आ गया वसंत, कहां गया हमारा एक महीने के प्रेम का उत्सव ‘मदनोत्सव’!

By Prabhat Khabar Digital Desk
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।। मिथिलेश झा ।।

जाड़े की ठिठुरन कम होने के बाद सूर्य के उत्तरायण होते ही वसंत ऋतु के दो महीने प्रकृति नयी अंगड़ाई के संकेत देने लगती है. पतझड़ के बाद जहां पेड़-पौधों में बहार आने लगती है. मानव के प्रेमी हृदय में खुमार की मस्ती छाने लगती है. आम के पेड़ों में बौर फूटने लगते हैं, कलियां धीरे-धीरे खिलती हुई मधुर मधु के प्यासे भौरों को आकृष्ट करने लगती हैं. ऐसे में कामदेव अपने पुष्प रूपी पलाश आदि पांचों बाणों को तरकश से निकाल मानव के दिल-ओ-दिमाग में बेधने लगते हैं. लोगों का मन प्रेम से भर जाता है. इसलिए वसंत को मदनोत्सव भी कहा गया है. इसे रति एवं कामदेव की उपासना का पर्व कहा गया है. इसलिए वसंत पंचमी पर सरस्वती उपासना के साथ-साथ रति और कामदेव की उपासना के गीत भारत की लोक शैलियों में आज भी विद्यमान हैं.

आ गया वसंत, कहां गया हमारा एक महीने के प्रेम का उत्सव ‘मदनोत्सव’!

भारत में बारह महीनों को छः ऋतुओं में बांटा गया है. प्रीतिपूर्वक परस्पर सहसंबंध स्थापित करने के लिए प्रत्येक जीव-जंतु के लिए भिन्न-भिन्न ऋतुएं होती हैं. मनुष्य के लिए ऋषियों ने वसंत ऋतु को ही सर्वाधिक उपयुक्त मानकर वसंत पंचमी के दिन इसके स्वागत का उत्सव मनाने का संकेत दिया. आधुनिकता की चकाचौंध में भारतीय समाज में मदनोत्सव विस्मृत-सा होकर रह गया है. मदनोत्सव काम कुंठाओं से मुक्त होने का प्राचीन उत्सव है. मदनोत्सव पर पत्नी अपने पति को अतीव सुंदर मदन यानी कामदेव का प्रतिरूप मानकर उसकी पूजा करती है.

आ गया वसंत, कहां गया हमारा एक महीने के प्रेम का उत्सव ‘मदनोत्सव’!

वसंत काम का सहचर है. इसलिए वसंत ऋतु में मदनोत्सव मनाने का विधान है. हमारे यहां काम को दैवी स्वरूप प्रदान कर उसे कामदेव के रूप में मान्यता दी गयी है. चूंकि क्रोध में भगवान शिव ने ‘काम’ को भस्म कर दिया. जब उन्हें सत्य का ज्ञान हुआ, तो उसे ‘अनंग’ रूप में फिर से जीवित किया. इसलिए ‘काम’ को साहचर्य उत्सव का दर्जा मिला. जब तक वह मर्यादा में रहता है, उसे भगवान की विभूति माना जाता है. मर्यादा छोड़ देता है, तो आत्मघाती बन जाता है. और उसी समय शिव का तीसरा नेत्र (विवेक) उसे भस्म कर देता है. भगवान शिव द्वारा किया गया ‘काम-संहार’ हमें यही समझाता है.

संस्कृत साहित्य के नाटक चारुदत्त में ‘कामदेवानुमान उत्सव’ का जिक्र है. इसमें कामदेव का जुलूस निकाला जाता था. इसी प्रकार ‘मृच्छकटिकम्’ नाटक में भी बसंत सेना इसी प्रकार के जुलूस में भाग लेती है. एक अन्य पुस्तक ‘वर्ष-क्रिया कौमुदी’ के अनुसार, इसी त्योहार में सुबह गाना-बजाना होता है, एक-दूसरे पर कीचड़ फेंकते हैं. शाम को सज-धजकर मित्रों से मिलते हैं. धम्मपद में महामूर्खों के मेला का वर्णन है. सात दिनों तक गालियों का आदान-प्रदान किया जाता था. भविष्य पुराण में बसंत काल में कामदेव और रति की मूर्तियों की स्थापना और उनकी पूजा-अर्चना का वर्णन है.

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‘रत्नावली’ में मदन पूजा का विषद वर्ण है. ‘हर्षचरित’ में भी मदनोत्सव का वर्णन मिलता है. ‘कुट्टनीमतम्’ में गणिका और वेश्याओं के साथ मदनोत्सव मनाने का वर्णन है. मदनोत्सव का वर्णन कालिदास ने भी अपने ग्रंथों में किया है. ‘ऋतुसंहार’ के छठे सर्ग में कालिदास ने बसंत का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया है. उन्होंने लिखा है कि इन दिनों कामदेव भी स्त्रियों की मदमाती आंखों की चंचलता में, उनके गालों में पीलापन, कमर में गहरापन और नितंबों में मोटापा बनकर बैठ जाता है. काम से स्त्रियां अलसा जाती हैं. मद से चलना, बोलना भी कठिन हो जाता है. टेढ़ी भौंहों से चितवन कटीली जान पड़ती है. मदनोत्सव देश के अन्य भागों तो खत्म-सा हो गया है, लेकिन शांतिनिकेतन में आज भी यह ‘दोलोत्सव’ के रूप में हर साल मनाया जाता है.

मदनोत्सव, बसंतोत्सव, कामदेवोत्सव ये सभी हमारे लोकानुरंजन के लिए आवश्यक थे, हैं और रहेंगे. प्राचीन भारत में मदनोत्सव के समय रानी सर्वाभरण भूषिता होकर पैरों को रंजित करके अशोक वृक्ष पर बायें पैर से हल्के से आघात करतीं थीं और अशोक वृक्ष पर पुष्प खिल उठते थे. चारों ओर बसंत और कामोत्सव की दुंदुभी बज उठती. कामदेव के डाकिये सब तरफ बसंत और फाल्गुनी हवाओं की पातियां बांट देते. तन-मन सब बौरा जाता.

आ गया वसंत, कहां गया हमारा एक महीने के प्रेम का उत्सव ‘मदनोत्सव’!

यही वह मौसम है, जब खेतों में गेहूं, जौ, सरसों की बालियों में निखार आने लगता है. गांव की गोरी के गालों पर रस छलकने लगता है. गुलमोहर तथा सेमल का तो कहना ही क्या? सब पत्ते (कपड़े) फेंक-फाक कर मदनोत्सव की तैयारी में जुट जाता है. मौसम के पांव धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं और छा जाती है एक नयी मस्ती. उल्लास. उमंग. और उत्सवप्रियता. प्राचीन भारत का कामोत्सव, मदनोत्सव, बसंतोत्सव और कौमुदी महोत्सव सब एक ही नाम के पर्यायवाची हैं. रंग ही रंग, उमंग ही उमंग, बौराना. मगर यह सब कहां चला गया!

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