लोहरदगा : शहरी क्षेत्र में लोगों को पीने की पानी की समस्या से जूझना पड़ रहा है. लोगों को पानी के लिए भटकना पड़ रहा है. शहरी क्षेत्र में पेयजलापूर्ति 4-5 दिनों के अंतराल में की जा रही है. जिससे लोगों को पीने का पानी नहीं मिल पा रहा है. शहरी क्षेत्र में पानी की सप्लाइ कोयल नदी तथा शंख नदी से होती है लेकिन दोनों नदियां सूख चुकी है. शहरी क्षेत्र में लोगों को रोजाना साढ़े पांच लाख गैलन पानी की आवश्यकता है. इसके विपरीत शहरी क्षेत्र में मात्र 3-4 दिनों में तीन लाख गैलन पानी की आपूर्ति की जा रही है.
कोयल में बनाया गया कुआं सूखने के कगार पर है. वहीं इंटेकवेल का निर्माण कार्य अधूरा पड़ा है. अब लोगों को पीने के पानी के लिए भटकना पड़ रहा है. शहरी क्षेत्र का कुंआ और चापाकल भी सुख रहा है. शहरी क्षेत्र में लगभग 26 सौ कनेक्शनधारी हैं. लोग पानी के लिए त्राहिमाम हैं. दिन में पानी का जुगाड़ नहीं होने पर लोग रात में भी पानी की व्यवस्था में लग जाते हैं.
दक्षिण कोयल नदी में तीन के जगह बना एक जल कूप : दक्षिण कोयल नदी में तीन जल कूप बनाना था लेकिन सिर्फ एक जल कूप ही बना. वह भी बराबर खराब होता रहा है. बरसात के दिनों में जल कूप पानी में डूब जाता है. गर्मी के मौसम में पानी का जलस्तर इतना नीचे हो जाता है कि जलापूर्ति ठप हो जाती है. नदियों के सूखने का एक कारण यह भी है कि यहां अवैध तरीके से बालू का उठाव लगातार होता रहता है.
जलस्तर यथावत रहे इसका कोई प्रयास पहले से नहीं किया जाता. बीते वर्ष टैंकर के माध्यम से पीने के पानी की व्यवस्था लोगों को कराया गया था. इस वर्ष मई महीने में भी इसकी व्यवस्था नहीं की गयी है. खराब चपाकलों की मरम्मत नहीं होने से लोग सप्लाइ पानी पर ही निर्भर हैं. जिसके कारण लोगों को और भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.
पेयजल की समस्या लोहरदगा के लिए कोई नयी बात नहीं है. हर साल मई महीने में पानी के लिए हाहाकार होता है बावजूद इसके नगर परिषद समस्या के प्रति उदासीन बना हुआ है. मई महीने में ही नगर परिषद द्वारा लोगों तक पानी पहुंचाने के लिए स्कीम तैयार किया जाता है बाद में आधा-अधूरा काम कर छोड़ दिया जाता है जिससे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है. लोहरदगा में आग लगने पर कुआं खोदने वाली कहावत चरितार्थ हो रही है.
ग्रामीण इलाकों में भी पानी के लिए हाहाकार : शहरी क्षेत्र के अलावा ग्रामीण इलाकों में भी पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है. ग्रामीण इलाकों ने लोग ज्यादा परेशान हैं जो पठारी क्षेत्र में रहते हैं. जिले के विभिन्न प्रखंडों में रहनेवाले वैसे गांवों के लोग जो पहाड़ी क्षेत्र में रहते हैं पानी के लिए परेशान हैं. पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण कुआं का जलस्तर पाताल में चला गया है. चापाकल ओर सोलर अाधारित पेयजलापूर्ति योजना भी न काफी साबित हो रही है. लोग दूर-दराज से पानी की व्यवस्था कर अपना काम चलाने को विवश हैं.
नदी-नाला,चुआं, कुआं सुखने के कगार पर: किस्को प्रखंड क्षेत्र का अधिकांश गांव या तो पहाड़ों पर है या फिर पहाड़ी क्षेत्र में. यहां के लोग पानी के लिए काफी परेशान हैं. पहाड़ी क्षेत्र का नदी-नाला, चुआं, कुआं सुखने के कगार पर है. किस्को प्रखंड के बगरू पंचायत के पतरातु महुआ टोली में लोग पानी के लिए दर-दर भटक रहे हैं. पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहां गर्मी बेतहासा बढ़ रही है. ऐसे में पानी की कमी लोगों के लिए परेशानी पैदा कर रही है. महुआ टोली में लगभग 30 परिवार के लोग रहते हैं गांव में सात चापाकल है.
इसमें से एक भी चापाकल चालू हालत में नहीं है सभी चापाकल खराब पड़े हैं. गांव में एक कुआं है जिस पर पूरे गांव के लोग निर्भर रहते थे. अब कुआं भी गर्मी के कारण सूख चुका है जिससे लोगों को पानी के लिए भारी कठिनाई का सामना करते हुए एक किलोमीटर दूर पहाड़ के किनारे से गुजरे हुए भालडोंगरा नदी से पानी पीना पड़ता है. नदी में भी पानी की कमी है लोग किसी तरह नदी में गड्ढा खोद कर पानी लाते हैं. गंदा पानी पीने से लोगों में बीमारी बढ़ने का खतरा है़ तेज धूप में भी महिलाएं एक किलोमीटर दूर नदी से पानी लाती हैं.
नदी तक जाने के लिए रास्ता भी नहीं है. इस गांव के लोग पीने की पानी के लिए परेशान हैं. पानी लाने को लेकर घर में विवाद तक उत्पन्न हो जा रहा है. गांव की नमी देवी, तेतरी उरांइन, मंगरी उरांव, सुको उरांव, सारो उरांव, बिरसी उरांव, सोमरी उरांव, अंगनी उरांव, रेणु उरांव, लीला उरांव, का कहना है कि सुबह होते ही हम लोगों के समक्ष पानी की समस्या खड़ी हो जाती है़ सुबह होते ही सभी महिलाएं पानी लाने के लिए नदी की ओर निकल पड़ती हैं जहां से पानी लाने के बाद ही खाना बना पाती है. महिलाओं का कहना है कि सभी चापाकल खराब पड़े हैं इसे बनाने की चिंता किसी को नहीं है.