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गुमरो पहाड़ धार्मिक स्थान के साथ-सात पिकनिक स्पॉट के लिए है प्रसिद्ध

Updated at : 16 Dec 2024 7:29 PM (IST)
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गुमरो पहाड़ धार्मिक स्थान के साथ-सात पिकनिक स्पॉट के लिए है प्रसिद्ध

जामताड़ा जिले के सीमावर्ती क्षेत्र के मसलिया प्रखंड स्थित प्रसिद्ध गुमरो पहाड़ एक पिकनिक स्पॉट के साथ-साथ धार्मिक स्थान भी है.

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फतेहपुर. जामताड़ा जिले के सीमावर्ती क्षेत्र के मसलिया प्रखंड स्थित प्रसिद्ध गुमरो पहाड़ एक पिकनिक स्पॉट के साथ-साथ धार्मिक स्थान भी है. इस पहाड़ का इतिहास पहाड़िया जनजाति से जुड़ा है. कभी पहाड़िया राजा इस क्षेत्र में राज करते थे और उनका कुल देवता हुआ करते थे बाबा पहाड़. बाद में बदलाव आया और झुमरी तिलैया से आये सिंह राजाओं ने अपना आधिपत्य जमाया. पहाड़ की खासियत बड़े-बड़े चट्टानों से घिरा है. बता दें कि 490 फिट ऊंचा व 400 बीघा के विशाल भू-भाग में फैला यह पहाड़ रमणीक के साथ-साथ सुंदरता को भी बिखेरता है. पहाड़ में कुल चार चोटियां हैं. इस कारण जिले के नामचीन पर्यटन स्थलों में से एक है, जिसे कोई भी देखकर एक बार सैर करने का मन बना लेता है. पहाड़ के नीचे है पहाड़ बाबा का थान पहाड़ के नीचे विद्यमान पहाड़ बाबा थान जो एक बड़े से पत्थर पर लाल सिंदूर लगाये सुशोभित है. पहले यह मिट्टी से घिरा हुआ था. वर्तमान समय में सीमेंट का चबूतरा बनाकर शीला को रखा गया है. पहाड़ बाबा पर क्षेत्र के लोगों में अपार आस्था टिका है. आस्था इस कदर है कि बच्चे, बूढ़े, जवान के मुख से पहाड़ बाबा का नाम सुन सकते हैं. कोई भी शुभ मुहूर्त में बाबा को स्मरण या नये फल अन्न बनने पर पहले बाबा को चढ़ाया जाता है. आज भी सालाना पूजा अंतिम सावन को राजपरिवार के वंशजों की ओर से की जाती है. पहाड़ के ऊपरी टीले पर मानव के पैरों व बाघ के पैरों के चिह्न की नक्काशी चट्टानों पर उभरी हुई है. लोगों में मान्यता है कि यह बाबा पहाड़ का पद चिह्न है, जो अंतिम चोटी तक पहुंचता है उसे यह दिखाई देता है. -पहाड़ पर रहता है जीव-जंतुओं का बसेरा, पर नहीं पहुंचाता नुकसान पहाड़ पर बाघ, शेर, लकड़बघ्घा, बंदर, वन सुकर, भेड़िया, सियार, लंगूर, मोर, तीतर, अजगर, कोबरा, बिच्छू, गोजर जैसे जीव-जंतुओं का बसेरा है. हिंसक जानवरों के रहते भी किसी को कोई नुकसान नहीं होता. मनुष्य तो दूर की बात भेड़, बकरी, गाय, बैल आदि पहाड़ पर चरते हैं, पर आज तक क्षति नहीं पहुंचाया है. इस बात को लोग अचंभा मानते हैं. यूं कहें कि पहाड़ी बाबा की कृपा है. पहाड़ के इस सुंदर दृश्य को देखकर चट्टानों व मनोरम दृश्य को देख अंग्रेजों ने भी अहमियत दी थी. पिकनिक मनाने व स्कूली बच्चों के कैंप के लिए बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा आदि राज्यों से सैलानी पहुंचते हैं. बड़े चट्टानों पर क्लाइंबिंग का लुत्फउठाते हैं. पहाड़ की तलहटी में बना चापाकल पतंजलि पानी के नाम से प्रसिद्ध है. सैकड़ों गांवों के लोग डब्बों में भर कर घर ले जाकर पीते हैं. लोगों का अनुभव है कि पानी में औषधीय गुण विद्यमान हैं, जिससे पेट की कई छोटी मोटी समस्याओं से निजात मिलती है. – पहाड़ का आकर्षण है मानव आकृति का चट्टान सड़क किनारे पहाड़ में एक खास प्रकार के 20 मीटर चट्टान के ऊपर लदा चट्टान इस प्रकार दिखता है कि मानव बैठा हो. मानव आकृति के इस चट्टान को राहगीर इसे कुदरत की करिश्मा मानते हैं. पहाड़ के ऊपर झांकने पर ऊपरी हिस्से पर आज भी एक खंडहर भवन दिखता है, जो इस बात का गवाह है कि अंग्रेजों के समय यहां वायरलेस कंपनी आसनसोल से सीधा संपर्क के लिए टावर लगवाया था. इसके लिए पहाड़ पर वाहन चढ़ने का रास्ता भी बनाया गया है. पाताल पूरी कुआं व सोने का घड़ा का जिक्र भी लोगों से करते सुना जाता है. इसके अलावा पहाड़ में हजारों किस्म के दुर्लभ जड़ी बूटियों का भी भंडार है. सतमुल, कामराज, भीमराज, चिरायता, कालमेघ, सतावर, अश्वगंधा आदि हैं. ग्रामीण इलाकों में लाइलाज रोग होने के बाद पूर्व के वैद्य जड़ी बूटी ढूंढने पहाड़ आते थे और पहाड़ के जड़ी को न्योता देकर उसके अगले दिन नियमपूर्वक उठाकर बाबा पहाड़ के नाम पर पीस कर पिलाने से रोग का निवारण होता था. आज भी कई लोग हैं जो इस कला को बचाये हुए हैं. नववर्ष पर लोगों से चारों ओर से घिरा रहता है पहाड़ नववर्ष के समय पहाड़ चारों ओर से लोगों से घिरा रहता है. लोग डीजे साउंड के साथ दिनभर पिकनिक का आनंद उठाकर शाम को घर निकल जाते हैं. आसपास के गांव जेरूवा, मोहलीडीह, खिलकनाली, पारबाद, गुमरो, बटुबथान, रांगामटिया, खेड़बोना, सितकोहबर, करमाटांड़, धोखरा, जरगड़ी, नवजोड़ा, सिरमाकाजल, गुंदलिया, मसानजोर, सिदपहरी, गोलबाजार, पहाड़पुर, छोटा तेतरिया डंगाल, बांक आदि गांवों के लोग सपरिवार चूल्हा-चौका जलाकर भोजन बनाकर वनभोज का लुत्फ उठाते हैं. कैसे पहुंचे गुमरो पहाड़ दुमका शहर से 35 किलोमीटर दूर स्थित गुमरो पहुंचने के लिए केराबनी मिशन के लिए बसें चलती है. वहां से फतेहपुर-पालाजोरी सड़क का रास्ता ऑटो रिक्शा चार किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय कर सड़क किनारे गुमरो पहाड़ आता है.

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