झारखंड में नहीं रूक रही है अफीम की तस्करी व खेती

राज्य में अफीम की खेती पर अब तक नकेल नहीं कसी जा सकी है
रांची : राज्य में अफीम की खेती व तस्करी रोकने के लिए पुलिस, सीआइडी, स्पेशल ब्रांच के साथ नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) सक्रिय है, इसके बावजूद नकेल नहीं कसी जा सकी है. वो भी तब जब हर साल (दिसंबर से मार्च) ये एजेंसियां पोस्ते की फसल को नष्ट करती है़ं कोरोना काल में अफीम व डोडा की खेती व तस्करी में अचानक वृद्धि हुई है़ खासकर अनलॉक शुरू होते ही राज्य में अफीम व डोडा की तस्करी में वृद्धि हुई है़
अफीम के खेती मुख्य रूप से रांची, चतरा, लातेहार, हजारीबाग, खूंटी आदि के सुदूरवर्ती इलाके की जाती है़ दिसंबर से मार्च के बीच खेती जमकर होती है़ हालांकि, राजधानी से नामकुम, बुंडू, तमाड़ के सुदूरवर्ती इलाके में खूब खेती होती है़ दिसंबर 2019 से लेकर मार्च 2020 के बीच इन इलाकों में पुलिस ने काफी सक्रियता दिखायी थी़ सैकड़ों एकड़ में पोस्ता की खेती को नष्ट भी किया गया था़ पोस्ता की खेती कराने में माओवादियों व उग्रवादियों का हाथ होता है़ गौरतलब है कि अफीम बनाने में पोस्ता का फल ही नहीं उसका डंठल (डोडा) भी काम आता है़ दोनों को रासायनिक प्रक्रिया के तहत मादक द्रव्य के रूप में तैयार किया जाता है, जिसका इस्तेमाल नशा के लिए किया जाता है़ अफीम की कीमत (बाजार मूल्य) एक से सवा लाख रुपये प्रति किलो है़
अफीम व डोडा की सप्लाई पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मुुंबई में होती है़ क्योंकि वहां इसकी ज्यादा मांग है़ अफीम का नशा करने को लेकर कई फिल्में भी बन चुकी है़
posted by : sameer oraon
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