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अफसर पुत्रों को रणजी खेलाने के लिए क्रिकेट बोर्ड ने बदल दिये नियम

Updated at : 08 Dec 2018 1:19 AM (IST)
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अफसर पुत्रों को रणजी खेलाने के लिए क्रिकेट बोर्ड ने बदल दिये नियम

विवेक चंद्ररांची :भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड(बीसीसीआइ) ने अफसरों के बच्चों को फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेलाने के लिए गलत तरीके से नियम बदल दिया है. दो अफसरों (1993 बैच के आइपीएस अधिकारी राजीव सिंह और न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी के प्रशासनिक अधिकारी कुतुबद्दीन चौधरी) के बेटों को रणजी टीमों में शामिल करने के लिए नियमों में […]

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विवेक चंद्र
रांची :
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड(बीसीसीआइ) ने अफसरों के बच्चों को फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेलाने के लिए गलत तरीके से नियम बदल दिया है. दो अफसरों (1993 बैच के आइपीएस अधिकारी राजीव सिंह और न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी के प्रशासनिक अधिकारी कुतुबद्दीन चौधरी) के बेटों को रणजी टीमों में शामिल करने के लिए नियमों में बदलाव किया गया.
दोनों अधिकारियों के पुत्रों क्रमशप्रत्युष सिंह और रोहन चौधरी को अलग-अलग राज्यों की टीमों से रणजी मैच खेलाने के लिए बीच सीजन में ही नियम बदले गये. बीसीसीआइ ने बीच रणजी सीजन में ही आवश्यक प्रक्रिया पूरी किये बिना नियम बदले.
इसके बाद दोनों खिलाड़ियों को बीसीसीआइ ने नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) देकर त्रिपुरा और मिजोरम की टीमों में शामिल करने की अनुमति दे दी. प्रत्युष सिंह इस वर्ष त्रिपुरा और रोहन चौधरी मिजोरम की रणजी टीमों में शामिल किये गये हैं.
झारखंड की टीम से निकाला गया था प्रत्युष को
दायें हाथ के लेग ब्रेक बॉलर प्रत्युष सिंह ने लगातार दो वर्ष (2016-17 और 2017-18) झारखंड की रणजी टीम में शामिल थे. हालांकि दो सीजन में स्तरीय प्रदर्शन नहीं कर पाने की वजह से 2018-19 में प्रत्युष को टीम से बाहर कर दिया गया था. उसके बाद बीसीसीआइ ने नियमों में बदलाव कर प्रत्युष को त्रिपुरा की टीम में शामिल होने की अनुमति दे दी.
छोटा भाई झारखंड और बड़ा भाई त्रिपुरा की टीम में
प्रत्युष सिंह के छोटे भाई उत्कर्ष सिंह झारखंड की रणजी टीम में शामिल हैं. बीसीसीआइ के नियमों में परिवर्तन के बाद अपने भाई की तरह उत्कर्ष त्रिपुरा की टीम से खेलने नहीं गये. तेज गेंदबाज के रूप में उत्कर्ष पिछले दो वर्षों से (चालू सीजन में भी) झारखंड की रणजी टीम से खेल रहे हैं.
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि प्रत्युष और उत्कर्ष सिंह के पिता राजीव सिंह आइपीएस अधिकारी हैं. जबकि, उनके चाचा संजय सिंह क्रिकेट प्रशासन में हैं. प्रत्युष के चाचा संजय सिंह दो बार झारखंड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और एक बार वरीय उपाध्यक्ष रहे हैं.
तकनीकी कमेटी की अनुमति के बिना बदले गये नियम
बीसीसीआइ ने नियमों में परिवर्तन करने के लिए तकनीकी कमेटी की अनुमति नहीं ली. बीसीसीआइ की तकनीकी कमेटी की अध्यक्षता देश के महान खिलाड़ियों सुनील गावस्कर, सौरभ गांगुली और अनिल कुंबले जैसे खिलाड़ी करते रहे हैं. अब तक बीसीसीआइ के किसी भी नियम में परिवर्तन के पूर्व तकनीकी कमेटी से उसकी वेटिंग करायी जाती थी.
तकनीकी कमेटी की अनुशंसा के बाद ही नियमों में बदलाव किया जाता था. इसके अलावा बीच सीजन में ही नियम परिवर्तन कर दिया गया. ऐसा बीसीसीआइ के इतिहास में पहली बार हुआ है.
  • आइपीएस और बीमा कंपनी के अफसर के बेटों के लिए बीसीसीआइ ने बदले नियम
  • त्रिपुरा और मिजोरम की टीमों में दोनों को शामिल करने के लिए क्रिकेट बोर्ड ने एनओसी दिया
  • अमिताभ चौधरी ने सीओए के काम करने के तरीके पर सवाल उठाये
  • नियुक्ति घाेटाला. सीबीआइ ने मांगे थे दस्तावेज
बीसीसीआइ में मचा घमासान : अफसरों के बच्चों को रणजी टीम में शामिल करने के लिए नियम परिवर्तन से बीसीसीआइ में घमासान शुरू हो गया है. बोर्ड के एक वरीय अधिकारी गलत तरीके से नियमों में किये गये परिवर्तन का विरोध किया है. इ-मेल के जरिये उन्होंने बीसीसीआइ के सभी ऑफिस बीयररों के पास अपना विरोध जताया है. नियमों में बदलाव को भारतीय क्रिकेट और प्रतिभाशाली क्रिकेटरों के खिलाफ बताते हुए उन्होंने इसे गलत और अनैतिक करार दिया है.
क्या था नियम
देश के किसी भी राज्य से रणजी मैच खेलने के लिए खिलाड़ी को पिछले एक वर्ष से संबंधित राज्य का निवासी होना अनिवार्य था. खिलाड़ी अगर गुजरे एक वर्ष से किसी राज्य में पढ़ रहा हो, नौकरी कर रहा हो या रह रहा हो, तो वह उस राज्य की टीम से रणजी मैच खेल सकता था. एक वर्ष की सीमा रणजी सीजन शुरू होने के दिन यानी एक सितंबर से तय की जाती थी. बीसीसीआइ की एनओसी के लिए खिलाड़ी को पिछले एक वर्ष से उस राज्य में रहने का प्रमाण देना पड़ता था.
क्या किया बदलाव
बीसीसीआइ ने केवल सरकारी अधिकारियों के परिजनों को टीम में शामिल करने के लिए नियमों में बदलाव किया है. सरकारी अधिकारी का तबादला होने की स्थिति में उनके परिजनों को टीम में शामिल करने के लिए एक वर्ष तक संबंधित राज्य में रहने की बाध्यता समाप्त कर दी गयी है. अब किसी भी सरकारी अफसर के पुत्रों पर किसी भी राज्य की रणजी टीमों में शामिल होने के लिए उस राज्य में रहने की एक वर्ष की तय समय सीमा लागू नहीं होती है. हालांकि, सामान्य के लिए एक वर्ष की समय सीमा अब भी लागू है.
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