मनुष्य को कर्मयोगी बनने के लिए प्रेरित करती है भागवत कथा

Edited by MANOJ KUMAR
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कथावाचक ने सुनाया राजा परीक्षित संवाद, ध्रुव चरित्र का प्रसंग. कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण मनुष्य को कर्मयोगी बनने के लिए प्रेरित करता है.

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नाला. प्रखंड क्षेत्र के बड़ारामपुर पंचायत के अंतर्गत बर्धनडंगाल गांव में आयोजित सात दिवसीय संगीतमयी श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ कथा के दूसरे दिन कथावाचक अद्वैत पंडित महाराज ने कई कथा प्रसंग सुनाए. राजा परीक्षित संवाद, शुकदेव जन्म, नारद के उपदेश, विदुर संवाद, ध्रुव चरित्र आदि प्रसंग के बारे में मधुर वर्णन कर श्रोता, भक्तों को भावविभोर कर दिया. कथावाचक ने शुकदेव-परीक्षित संवाद का वर्णन करते हुए कहा कि एक बार परीक्षित महाराज आखेट के लिए वन गए. वन्य पशुओं का पीछा करते हुए वे काफी थक गए. उनको प्यास लगी तो वन में पानी की खोज करने लगे. वन में एक कुटिया दिखायी दी जो समीक ॠषि की कुटिया थी. वहां राजा परीक्षित ने समीक ऋषि से पानी मांगा. ऋषि साधना में लीन थे, इसलिए पानी नहीं पिला सके. परीक्षित के मन में राजसिक भाव उत्पन्न हुआ एवं सोचा कि साधु ने अपमान किया है. राजा परीक्षित के मुकुट पर कलि महाराज विराजमान था. इसलिए कलि के प्रभाव से मन में नकारात्मक विचार उत्पन्न हुआ और उन्होंने पास में पड़ा एक मृत सर्प को धनुष की नोंक पर उठाया और समीक ऋषि के गले में डाल दिया. यह सूचना पास में खेल रहे बच्चों ने समीक ऋषि के पुत्र को दी. ऋषि पुत्र काफी क्रोधित हुए एवं कमंडल के जल को मंत्रयुत कर राजा परीक्षित को श्राप दिया कि आज से सातवें दिन तक्षक नामक सर्प आएगा और राजा को जलाकर भस्म कर देगा. कथावाचक ने प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए कहा कि समीक ऋषि को दिव्य ज्ञान से पता चला तो बेटा ॠषिसृंग को कहा कि यह तुमने अच्छा नहीं किया. कहा कि वह महान धर्मात्मा राजा परीक्षित हैं और यह अपराध इन्होंने कलि महाराज के वशीभूत होकर ऐसा किया है. कहा कि राजा परीक्षित के राज में प्रजा काफी सुखी है. मुनि, ब्राह्मण सब निर्विवाद ध्यान योग करते हैं. इनके चले जाने से राज्य व्यवस्था अव्यवस्थित हो जाएगी. समीक ऋषि राज दरबार पहुंचे एवं समंत वृत्तांत परीक्षित महाराज को बताया. राजा परीक्षित ने समीक ॠषि का आदर करते हुए कहा कि उसने बहुत अच्छा कार्य किया है. समीक ॠषि से मोक्ष के उपाय पूछने पर बताया गया कि श्रीमद्भागवत कथा सुनने से मोक्ष प्राप्त हो सकता है. समीक ॠषि से सारी बातें सुनने के पश्चात अपना राज्य अपने पुत्र जन्मेजय को सौंपकर परीक्षित गंगा नदी के तट पर पहुंचे. वहां बड़े ऋषि, मुनि देवता आ पहुंचे और अंत में व्यास नंदन शुकदेव वहां पहुंचे. शुकदेव को देखकर सभी ने खड़े होकर उनका स्वागत किया. शुकदेव ने परीक्षित महाराज को श्रीमद्भागवत महापुराण का एक-एक अध्याय सुनाया एवं अंत में राजा परीक्षित को मोक्ष प्राप्त हुआ. कथावाचक द्वारा इस मार्मिक प्रसंग को सुनकर श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो गए. कथा के दौरान धार्मिक गीतों पर श्रद्धालु जम कर झूमे. कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण एक ऐसा ग्रंथ है जो मनुष्य को कर्मयोगी बनने के लिए प्रेरित करता है. इसलिए यह सब पुराणों में श्रेष्ठ है.

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