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रांची : विभाग की जगह विवि को यूनिट मानने से बढ़ सकते थे आरक्षित पद

Updated at : 25 Jan 2019 8:40 AM (IST)
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रांची : विभाग की जगह विवि को यूनिट मानने से बढ़ सकते थे आरक्षित पद

संजीव सिंह रांची : राज्य के विवि में प्रोफेसर, रीडर व व्याख्याता की नियुक्ति में अब अौर विलंब होने की आशंका प्रबल हो गयी है. सुप्रीम कोर्ट के शिक्षक नियुक्ति में आरक्षण के फैसले के बाद एससी/एसटी व अोबीसी उम्मीदवारों को आरक्षण का समुचित लाभ मिलने की संभावना कम हो गयी है. अब उम्मीदवार व […]

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संजीव सिंह
रांची : राज्य के विवि में प्रोफेसर, रीडर व व्याख्याता की नियुक्ति में अब अौर विलंब होने की आशंका प्रबल हो गयी है. सुप्रीम कोर्ट के शिक्षक नियुक्ति में आरक्षण के फैसले के बाद एससी/एसटी व अोबीसी उम्मीदवारों को आरक्षण का समुचित लाभ मिलने की संभावना कम हो गयी है.
अब उम्मीदवार व शिक्षक संघ इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से अध्यादेश लाने का आग्रह कर रहे हैं. मालूम हो कि सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2017 के फैसले के खिलाफ दायर की गयी केंद्र सरकार की एसएलपी को खारिज कर दिया है.
केंद्र ने उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें शिक्षकों की नियुक्ति में आरक्षण में विभागों को ही एक यूनिट (इकाई) के रूप में मान्यता दी थी, न कि विवि को. विवि को एक यूनिट मानने पर एसटी/एससी व अोबीसी उम्मीदवारों के आरक्षित पद अधिक मिल जाते. केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण मुद्दे पर ही याचिका दायर करने के कारण झारखंड सहित अन्य राज्यों में शिक्षक नियुक्ति की प्रक्रिया स्थगित कर दी गयी है.
अब केंद्र अगर अध्यादेश नहीं लाते हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का ही पालन करने के लिए सभी राज्यों को निर्देश देता है, तो एक बार फिर प्रक्रिया शुरू हो सकेगी. अध्यादेश लाने पर नियुक्ति प्रक्रिया में अौर विलंब हो सकता है. शिक्षक संघ व उम्मीदवार विवि को ही एक यूनिट मानते हुए अध्यादेश लाने की मांग कर रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने विवि में शिक्षक नियुक्ति में विभाग को ही यूनिट मानने का दिया है निर्देश
उम्मीदवार व शिक्षक संघ विवि को यूनिट मानने के लिए अध्यादेश लाने की कर रहे हैं मांग
क्या है पूरा मामला : 25 अगस्त, 2006 को यूजीसी द्वारा दिये गये निर्देश से यह मुद्दा सामने आया. जिसके अनुसार विवि को एक यूनिट के रूप में लिया जाना था.
सात अप्रैल, 2017 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के कारण आदेश को चुनौती देने वाली एक याचिका दायर की गयी. उच्च न्यायालय का तर्क यह था कि विभाग को एक यूनिट के रूप में लेने से सभी विभागों में आरक्षित श्रेणियों की उपस्थिति सुरक्षित हो जायेगी, जो विवि को एक इकाई के रूप में लिये जाने पर संभव नहीं है.
यूजीसी के दिशा-निर्देशों को कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग में 1997 के कार्यालय आदेश के आधार पर तैयार किया गया था. इसमें मान्यता दी गयी है कि ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं, जहां किसी विशेष विभाग में केवल एक पद रिक्त हो. पद को आरक्षित करने से 100 प्रतिशत आरक्षण होगा, जो 1992 के सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी जजमेंट के खिलाफ जाता है.
जहां आरक्षण 50 प्रतिशत की ऊपरी सीमा पर लागू किया गया था. दूसरी ओर, ऐसे पदों को सभी के लिए खुला छोड़ना सकारात्मक कार्रवाई के विरुद्ध होगा. इस संबंध में यह सिफारिश की गयी थी कि सभी खाली पदों को एक साथ जोड़ा जाना चाहिए और उसी के अनुसार आरक्षण लागू किया जाना चाहिए. तीन मार्च, 2018 को, यूजीसी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के अनुरूप 2006 के दिशा निर्देशों के अनुसार एक आदेश जारी किया.
विभिन्न शिक्षक संघों के दबाव के कारण, केंद्र सरकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक एसएलपी दायर की. मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय ने यूजीसी को निर्देश जारी किया, जिसके बाद नौ जुलाई, 2018 को सभी विवि, कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों को एसएलपी की अवधि के लिए मार्च के आदेश को रोकने का एक संदेश भेजा गया.
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