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महासमाधि क्या है? क्रियायोग परंपरा के दिव्य संत और महासमाधि का आध्यात्मिक रहस्य

Updated at : 03 Mar 2026 2:45 PM (IST)
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Kriya Yoga

श्रीश्री स्वामी युक्तेश्वर गिरि (बाएं) और श्रीश्री परमहंस योगानंद (दाएं).

Kriya Yoga: क्रियायोग परम्परा के संत परमहंस योगानन्द और स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि की महासमाधि आध्यात्मिक चेतना का अद्वितीय उदाहरण है. उनकी शिक्षाएँ आज भी योगदा सत्संग सोसाइटी और सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप के माध्यम से विश्वभर में आत्म-साक्षात्कार और ध्यान का संदेश दे रही हैं.

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Kriya Yoga: ईश्वरीय प्रकाश से दीप्तिमान गुरु को नश्वरता प्रभावित नहीं कर सकती. जब कोई सिद्ध संत पूर्ण चेतन अवस्था में अपनी मानवीय देह का त्याग करता है, तो उस अवस्था को महासमाधि कहा जाता है. यह साधारण मृत्यु नहीं, बल्कि आत्मा की पूर्ण जागरूकता में देह से प्रस्थान है. ऐसे महापुरुष जीवन और मृत्यु दोनों में समान रूप से जागृत रहते हैं. क्रियायोग परम्परा में महासमाधि को आध्यात्मिक सिद्धि का शिखर माना गया है. यह इस सत्य का प्रमाण है कि आत्मा अनश्वर है और योग के माध्यम से मनुष्य अपनी चेतना को दिव्य स्तर तक उठा सकता है.

दो महान गुरुओं की स्मृति का महीना है मार्च

मार्च माह क्रियायोग परम्परा के दो अद्वितीय संतों की महासमाधि की याद दिलाता है. आध्यात्मिक गौरव ग्रंथ “योगी कथामृत” के लेखक परमहंस योगानन्द ने 7 मार्च 1952 को महासमाधि में प्रवेश किया. उनके गुरु, “कैवल्य दर्शनम्” के रचयिता स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि ने 9 मार्च 1936 को देह त्याग किया. दोनों गुरुओं ने अपने शिष्यों को आश्वस्त किया कि वे शरीर छोड़ने के बाद भी उनके हृदयों में सदैव विद्यमान रहेंगे. योगानन्दजी ने अपनी एक कविता में लिखा था, “अज्ञात मैं तुम्हारे साथ चलूँगा और अपने अदृश्य हाथों से तुम्हारी रक्षा करूँगा.” यह वचन आज भी करोड़ों साधकों के लिए प्रेरणा का स्रोत है.

गुरु-शिष्य परम्परा की दिव्य कड़ी

योगानन्दजी की अपने गुरु से पहली भेंट 17 वर्ष की आयु में बनारस में हुई. उनके हृदय में अपने सच्चे गुरु को पाने की तीव्र लालसा थी. जब वे श्रीयुक्तेश्वरजी से मिले, तो उन्हें वही दिव्य मार्गदर्शक मिल गया जिसकी वे खोज कर रहे थे. श्रीयुक्तेश्वरजी ने लगभग दस वर्षों तक उन्हें कठोर अनुशासन और आध्यात्मिक प्रशिक्षण दिया. यह प्रशिक्षण केवल व्यक्तिगत उन्नति के लिए नहीं, बल्कि एक वैश्विक मिशन की तैयारी थी. उनके महान गुरु को यह उत्तरदायित्व स्वयं महावतार बाबाजी से मिला था कि वे योगानन्दजी को पश्चिम में क्रियायोग के प्रसार के लिए तैयार करें. क्रियायोग की एक प्रभावी क्रिया-श्वास को एक वर्ष के प्राकृतिक मानवीय क्रमविकास के बराबर बताया गया है. यह विज्ञान साधक को तीव्र आध्यात्मिक प्रगति की ओर अग्रसर करता है.

क्रियायोग की शक्ति का प्रमाण है महासमाधि

परमहंस योगानन्दजी की महासमाधि को क्रियायोग के प्रभाव का अद्वितीय प्रमाण माना जाता है. देह त्याग के 20 दिन बाद भी उनके शरीर में क्षय के कोई चिन्ह दिखाई नहीं दिए. शवागार के निदेशक हैरी टी. रोवे ने इसे “निर्विकारता की एक अद्भुत अवस्था” बताया. यह घटना केवल एक चमत्कार नहीं, बल्कि योग और ध्यान की वैज्ञानिक शक्ति का प्रदर्शन थी. “योगी कथामृत” में उल्लेख है कि क्रियायोग रक्त को शुद्ध करता है और शरीर को कार्बनरहित बनाता है, जिससे अंत समय में भी शरीर में विकार उत्पन्न नहीं होते.

प्राचीन विज्ञान से आधुनिक युग तक

क्रियायोग कोई नवीन पद्धति नहीं, बल्कि प्राचीन आध्यात्मिक विज्ञान है. कहा जाता है कि यह ज्ञान अर्जुन को श्रीकृष्ण द्वारा प्रदान किया गया था. बाद में पतंजलि और अन्य योगियों ने इसे आगे बढ़ाया. आधुनिक युग में महावतार बाबाजी ने इसे लाहिड़ी महाशय को पुनः प्रदान किया, और गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से यह ज्ञान श्रीयुक्तेश्वरजी तथा योगानन्दजी तक पहुँचा. इस प्रकार यह दिव्य परम्परा अखंड रूप से प्रवाहित होती रही.

संस्थागत स्वरूप और वैश्विक प्रसार

क्रियायोग की शिक्षाओं को व्यापक रूप से पहुंचाने के लिए श्रीयुक्तेश्वरजी ने एक संस्था की स्थापना पर बल दिया. इसी प्रेरणा से योगानन्दजी ने 1917 में रांची में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की. बाद में 1920 में लॉस एंजेलिस में सेल्फ-रीयलाइजेशन फेलोशिप की नींव रखी गई. इन संस्थाओं के माध्यम से आज भी गृह अध्ययन पाठमाला द्वारा ध्यान की वैज्ञानिक विधियां सिखाई जाती हैं. साधक क्रमबद्ध निर्देशों के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार की ओर अग्रसर होते हैं.

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शिक्षाएं ही शाश्वत गुरु

परमहंस योगानन्दजी ने कहा था, “मेरे जाने के बाद मेरी शिक्षाएँ ही गुरु होंगीं.” उनका यह कथन दर्शाता है कि सच्चे गुरु का अस्तित्व केवल शरीर तक सीमित नहीं होता. उनकी शिक्षाएं, उनका प्रेम और उनका आध्यात्मिक स्पर्श शिष्यों के जीवन में सदैव सक्रिय रहता है. क्रियायोग परम्परा के ये दिव्य संत आज भी अपनी शिक्षाओं के माध्यम से मानवता को यह संदेश देते हैं कि आत्मा अमर है, और योग के द्वारा मनुष्य अपने भीतर स्थित परमात्मा को अनुभव कर सकता है. महासमाधि उनके जीवन की अंतिम घटना नहीं, बल्कि अनंत चेतना में प्रवेश का उत्सव है.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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