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प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन घातक

Updated at : 05 Jun 2019 4:58 AM (IST)
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प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन घातक

आज गायब हो गये तालाब और जंगल पारा 43 डिग्री पारकरने को बेकरार लोहरदगा : प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन आने वाले दिनों में और विकराल रूप लेगा. तेजी से बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण ने लोगों को परेशान कर रखा है. यदि लोहरदगा की बात करें तो बुजुर्गों का कहना है कि यहां थोड़ी भी गर्मी […]

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आज गायब हो गये तालाब और जंगल

पारा 43 डिग्री पारकरने को बेकरार
लोहरदगा : प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन आने वाले दिनों में और विकराल रूप लेगा. तेजी से बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण ने लोगों को परेशान कर रखा है. यदि लोहरदगा की बात करें तो बुजुर्गों का कहना है कि यहां थोड़ी भी गर्मी बढ़ने से तुरंत पानी बरस जाती थी. लेकिन अब तापमान 43 डिग्री तक पहुंच जाना आम बात हो गयी है. लोहरदगा जिला में जिस तीव्र गति से पेड़ काटी गयी है उसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं है. पेशरार इलाका में किसी जमाने में इतने घने जंगल थे कि वहां के जमीन पर सूरज की रोशनी भी नहीं पहुंचती थी.
लेकिन इसी इलाके से सबसे ज्यादा पेड़ काटे गये. स्थिति बदली और आज लोग शहर हो या गांव हर जगह पीने की पानी के लिए परेशान हैं. स्थिति काफी भयावह है. कोयल और शंख नदी में पानी की एक बूंद भी नजर नहीं आ रही है. वाटर लेबल लगभग 10 फिट नीचे चला गया है. ताबड़तोड़ हो रही बोरिंग के कारण भी जलस्तर पाताल छू रहा है. पहले 15-16 फिट में पानी निकलता था.
लेकिन अब स्थिति बदल गयी है. शहरी क्षेत्र में एक हजार फिट की गहराई में भी लोगों को पानी नहीं मिल रहा है. वहीं भंडरा प्रखंड ड्राइ जोन है जहां 1500 फिट की बोरिंग में भी पानी मिलना मुश्किल हो गया है. पर्यावरण संरक्षण करने की बात सिर्फ भाषणों तक ही सिमट कर रह गयी है. जंगल, पहाड़, तालाब, नाला, गायब हो चुके हैं. जलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है. किसी जमाने में इस क्षेत्र का ओयना टोंगरी काफी प्रसिद्ध था लेकिन लगातार पत्थर तोड़ने और क्रशर चलने के कारण यह पहाड़ मैदान का रूप लेता जा रहा है.
लोहरदगा के तालाब कभी इस इलाके की शान हुआ करते थे. लेकिन आज तालाबों का अस्तित्व ही समाप्त होता जा रहा है. महारानी विक्टोरिया ने लोहरदगा में जेल में बंद कैदियों से तालाब की खुदाई करायी थी. लेकिन आज यह तालाब भी लगातार अतिक्रमण के आगोश में सिमट कर कटोरा का रूप ले रहा है. वृक्ष लगाये, वृक्ष बचाये का नारा दिवारों तक ही सिमट कर रह गया है. विभिन्न समारोहों में वृक्ष लगाये जाते हैं लेकिन इनमें से कितने वृक्ष समरोह समाप्त होने के बाद बचते हैं इसकी जानकारी शायद ही किसी को हो.
आधुनिकता के दौर में जीवन शैली, वाहनों की बढ़ती संख्या, जैविक कचरे, प्लास्टिक, थर्मोकॉल का धड़ल्ले से उपयोग आज पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है.अभी भी वक्त है कि विश्व पर्यावरण दिवस पर कहने के बजाय कुछ धरातल पर किया जाये. क्योंकि वृक्ष है तो जीवन है. नहीं तो जिस तरह से जंगलों से जानवर शहर की ओर आ कर अपनी जान गंवा रहे हैं उसी तरह मनुष्य भी पानी की तलाश में भटकने को विवश होगा.
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