प्रकृति से जुड़ें, स्वस्थ रहें : प्राकृतिक चिकित्सा में है गंभीर रोगों को ठीक करने की क्षमता

By Prabhat Khabar Digital Desk
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रांची : वर्तमान दौर में कुछ ऐसी बीमारियां सामने आयी हैं, जिसका इलाज सिर्फ प्राकृतिक चिकित्सा से ही संभव है. प्राकृतिक चिकित्सा मानता है कि जिस तरह ब्रह्मांड का निर्माण पंचतत्व से हुआ है, उसी तरह हमारा शरीर भी पंचतत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) से ही बना है. इन पंचतत्वों से शरीर की विकृतियों का इलाज करने की विधा को प्राकृतिक चिकित्सा कहते हैं. पंचतत्व की शरीर में अधिकता या कमी से अलग-अलग तरह के रोग होते हैं. इन्हें संतुलित करने की जो विधा है, उसे ही प्राकृतिक चिकित्सा कहते हैं.

प्रकृति से जुड़ें, स्वस्थ रहें : प्राकृतिक चिकित्सा में है गंभीर रोगों को ठीक करने की क्षमता

डॉ नीरज नयन ऋषि

रांची स्थित योगा एंड नैचुरोपैथी वेलनेस सेंटर के प्रमुख डॉ नीरज नयन ऋषि बताते हैं कि पंचतत्व की कमी या अधिकता किसी बाह्य या आंतरिक द्रव्यों के अतिरिक्त जमाव की वजह से होता है. प्राकृतिक चिकित्सा में माना गया है कि कोई भी रोग रोग जीवणु या विषाणु से नहीं होते. जीवाणु और विषाणु की हमारे शरीर में उत्पत्ति इन बाह्य और आंतरिक द्रव्यों के जमाव से होता है और इन्हीं पर वे तथाकथित जीवाणु और विषाणु पलते हैं. डॉ ऋषि ने कहा कि पंचतत्व का उपयोग कर इन बाह्य और आंतरिक द्रव्यों को बाहर निकालकर उनका उपचार किया जाता है.

उन्होंने बताया कि प्राकृतिक चिकित्सा एक अति प्राचीन विज्ञान है. वेदों व अन्य प्राचीन ग्रंथों में हमें इसके अनेक संदर्भ मिलते हैं. विजातीय पदार्थ का सिद्धांत, जीवनी शक्ति संबंधी अवधारणा तथा अन्य धारणाएं, जो प्राकृतिक चिकित्सा को आधार प्रदान करती हैं, प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध हैं तथा इस बात की ओर संकेत करती हैं कि इनका प्रयोग प्राचीन भारत में व्यापक रूप से होता था.

डॉ ऋषि के मुताबिक, पंचतत्व में पृथ्वी तत्व से हमारे शरीर की मांसपेशियां बनी हैं, हड्डी, शरीर के रक्त तथा लसिका का निर्माण जल तत्व से हुआ है, तो अग्नि तत्व से पाचन रस एंव ग्रंथियों का निर्माण हुआ है. वायु तत्व से फेफड़े और आकाश तत्व से साइनस एवं शरीर की खाली जगह बनी है. उन्होंने कहा कि पंचतत्व में पृथ्वी तत्व की चिकित्सा में पूर्ण मृत्तिका स्नान, स्थानीय मृत्तिका स्नान, चुंबकीय चिकित्सा प्रमुख है. जल तत्व की चिकित्सा में कटि स्नान, मेरुदंड स्नान, पूर्ण स्नान, वर्लपूल बाथ, डीलक्स हाइड्रो मसाज, अंडर वाटर मसाज प्रमुख हैं.

डॉ ऋषि कहते हैं कि अग्नि तत्व की चिकित्सा में सूर्य स्नान, वाष्प स्नान, सॉना बाथ, कलर थेरेपी का इस्तेमाल होता है. वहीं, वायु तत्व की चिकित्सा के लिए एयर थेरेपी और आकाश तत्व की चिकित्सा में उपवास को प्रमुखता दी जाती है. डॉ नीरज के मुताबिक, पुरातन समय में प्राकृतिक चिकित्सा का भरपूर उपयोग होता था. आधुनिक युग में मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है. इसकी प्रमुख वजह भौतिक सुख-सुविधाओं की वृद्धि एवं औद्योगीकरण है. इस युग में लोग शारीरिक श्रम कम करते हैं, जबकि मानसिक श्रम में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है. फलस्वरूप असंक्रमित बीमारियां जैसे– मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, अतिरिक्त कॉलेस्ट्रोल की वृद्धि, थायरॉयड हार्मोन के अनियमित होने की समस्याएं बढ़ी हैं.

डॉ नीरज कहते हैं कि इन समस्याओं से बचने के लिए, इनके निदान के लिए वापस प्राकृति की तरफ लौटने की जरूरत है. उपरोक्त कई बीमारियों का इलाज सिर्फ प्राकृतिक चिकित्सा से ही संभव है. इसलिए लोगों को एक बार फिर प्रकृति से जुड़ने की जरूरत है. प्राकृतिक चिकित्सा कहता है कि बेहतर स्वास्थ्य की इच्छा रखने वालों को संतुलित भोजन लेना चाहिए. प्राकृतिक चिकित्सा में आहार को ही मूलभूत औषधि माना गया है.

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