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शौर्य गाथा: कश्मीर के लोलाव घाटी में कर्नल राजेश सिंह का अद्भुत पराक्रम, पढ़ें विस्तार से

Updated at : 24 Aug 2022 3:10 PM (IST)
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शौर्य गाथा: कश्मीर के लोलाव घाटी में कर्नल राजेश सिंह का अद्भुत पराक्रम, पढ़ें विस्तार से

कर्नल राजेश सिंह अपनी वीरता से कश्मीर की कुपवाड़ा लोलाब घाटी में लगातार ऑपरेशन चला कर चार कुख्यात आतंकवादियों का खात्मा किया था. इस अदम्य कार्य के लिए उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटील द्वारा शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था.

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Shaurya Ghata: पाकिस्तान के साथ सीधे युद्ध भले न हो रहा हो, लेकिन कश्मीर में सीमा पार से भेजे जा रहे आतंकियों को ठिकाने लगाना भी इसी युद्ध का हिस्सा है. भारतीय जवान अपनी वीरता से आतंकियों के मंसूबों को विफल करते रहे हैं. इन अधिकारियों में एक नाम है राजेश सिंह का भी है. अपनी वीरता से कश्मीर की कुपवाड़ा लोलाब घाटी में लगातार ऑपरेशन चला कर चार कुख्यात आतंकवादियों का खात्मा किया. इस अदम्य कार्य के लिए उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटील द्वारा शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया.

जमशेदपुर के रहने वाले थे राजेश सिंह

राजेश सिंह जमशेदपुर के आदित्यपुर के रहने वाले थे. जमशेदपुर के राजेंद्र विद्यालय से राजेश ने पढ़ाई की. प्रारंभ में ये एक ढीले-ढाले बेपरवाह से छात्र थे पर उम्र के तेरहवें वर्ष में उनकी चेतना जागी और यहीं से इनका एक दृढ़ निश्चियी, समर्पित, जिम्मेवार, आत्मविश्वासी बनने का सफर शुरू हुआ. वह सभी की उम्मीद से बढ़कर, स्कूल में बेहतरीन प्रदर्शन करने लगे. उसके पिता अक्सर उसके रिपोर्ट कार्ड देखकर बेहतर परीक्षाफल से अचंभित भी होते थे. विद्यालय के अपने अंतिम सत्र में वह स्कूल कप्तान के साथ-साथ ज्योति (जमशेदपुर यूथ ऑरगेनाइजेन फॉर टुमॉरो इंडिया) के प्रेसिडेंट भी थे. उनकी इच्छा थी कि यूपीएससी की तैयारी करे, फिर आइपीएस अफसर बन देश की सेवा करे. उन्होंने दिल्ली के हिन्दू कॉलेज में दाखिला लिया. वे एनसीसी के भी वह छात्र रहे. राजेश के एक मित्र ने उन्हें आर्मी ज्वाइन करने के लिए सीडीएस (कंबाइंड डिफेंस सर्विसेज) की परीक्षा देने की सलाह दी थी. दुर्भाग्यवश वह मित्र तो पास ना हो सका, लेकिन राजेश पास हो गये और कालांतर में भारतीय सेना के दो बार विभूषित अधिकारी बन चुके हैं.

दस महीने की ली थी कड़ी ट्रेनिंग

उन्होंने चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडेमी में दस महीने की कड़ी ट्रेनिंग ली. चेन्नई का प्रशिक्षण काफी कठिन था. पहले टर्म में ही उनकी पिंडली की हड्डी टूट गयी. उन्हें अस्पताल में लेटने के लिए मजबूर होना पड़ा. उनके अन्य साथी अपने प्रशिक्षण में व्यस्त थे, अस्पताल में लेटे लेटे उन्होंने पढ़ाई की. पहले टर्म में वह एकेडेमी में तीसरे स्थान पर रहे. यह इनकी इच्छाशक्ति ही श्री जिसके बल पर पिंडली की हड्डी टूटने के बावजूद उन्हें बटालियन के डेट एडजुटेंट बनाया गया. उन्होंने तय कर लिया था कि वे हार नहीं मानेंगे.

नगालैंड में हुई थी राजेश सिंह की पहली पोस्टिंग

ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्होंने ‘द राजपूताना व्याफल्स’ को चुना, किसी ने उनका मजाक भी उड़ाया कि टूटी पिंडली के कारण राजपूताना राइफल्स में वे कैसे टिकेंगे, राजेश हतोत्साहित नहीं हुए और आगे बढ़ते गये. उनकी पहली पोस्टिंग नगालैंड में हुई. बाद में उन्हें जम्मू-कश्मीर के ओ. पी. रक्षक में भेजा गया. यहां उन्होंने निर्भय ऑपरेशन के तहत दो खूंखार आतंकवादियों का खात्मा किया. इस बाहरी के लिए 201 में उन्हें सेना से डल से सम्मानित किया गया. जम्मू-कश्मीर में करीब तीन वर्ष व्यतीत करने के बाद बारी लेकर उन्होंने शादी की, फिर उनकी यूनिट की यात्मा किया इन हुई, स्थितंबर में उन्हें एक बेटी हुई, इसी दौरान उनके पिता का निधन हो गया, वह काफी कठिन दौर था, देश से आ की जिम्मेवारी के कारण उन्हें अपने परिवार से दूर रहना पड़ा. पत्नी और बहु ने वह समय नहीं दे पा रहे थे. इस दौरान 2003-2005 के मध्य उनकी पोस्टिंग आइएमए में हुई. अब उन्हें पत्नी और बेटी के लिए कुछ समय मिला. इसी बीच फिर एक वर्ष के लिए भारतीय सेना द्वारा यूएन मिशन पर उन्हें सूडान (अफ्रीका) भेजा गया.

राजेश की पत्नी वृद्ध माता के लिए शक्ति का स्तंभ थी

घर की जिम्मेवारी उनकी पत्नी संभालती, जो न केवल बेटी को देखती, बल्कि उनकी वृद्ध माता के लिए भी शक्ति का एक स्तंभ थी. वह एक सही निर्णय लेने वाली, माता-पिता दोनों का किरदार निभाने वाली और पति को हर रोज की परेशानियों से बचाने के लिए कवच का काम किया करती थी, ताकि राजेश अपना सारा ध्यान अपने काम में उत्कृष्टता लाने में केन्द्रित कर सकें. राजेश जानते थे कि उनका कर्त्तव्य देश सेवा में निहित था और इसी का उन्होंने प्रशिक्षण भी लिया था, उनके परिवार और सबसे ज्यादा उनकी पत्नी ने इस देखत को समझा, समर्थन और सम्मान दिया. बेटी भी पापा राजेश की तरह बनना चाहती थी. तैराकी सीखी, एथलेटिक्स में भाग लिया, कराटे में चैंपियन बनी लेकिन पापा राजेश यह सब उपलब्धि देख नहीं सिर्फ सुन सके राजेश की बेटी नेशनल ज्योग्राफिक के लिए एक विशिष्ट फोटोग्राफर बनाना चाहती है. पिता और बेटी का एक मजबूत भावनात्मक संबंध है. जब राजेश घर पर लात हैं, तो बाप-बेटी में गप-शप, कानाफूसी और अपनी मां को छेड़ने की योजना, सुबह की दौड़ की तैयारी और अपने भविष्य, सपनों के प्रति सलाह शामिल रहती है..

इंटेलिजेंस और सर्विलेंस नेटवर्क किया स्थापित

राजेश 2006 में सूडान से भारत लौटे. उनकी अगली पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में राष्ट्रीय राइफल्स में हुई. वहां उन्हें अपने कंपनी के कठिन दिन का सामना करना पड़ा. वहां आतंकी घटनाएं बहुत घट रही थीं. उन्हें अपनी टीम को मजबूत करना था. बटालियन में आने के बाद, उन्होंने सैनिकों को नियमित प्रशिक्षण एवं दिमागी कसरत वाले सेशन करवाकर उन्हें एक सशक्त टीम बना दिया. कंपनी के सबसे विशाल क्षेत्र में इन्होंने एक प्रभावशाली इंटेलिजेंस और सर्विलेंस नेटवर्क स्थापित किया. इसी दौरान उन्होंने कुपवाड़ा लोलाब घाटी में लगातार ऑपरेशन चलाने के दौरान चार कुख्यात आतंकवादियों को निकालकर उनका खात्मा किया. इस वीरता के लिए उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल द्वारा शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया.

कर्नल राजेश सिंह के नाम से जाने जाते है राजेश सिंह

उनकी अगली पॉस्टिंग नयी दिल्ली स्थित राजपूताना राइफल्स रेजीमेंटल सेंटर में कंपनी कंमाडर के रूप में हुई. पूर्व क्रिकेटर कपिलदेव को मूलभूत प्रशिक्षण देने का कार्य राजेश को ही सौंपा गया था. अक्तूबर 2012 ने उन्हें गर्व का क्षण तब दिया, जब उन्हें अपनी बटालियन का कमांड लेने का मौका मिला. समाज के प्रति समर्पित होते हुए वह एक नियमित रूप से रक्तदाता बने हुए हैं. 60 बार रक्तदान कर चुके हैं. किसी की सहायता करने में वे पौछे नहीं रहते. नौशेरा स्थित बकरवाल की एक छोटी सी लड़की के दोनों पैर आग में जल गये थे. अपने खर्च पर उन्होंने उसको कृत्रिम पांव लगवाया. सादा जीवन जीनेवाले राजेश एक आदर्श व्यक्ति हैं, जिन्होंने जीवन में कभी शराब और सिगरेट को हाथ नहीं लगाया. आज वे सेना में कर्नल राजेश सिंह के नाम से जाने जाते हैं.

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