कभी पूरे पूर्वी भारत में बोली जाती थी मुंडारी : डॉ पीटरसन
Updated at : 06 Oct 2018 1:13 AM (IST)
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रांची : क्रिश्चियन अल्ब्रेच्ट्स यूनिवर्सिटी, जर्मनी में लिंग्विस्टक विभाग के प्रोफेसर सह अध्यक्ष डॉ जॉन पीटरसन शुक्रवार को रांची विवि के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के विद्यार्थियों से रूबरू हुए़ इस अवसर पर उन्होंने कहा कि उनकी मान्यता है कि सबसे पहले यहां मुंडा लोग थे़ पूर्वी भारत से लेकर म्यांमार तक मुंडारी बोली […]
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रांची : क्रिश्चियन अल्ब्रेच्ट्स यूनिवर्सिटी, जर्मनी में लिंग्विस्टक विभाग के प्रोफेसर सह अध्यक्ष डॉ जॉन पीटरसन शुक्रवार को रांची विवि के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के विद्यार्थियों से रूबरू हुए़ इस अवसर पर उन्होंने कहा कि उनकी मान्यता है कि सबसे पहले यहां मुंडा लोग थे़ पूर्वी भारत से लेकर म्यांमार तक मुंडारी बोली जाती थी़ आंध्र प्रदेश में आज भी मुंडा भाषा के शब्द मिलते हैं.
जब इंडो आर्यन भाषाएं यहां आयीं और उनका मुंडारी से संपर्क हुआ, तब ही उस भाषा का चरित्र बदला. वे मुंडारी जैसी हो गयीं. यही कारण है कि पूर्वी और पश्चिमी भारत के इंडो आर्यन भाषाओं में काफी फर्क है़ डॉ पीटरसन ने खड़िया व्याकरण व खड़िया-अंग्रेजी शब्दकोश व कहानी संकलन लिखा है़
वर्तमान में नागपुरी/सादरी पर व्याकरण की किताब लिखना चाहते हैं. गांवों में जाकर लोगों से बातचीत कर भाषा को अच्छी तरह सीखेंगे़ इसके बाद सादरी-अंग्रेजी शब्दकोश लिखेंगे और व्याकरण तैयार करने का काम पूरा करेंगे़
मातृभाषा के बोलने वाले जैसा बोलें, वह सही
उन्होंने कहा कि कोई भाषा सही या गलत नहीं होती़ उस मातृभाषा को बोलनेवाले जो कुछ बोलते हैं, वह सही है़ भाषा वैज्ञानिकों के लिए वे शब्द मात्र हैं. इसलिए वे उन्हें नहीं आंकते़ शिक्षण संस्थानों, कार्यालयों व प्रशासनिक कार्यों के लिए भाषा के मानक होते हैं, पर इसका यह अर्थ नहीं कि अन्य शब्द गलत हैं.
लुप्त हो रही हैं भाषाएं
डॉ जॉन पीटरसन ने कहा कि दुनिया में इस समय लगभग सात हजार भाषाएं हैं. सन 2100 तक इनमें से सिर्फ दो हजार ही बचेंगी़ अगले दौ सौ वर्ष बाद पूरी दुनिया में संभवत: सौ भाषाएं ही बोली जायेंगी़ इसलिए भाषा को जितना हो सके बोलना चाहिए, उसे बचाना चाहिए़ भाषाएं क्यों लुप्त हो रही हैं? इस सवाल पर उन्होंने कहा कि माता-पिता अक्सर सोचते हैं कि यदि घर में अपनी मातृभाषा में बोलेंगे, तो बच्चे को स्कूल में दिक्कत होगी़
ऐसा ही सोच कुछ अमेरिकी जनजातियों में भी था और अंग्रेजी को प्रमुखता देने के कारण उनकी भाषाएं लुप्त हो गयीं. घर पर और बाहर, अलग-अलग भाषाएं बोली जा सकती हैं. यह सही है कि आर्थिक कारणों से कुछ महत्वपूर्ण भाषाएं जीवित रहती हैं, पर उन्हेें बोलने वाले सारे लोग अमीर नहीं हो जाते़ इससे पूर्व प्रो हरि उरांव व डॉ उमेश नंद तिवारी ने उनका स्वागत किया़ मौके पर विभाग के पूर्व एचओडी डॉ गिरिधारी राम गौंझू, साहित्यकार महादेव टोप्पो व जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के विद्यार्थी बड़ी संख्या में मौजूद थे़
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