Jamshedpur News : सिलिकोसिस पीड़ितों की लड़ाई लड़ने वाले खुद हो गये इस लाइलाज बीमारी के शिकार

Updated at : 04 Nov 2025 1:06 AM (IST)
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जमशेदपुर (फाइल फोटो)

जिले में लड़ने वाले ओशाज इंडिया के महासचिव समित कुमार कार खुद अब घातक बीमारी सिलिकोसिस से ग्रसित हो गये हैं.

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सिलिकोसिस एक लाइलाज और धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है

Jamshedpur News :

जिले में सिलिकोसिस पीड़ित मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले और उन्हें मुआवजा दिलाने के लिए वर्षों से संघर्ष कर रहे ऑक्यूपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ एसोसिएशन ऑफ झारखंड (ओशाज इंडिया) के महासचिव समित कुमार कार खुद अब घातक बीमारी सिलिकोसिस से ग्रसित हो गये हैं.

समित कार ने बताया कि टाटा मुख्य अस्पताल (टीएमएच) की डिस्चार्ज समरी में उन्हें सिलिकोसिस पीड़ित बताया गया है. जांच रिपोर्ट के अनुसार उनके फेफड़ों में मल्टी डस्ट भर गया है. उन्होंने कहा कि उन्हें 2021 में एक्स-रे रिपोर्ट के बाद इस बीमारी की जानकारी मिली थी. यह बीमारी लाइलाज है और धीरे-धीरे बढ़ती जाती है. उन्होंने दुख व्यक्त किया कि जिले में अब तक सिलिकोसिस से सैकड़ों मजदूरों की जान जा चुकी है.

समित कुमार कार ने बताया कि वे 1995-96 में मजदूर यूनियन चलाया करते थे. वर्ष 2002 से उनकी संस्था ओशाज इंडिया सिलिकोसिस जैसी पेशागत बीमारियों से पीड़ित श्रमिकों की पहचान, अनुसंधान और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने पर कार्य कर रही है. उनके अनुसार, जिले में सिलिकोसिस से अब तक एक हजार से अधिक मजदूरों की मौत हो चुकी है.

ओशाज इंडिया द्वारा पूर्वी सिंहभूम जिले में 176 मृत श्रमिकों को चिन्हित किया गया था, लेकिन अब तक केवल 37 आश्रितों को ही मुआवजा मिला है. वहीं 385 जीवित सिलिकोसिस पीड़ित श्रमिकों को आज तक कोई मुआवजा नहीं दिया गया. अधिकांश पीड़ित आदिवासी, मूल निवासी, दलित और पिछड़े वर्ग से हैं. समित कुमार कार ने बताया कि उन्होंने 2014, 2018, 2019, 2021, 2023 और 2024 में भी एमजीएम अस्पताल में जांचे गये पीड़ितों को मुआवजा दिलाने की मांग सरकार से की थी, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं हुई.

उन्होंने कहा कि कारखाने मजदूरों के लिए जानलेवा बन गये हैं. रैमिंग मास उद्योग में मात्र आठ महीने काम करने वाला मजदूर भी सिलिकोसिस की चपेट में आ सकता है. उन्होंने इसे “एक अदृश्य अकाल मृत्यु” बताया.

समित कुमार कार ने बताया कि सिलिकोसिस पर काम करने की प्रेरणा उन्हें अपने पिता से मिली थी. उनके दादा की कोलकाता और ओसाका (जापान) स्थित कार ग्लास वर्क्स फैक्ट्री में सिलिकोसिस से कई मजदूरों की मौत हो चुकी थी. इसी कारण उनके पिता ने उन्हें इस विषय पर जागरुकता और न्याय की लड़ाई लड़ने की सलाह दी थी.

झारखंड में सिलिकोसिस से मौत की पहली खबर 2002 में आयी थी

समित कुमार कार ने याद किया कि झारखंड में सिलिकोसिस से मौत की पहली खबर वर्ष 2002 में सामने आयी थी, जब पूर्वी सिंहभूम जिले के तेरेंगा गांव के बादल सोरेन की 23 नवंबर 2002 को और खरियाडीह के प्रधान हेंब्रम की 14 मई 2003 को सिलिकोसिस से मौत हुई थी. 3 अगस्त 2007 तक 20 और मजदूरों की जान चली गयी. उसके बाद लगभग हर साल इस बीमारी से एक न एक मजदूर की मौत होती रही है.

20 अप्रैल 2005 को मुसाबनी ब्लॉक के चिकित्सकों की टीम ने आठ सिलिकोसिस पीड़ित मजदूरों की पहचान की थी. वहीं, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देश पर जून 2014 में सरकारी चिकित्सकों ने 30 मृत श्रमिकों, 27 सिलिकोसिस आक्रांतों और 12 संभावित प्रभावितों को चिन्हित किया था.

समित कुमार कार ने कहा कि वे अब खुद इस बीमारी से लड़ रहे हैं, लेकिन उनकी लड़ाई थमी नहीं है. जब तक मैं जीवित हूं, सिलिकोसिस पीड़ित मजदूरों को न्याय दिलाने की मुहिम जारी रखूंगा.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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