भागवत भाव और भक्ति प्रधान ग्रंथ है : संजय शास्त्री

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कथावाचक संजय शास्त्री जी महाराज ने कहा कि भागवत अवरोध मिटाने वाली उत्तम अवसाद है.

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नारायणपुर. प्रखंड के सिकदारडीह गांव में चल रहे सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन शनिवार को कथावाचक संजय शास्त्री जी महाराज ने कहा कि भागवत अवरोध मिटाने वाली उत्तम अवसाद है. भागवत का आश्रय करने वाला कोई भी दुखी नहीं होता है. भगवान शिव ने सुकदेव बनकर सारे संसार को भागवत सुनाई है. श्रोताओं को कर्मों का सार बताते हुए कहा कि अच्छे और बुरे कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है. उन्होंने भीष्म पितामह का उदाहरण देते हुए कहा कि भीष्म पितामह 6 महीने तक वाणों की शैय्या पर लेटे थे, जब भीष्म पितामह वाणों की शैय्या पर लेटे थे तब वे सोच रहे थे कि मैंने कौन सा पाप किया है जो मुझे इतने कष्ट सहन करना पड़ रहे हैं उसी वक्त भगवान कृष्ण भीष्म पितामह के पास आते हैं तब भीष्म पितामह कृष्ण से पूछते है कि मैंने ऐसे कौन से पाप किये हैं कि वाणों की शैय्या पर लेटा हूं, पर प्राण नहीं निकल रहे हैं, तब भगवान कृष्ण ने भीष्म पितामह से कहा कि आप अपने पुराने जन्मों को याद करो और सोचो कि आपने कौन सा पाप किया है. भीष्म पितामह बहुत ज्ञानी थे. उन्होंने कृष्ण से कहा कि मैंने अपने पिछले जन्म में रतीभर भी पाप नहीं किया है. इस पर कृष्ण ने उन्हें बताते हुए कहा कि पिछले जन्म में जब आप राजकुमार थे और घोड़े पर सवार होकर कहीं जा रहे थे. उसी दौरान आपने एक नाग को जमीन से उठाकर फेंक दिया तो कांटों पर लेट गया था पर 6 माह तक उसके प्राण नहीं निकले थे. उसी कर्म का फल है जो आप 6 महीने तक वाणों की शैय्या पर लेटे हैं. इसका मतलब है कि कर्म का फल सभी को भुगतना होता है. इसलिए कर्म करने से पहले कई बार सोचना चाहिए. भागवत भाव प्रधान और भक्ति प्रधान ग्रंथ है. भगवान पदार्थ से परे है, प्रेम के अधीन है. प्रभु को मात्र प्रेम ही चाहिए. अगर भगवान की कृपा दृष्टि चाहते हैं तो उसको सच्चाई की राह पर चलना चाहिए. भगवान का दूसरा नाम ही सत्य है. सत्यनिष्ठ प्रेम के पुजारी भक्त भगवान के अति प्रिय होते हैं.

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