अभियान में 13 मामलों का समाधान, सात विवाहित जोड़े फिर से हुए एक

Updated at : 21 Mar 2025 11:17 PM (IST)
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अभियान में 13 मामलों का समाधान, सात विवाहित जोड़े फिर से हुए एक

पांच दिवसीय विशेष मध्यस्थता अभियान में 13 मामलों का समाधान किया गया. साथ ही अदालतों में कानूनी लड़ाई लड़ रहे सात विवाहित जोड़ों को फिर से मिलाया गया.

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पाकुड़. झारखंड विधिक सेवा प्राधिकरण के निर्देश पर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) द्वारा 17 मार्च से शुरू होकर 21 मार्च तक चलने वाले पांच दिवसीय विशेष मध्यस्थता अभियान में 13 मामलों का समाधान किया गया. साथ ही अदालतों में कानूनी लड़ाई लड़ रहे सात विवाहित जोड़ों को फिर से मिलाया गया. पारिवारिक विवाद से संबंधित लगभग 240 मामले पारिवारिक न्यायालय, पाकुड़ में लंबित हैं. विशेष मध्यस्थता अभियान में कुल 37 मामले लिए गए, जिनमें से 13 मामलों का समाधान किया गया और सात विवाहित जोड़े पुनः एक हो गए. पाकुड़ के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश शेषनाथ सिंह ने कहा कि पाकुड़ में पारिवारिक न्यायालय द्वारा अलग हुए दम्पतियों को पुनः मिलाने का प्रयास एक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि किस प्रकार मध्यस्थता के माध्यम से पारिवारिक विवादों को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाया जा सकता है. केस स्टडी-01 : एक मामले में महिला ने अपने पति पर दहेज के लिए अत्याचार करने का आरोप लगाते हुए पारिवारिक न्यायालय में मामला दर्ज कराया था और गुजारा भत्ता की मांग की थी. सुलह-समझौते की कार्यवाही में काफी देर तक चले मान-मनौव्वल और उसके बाद मध्यस्थों की लंबी मध्यस्थता के बाद दंपती साथ रहने के लिए राजी हो गए. उन्होंने अपने डेढ़ साल के बेटे के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए यह फैसला लिया. केस स्टडी-02 : एक महिला ने भरण-पोषण के लिए मामला दायर किया था. उनकी शादी 22 मार्च 2024 को ही हुई थी. यह एक प्रेम विवाह था, जिसे लड़के के माता-पिता स्वीकार नहीं कर रहे थे. प्रधान न्यायाधीश, पारिवारिक न्यायालय पाकुड़ द्वारा लंबे समय तक सुलह के बाद उन्होंने सोचा कि यह मामला मध्यस्थता के लिए भेजा जाना उचित है. मध्यस्थता के दौरान अंततः लड़के के माता-पिता उसे अपनी बहू के रूप में स्वीकार करने के लिए सहमत हो गए. केस स्टडी-03 : एक महिला ने अपने पति के खिलाफ भरण-पोषण का मामला दायर किया था, जो चार साल से अलग रह रहा था. दो बच्चे होने के बावजूद पत्नी ने अपने मायके जाने से इनकार कर दिया, लेकिन पारिवारिक न्यायालय के न्यायाधीश के मार्गदर्शन में विशेष मध्यस्थता अभियान के दौरान दंपती ने मामले को सुलझाने के लिए सहमति व्यक्त की और अपने बच्चों के साथ रहने के लिए तैयार हो गए. दहेज की मांग को लेकर पत्नी को प्रताड़ित किया जा रहा था. वे करीब एक साल पहले अलग हो गए थे. उनकी शादी 2015 में हुई थी और विवाहेतर संबंध से उसने दो बच्चों को जन्म दिया. लेकिन बार-बार सुलह-समझौते और मध्यस्थता के बाद दम्पती अपने बच्चों के साथ रहने को राजी हो गए. केस स्टडी-04 : सात साल पहले शादी करने वाले दंपती पिछले साल मामूली मुद्दों पर अलग हो गए. जब पति द्वारा किए गए सभी प्रयास उसे वापस लाने में विफल रहे, तो उसने वैवाहिक अधिकार की बहाली के लिए पारिवारिक न्यायालय में मामला दायर किया. मामले को पक्षों के बीच मध्यस्थता के लिए भेजा गया था, लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला, इसलिए मामला विफल हो गया. लेकिन पारिवारिक न्यायालय के न्यायाधीश ने अपनी उम्मीद नहीं छोड़ी और दंपती को सुलह करने के लिए सफलतापूर्वक राजी किया. अंत में वे पति-पत्नी के रूप में एक साथ रहने के लिए सहमत हो गए. सभी जोड़ों ने एक-दूसरे को माला पहनायी और उसके बाद प्रधान जिला न्यायाधीश पाकुड़, प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय पाकुड़, डालसा सचिव और उनके परिवार के सदस्यों की उपस्थिति में मिठाई बांटी.

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