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मैदान पाठ माइंस बंद होते ही रंगड़ा-खंभन में पसरा सन्नाटा, बुनियादी सुविधाओं से मरहूम हैं ग्रामीण

मैदान पाठ माइंस बंद होते ही रंगड़ा-खंभन में पसरा सन्नाटा, बुनियादी सुविधाओं से मरहूम हैं ग्रामीण

किस्को़ किस्को प्रखंड की हिसरी पंचायत अंतर्गत रंगड़ा और खंभन गांव आज विकास की दौड़ में दशकों पीछे छूट गये हैं. कभी मैदान पाठ माइंस की रौनक से गुलजार रहने वाले इन गांवों में अब सिर्फ सन्नाटा और बदहाली का बसेरा है. वर्ष 1997-98 में लीज समाप्त होने के बाद जब कंपनी ने खनन कार्य बंद किया, तो वह अपने पीछे गहरे खतरनाक गड्ढे और मजदूरों की टूटी उम्मीदें छोड़ गयी. आज यहां के ग्रामीण खंडहर हो चुके क्वार्टरों में रहने को मजबूर हैं और विकास की बाट जोह रहे हैं. हाथों में बंद घड़ियां और रेडियो की पुरानी यादें : माइंस संचालन के दौर में यहां के लोगों के पास रोजगार था, लेकिन अब हाथ खाली हैं. ग्रामीणों के पास अतीत की निशानी के तौर पर सिर्फ वह पुरानी घड़ियां बची हैं जो अब समय नहीं बतातीं, और कुछ पुराने रेडियो हैं जिनके जरिये वे दुनिया की खबरों से जुड़े रहने की कोशिश करते हैं. सरकार की ””””अंतिम व्यक्ति तक विकास”””” की योजनाएं इन गांवों की पथरीली राहों पर आकर दम तोड़ देती हैं. रिश्तों पर भी पड़ी विकास की मार, न कोई आता है न कोई जाता है : ग्रामीणों का कहना है कि 100 वर्षों तक यहां खनन होने के बावजूद गांव के लिए कुछ नहीं किया गया. बदहाली का आलम यह है कि इन गांवों में अब कोई अपनी बेटी की शादी नहीं करना चाहता और न ही यहां के लड़कों को आसानी से रिश्ते मिलते हैं. प्रशासन के बड़े अधिकारियों ने कई बार गांव का जायजा लिया, लेकिन सड़क के अलावा कोई वादा पूरा नहीं हुआ. नल-जल योजना के तहत खड़ा किया गया जलमीनार का ढांचा आज सिर्फ ””””शोभा की वस्तु”””” बनकर रह गया है. न बिजली, न पानी : डोभा-चुआं का गंदा पानी पीने की मजबूरी : नक्सल प्रभावित इस क्षेत्र में उरांव और लोहार समुदाय के करीब 50 परिवारों के 500 लोग रहते हैं. जहां सरकार हर घर शुद्ध जल का दावा करती है, वहीं ये लोग आज भी डोभा और चुआं का दूषित पानी पी रहे हैं. गांव में अब तक बिजली नहीं पहुंची है, जिससे लोग ””””ढिबरी युग”””” में रहने को विवश हैं. बिजली के अभाव में न खेती हो पा रही है और न ही बच्चे रात में पढ़ पाते हैं. इसके अलावा, जंगली जानवरों, सांप और बिच्छुओं का डर हमेशा बना रहता है. जिससे बच्चों व मवेशियों को समय-समय पर नुकसान होते रहता है. शिक्षा व्यवस्था शून्य, मवेशियों का तबेला बना सरकारी स्कूल : गांव का एकमात्र विद्यालय भवन खंडहर में तब्दील हो चुका है. वहां कभी पढ़ाई नहीं होती, बल्कि असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है या लोग अपने मवेशी बांधते हैं. स्वास्थ्य सुविधाओं का नामोनिशान नहीं है. नेटवर्क की समस्या और शौचालय का न होना ग्रामीणों की मुश्किलों को और बढ़ाता है. विडंबना देखिये कि गांव के बाहर ””””ओडीएफ”””” (शौच मुक्त) का बोर्ड लगा है, जबकि हकीकत में एक भी शौचालय सही स्थिति में नहीं है. रोजगार के नाम पर लोग सिर्फ जंगल से लकड़ी बेचकर किसी तरह अपना पेट पाल रहे हैं.

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