बिंदापाथर. लायबनी गांव में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कथावाचक पंडित कुलदीप कृष्ण महाराज ने “प्रेमावतार श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के अवतार लीला महिमा ” प्रसंग का मधुर वर्णन किया. प्रसंग में कथावाचक ने व्याख्यान करते हुए कहा कि कलियुग में केवल हरिनाम से ही उद्धार हो सकता है. हरिनाम के अलावा कलियुग में उद्धार का अन्य कोई भी उपाय नहीं है. कलियुग में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण राधिका के भाव और अंगकान्ति को लेकर श्री गौरांग रूप में अवतीर्ण होंगे. वे अपने परिकरों के साथ विविध प्रकार की लीलायें करते हुए सर्वसाधारण में श्री हरिनाम संकीर्तन प्रचार के माध्यम से कृष्णा प्रेम का वितरण करेंगे. गोपाल-चक्रवर्ती सप्त ग्राम के प्रसिद्ध श्री हिरण्य और गोवर्धन दास मजूमदार का राज्य कर्मचारी था. यह बड़ा पंडित और रूपवान था. एक दिन श्री हिरण्य-गोवर्धन की राज सभा में राजपुरोहित श्री बलराम पंडित श्री हरिदास ठाकुरजी को लेकर उपस्थित हुए. हरिदास ठाकुरजी प्रसंगवश श्री हरिनामका माहात्म्य वर्णन करने लगे. हरिदास ठाकुरजी ने कहा- “एक शुद्ध-हरिनाम के उच्चारण की बात ही क्या, नामाभास से भी अनायास ही मुक्ति मिल जाती है. शुद्ध हरिनाम से तो भागवत-प्रेम की प्राप्ति होती है, जिस प्रेम के द्वारा वैकुंठ एवं तदुपरि श्री गोलोक धाम की प्राप्ति होती है. “गोपाल हरिदास ठाकुर की बात सुनकर अत्यंत क्रुद्ध हो गया. वह उनके प्रति अपमान-जनक शब्दों का प्रयोग कर हरिदास ठाकुर का तिरस्कार करने लगा और यह कहते हुए सभा-स्थल का परित्याग किया, “मुक्ति तो केवल ज्ञान के द्वारा ही प्राप्त होती है, हरिनाम के द्वारा कदापि मुक्ति नहीं मिल सकती. यदि हरिनाम के द्वारा मुक्ति मिले तो मेरी नाक गलकर गिर जाय अन्यथा यदि हरिदास की बात गलत हो तो उसकी नाक गलकर गिर जाय. ” सभा में हाहाकार मच गया, बलराम प्रभु ने कहा, “तुमने परम वैष्णव हरिदास ठाकुरजी के चरणों में अपराध किया है, तुम्हारा कभी भी कल्याण नहीं हो सकता. इस भयंकर वैष्णव-अपराध से तुम्हारा सर्वनाश होना निश्चित है. “गोवर्धन दासजी ने भी उस गोपाल चक्रवर्ती को नौकरी से निकाल दिया. क्षमा की मूर्ति परम-भागवत श्री लहरी दास ठाकुरजी द्वारा गोपाल का कुछ अपराध न लेने पर भी तीसरे दिन ही उस विप्रको कुष्ठ-व्याधि लग गयी. उसकी चंपक-पुष्प के समान सुंदर नासिका, हाथ तथा पैरों की अंगुलियां गलकर गिर गयी. श्री मन्महा प्रभु बहुत दिनों के पश्चात कुलिया ग्राम में पधारे, तब यह गोपाल-चक्रवर्ती भी यहीं आकर बहुत आर्तनाद करता हुआ. उनके शरणागत हआ और अपने पूर्वकृत-वैष्णव-अपराध के लिए पुन: क्षमा मांगने लगा. महावदान्य चैतन्य महाप्रभुजी ने उस नामापराधी ब्राह्मण को क्षमा कर दिया और उसे निरंतर हरिनाम करने का उपदेश दिया. कुछ ही दिनों में हरिनाम करते-करते उसकी कुष्ठ-व्याधि दूर हो गयी और पूर्ववत सुंदर सुकांत हो गया. अब यह नाम परायण भागवत-भक्त होकर दास बन गया. एक दूसरा नवद्वीप वासी चापाल गोपाल बहुत ही दुराचारी ब्राह्मण था. श्री वास पंडित के घर हरि-संकीर्तन होता था, जिसको वह सहन नहीं कर पाता था. इसलिए वह श्री वास पडित के प्रति द्वेष करने लगा और तरह-तरह से उन्हें कष्ट देने की चेष्टा करता. मद्यभांड में (पात्र में) सिन्दूर इत्यादि अनेक अपवित्र वस्तुओं को लेकर रात्रिकाल में उनके द्वार पर रख देता. श्री वास पंडित उसको फिकवा कर उस स्थान को गोबर से लिपवा देते थे. कुछ ही दिनों में इस महत-अपराध से उसे कुष्ठ रोग हो गया. संन्यासोपरांत श्री महाप्रभु जी के कुलिया में आने पर उनके श्री चरणों में गिरकर रोने लगा. महाप्रभु जी ने उसे श्रीवास पंडित जी से क्षमा मांगने को कहा. उसने श्रीवास पंडित के चरणों में गिरकर रोते हुए क्षमा मांगी और पुन: महाप्रभुजी की कृपा से पूर्ववत स्वस्थ और निरोग हो गया. धार्मिक कथा के साथ-साथ सुमधुर भजन संगीत भी प्रस्तुत किया गया, जिससे उपस्थित श्रोता-भक्त भावविभोर होकर कथा स्थल पर भक्ति से झूमते रहे.
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