रमजान की रूहानियत के बीच ईद की तैयारी ने पकड़ी रफ्तार
Updated at : 11 Mar 2026 7:37 PM (IST)
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रमजान के मुकद्दस महीने का 21वां रोजा बुधवार को मुकम्मल हो गया.
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मो इस्लाम.
भुरकुंडा. रमजान के मुकद्दस महीने का 21वां रोजा बुधवार को मुकम्मल हो गया. रमजान के आखिरी दिनों के साथ ही शहर हो या ग्रामीण क्षेत्र, लोग ईद की तैयारियों में जुट गये हैं. बाजारों की रौनक बढ़ गयी है. कपड़ों की दुकानों, जूते-चप्पल की दुकानें, इत्र, टोपी, सेवई, श्रृंगार स्टोर सभी जगह लोगों की भीड़ लग रही है. विशेषकर इफ्तार के बाद लोग खरीदारी के लिए पूरे परिवार के साथ निकल रहे हैं. इससे बाजार में देर शाम तक चहल-पहल बनी हुई है. वर्कलोड बढ़ जाने के कारण टेलरिंग शॉप अब सिलाई के लिए नये ऑर्डर लेने से भी कतराने लगे हैं. मार्केटिंग को लेकर बच्चों व युवा वर्ग में खासा उत्साह दिख रहा है. दुकानदारों से पूछने पर बताया कि रमजान के आखिरी दिनों में बिक्री काफी बढ़ जाती है. लोग दिल खोलकर खरीदारी करते हैं. लोग बाजार में अलग-अलग किस्म की सेवइयां व अन्य जरूरी सामान खरीद रहे हैं, ताकि ईद के दिन मेहमान नवाजी में कोई कमी न रहे. दूसरी ओर मस्जिदों में भी रमजान की रूहानी फिजा महसूस की जा रही है. पूरे महीने अदा की जाने वाली तरावीह की नमाज अब अंतिम दौर में है. कई मस्जिदों में तरावीह मुकम्मल हो चुकी है. भुरकुंडा के जामा मस्जिद में गुरुवार को तरावीह की नमाज खत्म होगी. घरों में कुरआन-ए-पाक की तिलावत व दुआओं का सिलसिला चल रहा है. कुल मिलाकर रमजान के आखिरी दिनों में इबादत, बाजारों की रौनक व ईद की तैयारियों ने माहौल को खुशनुमा बना दिया है. हर किसी को अब चांद के दीदार का इंतजार है.80 रुपये तय हुई फितरा की रकम.
इस वर्ष भुरकुंडा क्षेत्र में फितरा की रकम 80 रुपये तय हुई है. परिवार के प्रत्यक सदस्य के लिए यह रकम ईद की नमाज से पूर्व तक अदा करना अनिवार्य है. मदरसा गुलशन-ए-रजा भुरकुंडा के सचिव कारी सरफुद्दीन ने बताया कि फितरा इस्लाम में एक खास प्रकार की दान राशि है, जिसे ईद की नमाज से पहले तक गरीब व जरूरतमंद को दिया जाता है. इसका मकसद होता है कि गरीब लोग भी ईद की खुशियां मना सकें.दिल व किरदार को बेहतर बनाता है रोजा : अनवर.
प्राचार्य मौलाना अनवर हुसैन कादरी ने कहा कि ईद खुशी, मोहब्बत व भाईचारे का पैगाम लेकर आती है. रमजान का पूरा महीना हमें सब्र, परहेजगारी व इंसानियत की राह पर चलने की तालीम देता है. रोजा सिर्फ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि अपने दिल व किरदार को बेहतर बनाने का ज़रिया है. ईद के मौके पर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हमारी खुशियों में गरीब व जरूरतमंद लोग भी शरीक हों. जकात, फितरा व सदका के जरिये उनकी मदद करना हमारी जिम्मेदारी है.
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