लोकसभा चुनाव: झारखंड आंदाेलन के बड़े नेता विनोद बाबू, 24 साल तक लड़े चुनाव, सातवें प्रयास में बने सांसद

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 21 Apr 2019 7:54 AM

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अनुज कुमार सिन्हा विनाेद बिहारी महतो ने साबित किया कि काेशिश करनेवालाें की कभी हार नहीं हाेती रांची : विनाेद बिहारी महताे झारखंड आंदाेलन के बड़े नेता थे. वकालत भी करते थे आैर सामाजिक कार्य भी. कुड़मी समाज में व्याप्त सामाजिक बुराइयाें के खिलाफ भी वे आंदाेलन करते थे. शिक्षा के क्षेत्र में उन्हाेंने अनेक […]

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अनुज कुमार सिन्हा

विनाेद बिहारी महतो ने साबित किया कि काेशिश करनेवालाें की कभी हार नहीं हाेती

रांची : विनाेद बिहारी महताे झारखंड आंदाेलन के बड़े नेता थे. वकालत भी करते थे आैर सामाजिक कार्य भी. कुड़मी समाज में व्याप्त सामाजिक बुराइयाें के खिलाफ भी वे आंदाेलन करते थे.

शिक्षा के क्षेत्र में उन्हाेंने अनेक काम किये. शिबू साेरेन आैर एके राय के साथ मिल कर झारखंड मुक्ति माेरचा का गठन किया था आैर अलग झारखंड राज्य के लिए लंबी लड़ाई लड़ी थी. आपातकाल में जेल भी गये थे. लेकिन झारखंड के इस बड़े जुझारू नेता काे भी सांसद बनने में लंबा संघर्ष करना पड़ा. 24 साल के संघर्ष आैर सातवें प्रयास में वे लाेकसभा का चुनाव जीत सके.

आरंभ में विनाेद बाबू का कार्य क्षेत्र धनबाद आैर इसके आसपास था. लाेकप्रिय भी बहुत थे. पहले सीपीएम में थे आैर इसी पार्टी के बैनर तले पहली बार गिरिडीह लाेकसभा क्षेत्र से 1967 में वे पहली बार चुनाव लड़े थे.

चाैथे स्थान पर वे आये थे आैर कुल 18,767 वाेट मिला था. उनका सामना रामगढ़ राज की महारानी ललित राजलक्ष्मी से हुआ था. महारानी चुनाव जीत गयी थीं. इस हार के बाद भी विनाेद बाबू विचलित नहीं हुए आैर 1971 के आम चुनाव में वे फिर सीपीएम से ही धनबाद लाेक सभा क्षेत्र से मैदान में उतर गये.

इस चुनाव में इंदिरा गांधी की लहर थी आैर कांग्रेस के रामनारायण शर्मा ने विनाेद बाबू काे बुरी तरह हरा दिया था. विनाेद बाबू के लिए खुशी की बात यह थी कि उन्हाेंने पिछले चुनाव की तुलना में दाेगुना वाेट यानी 36385 वाेट हासिल किये थे आैर दूसरे स्थान पर थे.

लगातार दाे चुनाव हारने के बाद विनाेद बाबू ने क्षेत्र आैर सामाजिक समीकरण काे बेहतर समझ लिया था. अगल चुनाव 1977 में हुआ था.

इस बीच झामुमाे का गठन हाे चुका था. एके राय उनकी पार्टी के सहयाेगी थे आैर बड़े मजदूर नेता भी. दाेनाें ताे धनबाद से लड़ नहीं सकते थे. इसलिए 1977 में एके राय धनबाद से निर्दलीय लड़े आैर चुनाव जीत कर सांसद बन गये.

लेकिन विनाेद बाबू ने अपना क्षेत्र बदल लिया. गिरिडीह चले गये. अगर 1971 में इंदिरा गांधी की लहर थी, ताे आपातकाल के बाद हुए 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की लहर थी. इस चुनाव में विनाेद बाबू निर्दलीय मैदान में थे. 24360 वाेट लाये थे. तीसरे स्थान पर आये थे.

जनता पार्टी (भारतीय लाेक दल के प्रत्याशी) के रामदास गिरिडीह से सांसद बने थे. अगला चुनाव 1980 में हुआ था. जनता पार्टी के अापसी झगड़े के बाद सरकार गिर गयी थी आैर आम चुनाव में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई थी. विनाेद बाबू चाैथी बार लाेक सभा चुनाव लड़ने के लिए उतर चुके थे. लेकिन निर्दलीय थे, क्याेंकि तब तक झारखंड मुक्ति माेरचा काे पार्टी का चुनाव चिह्न आवंटित नहीं हुआ था. गिरिडीह से विनाेद बाबू लड़ रहे थे, ताे दुमका से शिबू साेरेन पहली बार चुनाव मैदान में थे.

वे भी निर्दलीय. जब रिजल्ट निकला ताे विनाेद बाबू काे फिर निराशा हाथ लगी. 1980 का चुनाव भी वे हार गये आैर तीसरे स्थान पर रहे. हां, उनका वाेट बढ़ता रहा आैर इस चुनाव में 56287 तक पहुंच गया. विनाेद बाबू जरूर थाेड़ा दुर्भाग्यशाली रहे, क्याेंकि झामुमाे के गठन के बाद के उनके दाेनाें मित्र पहले एके राय आैर बाद में शिबू साेरेन संसद में पहुंच चुके थे.

विनाेद बाबू के लिए खुशी की बात यह थी कि गिरिडीह में लगातार उनका वाेट बढ़ रहा था. 1984 में फिर चुनाव हुआ. विनाेद बाबू जानते थे कि यह चुनाव भी आसान नहीं हाेगा, क्याेंकि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद यह चुनाव हुआ था. सहानुभूति कांग्रेस के साथ थी.

विनाेद बाबू यह चुनाव भी हार गये आैर 70766 वाेट लाकर दूसरे स्थान पर रहे. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के माहाैल में निर्दलीय चुनाव लड़ कर दूसरे स्थान पर आने से एक बात स्पष्ट हाे चुकी थी कि विनाेद बाबू का ही भविष्य है. 1989 में अगला चुनाव हुआ आैर विनाेद बाबू गिरिडीह से लगातार चाैथी बार (कुल छठी बार) मैदान में उतर गये. उन दिनाें झारखंड आंदाेलन चरम पर था.

इस बीच विनाेद बाबू झामुमाे से आते-जाते भी रहे थे. निर्दलीय लड़े आैर डेढ़ लाख से ज्यादा (156391) वाेट लाने के बावजूद चुनाव हार गये. भाजपा प्रत्याशी रामदास ने उन्हें हरा दिया था. विनाेद बाबू दूसरे स्थान पर रहे. काेई भी इस हार से निराश हाेता, क्याेंकि आंदाेलन ने जाे असर दिखाया था, उसके बाद दुमका से शिबू साेरेन, राजमहल से साइमन मरांडी आैर जमशेदपुर से शैलेंद्र महताे (तीनाें झामुमाे) चुनाव जीत गये थे. लाेकसभा चुनाव में यह विनाेद बाबू की लगातार छठी हार थी.

इतनी हार के बावजूद विनाेद बाबू हार माननेवाले नहीं थे. उन्हें भराेसा था कि वे चुनाव जीत कर रहेंगे. गिरिडीह सीट पर जिस तरीके से उनका समर्थन बढ़ रहा था, वाेट बढ़ रहा था, वह भी यही संकेत दे रहा था. 1991 का चुनाव आ गया. इस बीच कई बार विनाेद बाबू विधायक बन चुके थे, लेकिन सांसद बनने का इंतजार कर रहे थे. 1991 का चुनाव उनका सातवां चुनाव था. झारखंड आंदाेलन अपने चरम पर था.

पहली बार विनाेद बाबू झारखंड मुक्ति माेरचा के बैनर से लड़े आैर गिरिडीह लाेकसभा सीट पर भाजपा के रामदास सिंह काे पराजित कर सांसद बने. 1967 में पहले चुनाव (लाेक सभा) में 18767 वाेट लानेवाले विनाेद बाबू ने अपना संघर्ष जारी रखा. छह बार लगातार हारे, लेकिन सातवीं बार जीत हासिल कर ली. इसमें उन्हें 24 साल का वक्त लगा. इस जीत से विनाेद बाबू ने साबित कर दिया कि काेशिश करनेवालाें की कभी हार नहीं हाेती.

विनाेद बिहारी महताे : चुनाव यात्रा

प्रयास वर्ष सीट दल स्थान वाेट

पहला 1967 धनबाद सीपीएम चाैथा 18767 (हारे)

दूसरा 1971 धनबाद सीपीएम दूसरा 36385 (हारे)

तीसरा 1977 गिरिडीह निर्दलीय तीसरा 24360 (हारे)

चाैथा 1980 गिरिडीह निर्दलीय तीसरा 56287 (हारे)

पांचवां 1984 गिरिडीह निर्दलीय दूसरा 70766 (हारे)

छठा 1989 गिरिडीह निर्दलीय दूसरा 156391 (हारे)

सातवां 1991 गिरिडीह निर्दलीय पहला 228413 (जीते)

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