एग्रो-फूड समिट : दूध उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए भैंस पालन को बढ़ावा देना होगा

Updated at : 01 Dec 2018 5:21 AM (IST)
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एग्रो-फूड समिट : दूध उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए भैंस पालन को बढ़ावा देना होगा

ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन देकर निकाले गये दूध से स्वास्थ्य को खतरा नहीं रांची : गाय-भैंस का दूध हमेशा हाथ तथा थन धोकर निकालना चाहिए. दूध निकालने के कम से कम आधे घंटे बाद तक मवेशी को जमीन पर न बैठने दें. इस वक्त उसके थन के मुंह खुले होते हैं तथा जमीन पर बैठने से […]

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ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन देकर निकाले गये दूध से स्वास्थ्य को खतरा नहीं
रांची : गाय-भैंस का दूध हमेशा हाथ तथा थन धोकर निकालना चाहिए. दूध निकालने के कम से कम आधे घंटे बाद तक मवेशी को जमीन पर न बैठने दें. इस वक्त उसके थन के मुंह खुले होते हैं तथा जमीन पर बैठने से बैक्टीरिया उसके थन में प्रवेश कर सकता है, जो थनैला रोग का सबसे बड़ा कारण है.
उपरोक्त नियम का पालन करेंगे, तो आपके पशु को कभी थनैला रोग नहीं होगा. एग्रीकल्चर साइंटिस्ट रिक्रूटमेंट बोर्ड के अध्यक्ष डॉ एके श्रीवास्तव ने यह बातें कही. वह एग्रो-फूड समिट के दूसरे दिन डेयरी, मुर्गी व मत्स्य पालन संबंधी तकनीकी सत्र में अपना की-नोट एड्रेस दे रहे थे.
डॉ श्रीवास्तव ने कहा कि दूध उत्पादन में आत्मनिर्भरता व वृद्धि के लिए भैंस पालन को बढ़ावा देना होगा. मुर्रा भैंस हमारी बेहतर नस्ल है. दुनिया के 120 देश भारत से इसके सीमेन की मांग करते हैं. दरअसल, पशुपालन सेक्टर के विकास के लिए चारा उत्पादन बढ़ाने, कोल्ड चेन की व्यवस्था करने तथा अच्छी नस्ल के गुणवत्तापूर्ण सीमेन की कमी से उबरने की जरूरत है.
डॉ श्रीवास्तव ने कहा कि खाद्य सुरक्षा अनाज से तथा पोषण दूध से ही सुनिश्चित होगा. उन्होंने कहा कि अॉक्सीटोसिन का इंजेक्शन देकर निकाले गये दूध से भी स्वास्थ्य को कोई खतरा नहीं होता. अॉक्सीटोसिन मानव के खून में नहीं घुलता है. इसके खतरे की बात भ्रांति है. हमने अॉक्सीटोसिन की मात्रा 70 गुना तक बढ़ा कर किये गये शोध में पाया है कि इससे दूध की गुणवत्ता पर कोई फर्क नहीं पड़ता.
पर अनावश्यक रूप से यह इंजेक्शन देने से पशु की सेहत खराब होती है. डॉ श्रीवास्तव ने कहा कि न सिर्फ गाय बल्कि बकरी, ऊंट, भैंस के दूध में भी शरीर के लिए जरूरी मिनरल उपलब्ध होते हैं. दूध से रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है. एम्स में टीबी के मरीज को ऊंट का दूध दिया जाता है.
बीएयू, रांची के डॉ सुशील प्रसाद ने कहा कि पोल्ट्री का मतलब सिर्फ मुर्गी पालन नहीं बल्कि बतख व टर्की सहित अन्य पक्षियों का पालन भी है. तकनीकी सत्र को डॉ अनूप कालरा व इंद्रजीत डे ने भी संबोधित किया. कार्यक्रम का संचालन सहायक निदेशक, गव्य मुकुल प्रसाद सिंह तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ मनोज तिवारी ने किया.
तीन साल में राज्य में 86 बल्क मिल्क कूलर लगाये गये
कृषि मंत्री रणधीर सिंह ने कहा कि हम झारखंड में भैंस या विदेशी नस्ल के गाय को नहीं बल्कि रेड सिंधी, साहिवाल, थरपारकर व दूसरे देसी नस्ल को ही झारखंड में बढ़ावा दे रहे हैं व देंगे. उन्होंने बताया कि गत तीन साल में राज्य भर में 86 बल्क मिल्क कूलर स्थापित किये गये हैं.
रांची में स्थापित एक लाख लीटर की डेयरी की क्षमता बढ़ा कर दो लाख लीटर प्रतिदिन की जायेगी. वहीं, राज्य भर में अन्य छह प्रोसेसिंग प्लांट (डेयरी) की स्थापना होगी. सेंट्रल इंस्टीट्यूट अॉफ फिशरीज एजुकेशन (सीअाइएफइ) के पूर्व कुलपति डॉ दिलीप कुमार सिंह ने कहा कि समुद्र के जरिये मछली उत्पादन अब स्थिर हो गया है.नदी-तालाब व जमीन पर स्थित जलाशयों से जरिये यह उत्पादन अब तेजी से बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि नदी-पोखर में मछली पालन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.
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