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शोध संस्थान बना कर बिरसा मुंडा की यादों को संकलित करना होगा

Updated at : 09 Jun 2019 7:27 AM (IST)
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शोध संस्थान बना कर बिरसा मुंडा की यादों को संकलित करना होगा

अनुज कुमार सिन्हा नाै जून यानी भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि. यह वह दिन है जिस दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बड़े आदिवासी नायक बिरसा मुंडा ने रांची जेल में अंतिम सांस ली थी. रांची जेल में आज भी उनकी यादें बची हैं. वह कमरा सुरक्षित है और अब ताे सरकार ने उस रांची जेल […]

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अनुज कुमार सिन्हा
नाै जून यानी भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि. यह वह दिन है जिस दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बड़े आदिवासी नायक बिरसा मुंडा ने रांची जेल में अंतिम सांस ली थी. रांची जेल में आज भी उनकी यादें बची हैं.
वह कमरा सुरक्षित है और अब ताे सरकार ने उस रांची जेल काे बचाने के लिए बड़ी याेजना तैयार की है. यह ऐतिहासिक स्थल नष्ट न हाे जाये, इसलिए उसे बचाया जा रहा है. इसी जेल परिसर में बिरसा मुंडा की बड़ी प्रतिमा स्थापित की जा रही है. संभव है 15 नवंबर के पहले बिरसा मुंडा की वह प्रतिमा रांची जेल परिसर में लग भी जाये.
उसके बाद रांची जेल (पुरानी जेल) पर्यटन स्थल के ताैर पर विकसित हाे जायेगा. ऐसा ही एक और बड़ा प्रयास बुंडू में चल रहा है जहां आजसू भगवान बिरसा मुंडा की सबसे ऊंची प्रतिमा अपने स्तर से लगाने जा रही है. राज्य में ऐसे कई प्रयास चल रहे हैं जाे यह बताता है कि बिरसा मुंडा काे झारखंड के लाेग कितना चाहते हैं, उनका महत्व कितना है.
अपने जिस नायक बिरसा मुंडा काे झारखंड (पूरा देश भी कह सकते हैं) जब इतना सम्मान देता है, आदर्श मानता है ताे उसके बारे में अधिक से अधिक और नयी जानकारी हासिल करना चाहेगा. बिरसा मुंडा के जीवन से वह सीखना चाहेगा. बिरसा मुंडा काे जिन लाेगाें ने थाेड़ा भी पढ़ा है, वे जानते हैं कि उनमें लीडरशिप के अदभुत गुण थे.
उनमें संघर्ष क्षमता थी. बड़े रणनीतिकार थे जिसे उन्हाेंने अंगरेजाें से संघर्ष करने वक्त दिखाया भी था. ऐसे नायक की अगर सिर्फ 25 साल में संदिग्ध परिस्थिति में जेल में माैत हाे जाती है ताे लाेग माैत के असली कारणाें काे जानना चाहेंगे. और भी बहुत कुछ बिरसा मुंडा के चहेते जानना चाहते हैं. बिरसा मुंडा की माैत के 119 साल बीत गये लेकिन अनेक सवाल अनुत्तरित हैं. क्या उन सवालाें के जवाब पाने के प्रयास करने का यह वक्त नहीं है?
अगर पहल हाे ताे अभी भी वक्त है बहुत कुछ जाना जा सकता है. लेकिन इसके लिए गंभीर प्रयास करने हाेंगे. महात्मा गांधी पर देश-दुनिया में सैकड़ाें संस्थानाें में रिसर्च हाे रहा है. गांधी शांति प्रतिष्ठान बनाया गया. गांधी पर हजाराें पुस्तकें दुनिया में आयी, इसे गांधी के बारे में लगातार नयी-नयी जानकारियां आती गयीं. लाेगाें ने इन पुस्तकाें और शाेध के जरिए गांधी काे और ज्यादा जाना. क्या भगवान बिरसा मुंडा के लिए यह प्रयास नहीं हाे सकता है?
क्या बिरसा मुंडा शाेध संस्थान देश में नहीं बन सकता है? अगर बनना है ताे निश्चित ताैर पर झारखंड में ही बनेगा. ऐसा संस्थान जिसमें बिरसा मुंडा पर विस्तार से शाेध हाे सके, उनसे जुड़ी यादें एक जगह समेटी जा सकें. दुनिया के काेने-काेने में बिरसा मुंडा से जुड़े जाे भी दस्तावेज हाें, उन्हें इसी बिरसा शाेध संस्थान में लाया जा सके ताकि आम आदमी की पहुंच उन दस्तावेजाें तक हाे सके.
काम आसान नहीं है. समय पहले ही बीत चुका है. बिरसा मुंडा काे पहली बार गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल में रखा गया था. उन्हें दाे साल की सजा हुई थी.
1895 की बात है. यानी 124 साल बीत गये. हजारीबाग जेल में बिरसा मुंडा से जुड़ा काेई भी दस्तावेज नहीं है. हजारीबाग से रिहा हाेने के बाद बिरसा मुंडा ने दुबारा आंदाेलन किया और 1900 में फिर गिरफ्तार हुए. इस बार रांची जेल लाया गया जहां उनकी माैत हाे गयी. कहा गया कि डायरिया से माैत हुई लेकिन इसे काेई मानने काे तैयार नहीं है. रांची जेल में भी काेई दस्तावेज नहीं है. कहां गये वे दस्तावेज? पटना में लाइब्रेरी में बिरसा मुंडा की गिरफ्तारी से संबंधित कुछ पत्र सुरक्षित हैं. जब ये पत्र सुरक्षित रह सकते हैं ताे बिरसा मुंडा से जुड़े जेल के कागजात क्याें नहीं?
अगर इनमें से कुछ भी दस्तावेज मिल जायें ताे बहुमूल्य हाेंगे. लेकिन यह संभव हाेगा इस पर शाेध करने से. इसके लिए सरकार ही कुछ कर सकती है. अंगरेज दस्तावेज रखने में माहिर हाेते थे. इसलिए इस बात की संभावना है कि कुछ गाेपनीय कागज (बिरसा मुंडा की माैत से संबंधित) लंदन में हाे.
अगर सरकार नयी सरकारी संस्था बना कर काम करे ताे इस बात की उम्मीद बनती है कि कुछ जानकारी हासिल हाे जाये. कम से कम देश-दुनिया में बिरसा मुंडा से संबंधित जाे भी फाेटाे, कागज, पत्र या आंदाेलन से जुड़े कागज काे एक जगह जमा ताे किया जा सकता है.
इन दस्तावेजाें के माध्यम से बिरसा पर आगे बहुत काम किया जा सकता है. अभी बिरसा मुंडा से जुड़े तथ्य कुमार सुरेश सिंह और एसपी सिन्हा की किताबाें से ही मिलते हैं. इससे आगे जाकर काम करने की जरूरत है और यह काम निजी स्तर पर संभव नहीं. जिस तरीके से हाल में बिरसा मुंडा पर काम हाे रहा है, संभव हाे ये सारे सपने भी पूरे हाे जायें ताकि बिरसा काे लाेग समग्रता में समझ सकें. यही बेहतर झारखंड की दिशा भी तय करेगा.
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