अलावा शिड्यूल E (1) ड्रग लिखी पुड़िया को किसी भी स्थिति में पान की दुकान पर नहीं बेचा जा सकता है. यह जहर है, जिसका उपयोग नशे के रूप में किया जा रहा है. कुछ शिकायतें मिली हैं. जांच कराकर दोषी पर कार्रवाई की जायेगी.
डॉ सुजीत कुमार, संयुक्त निदेशक, औषधि
दोगुने दाम पर बेचते हैं दुकानदार
आयुर्वेदिक औषधि के नाम पर बिकने वाली इस पुड़िया का राज्य में प्रतिमाह 50 लाख से अधिक का कारोबार है. जानकारी के अनुसार इसके एक पैकेट में 40 पुड़िया रहती है, जिसकी कीमत 45 रुपये है. पान व परचून दुकानदार इसे दोगुने दाम यानी दो रुपये में बेचते हैं.
रांची के एक मसाला कारोबारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि एक बोरी में करीब 200 पॉकेट आता है. राजधानी में इसकी खपत नौ हजार बोरी से ज्यादा है. यानी करीब दो लाख रुपये से अधिक की बिक्री प्रतिमाह राजधानी में हाेती है. राज्य के सभी जिलाें को मिलाकर कारोबार की गणना की जाये, तो यह राशि करीब 50 लाख रुपये से अधिक हो जाती है.
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