जमशेदपुर की संताली फिल्म 'आंगेन' को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, रविराज मुर्मू को 'बेस्ट डेब्यू फिल्म ऑफ ए डायरेक्टर' का सम्मान

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फिल्म का एक दृश्य. पीले घेरे में फिल्म के निर्माता-निर्देशक रविराज मुर्मू.

फिल्म का एक दृश्य. पीले घेरे में फिल्म के निर्माता-निर्देशक रविराज मुर्मू.

72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में जमशेदपुर की संताली फिल्म 'आंगेन' को 'बेस्ट डेब्यू फिल्म ऑफ ए डायरेक्टर' के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. जानें रविराज मुर्मू की इस उपलब्धि के बारे में.

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वरीय संवाददाता, जमशेदपुर

नयी दिल्ली में शनिवार को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की घोषणा के साथ झारखंड और जमशेदपुर ने भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक नयी उपलब्धि दर्ज की है. गैर-फीचर फिल्म श्रेणी में जमशेदपुर में निर्मित संताली लघु फिल्म 'आंगेन' (इन्विजिबल) को 'बेस्ट डेब्यू फिल्म ऑफ ए डायरेक्टर' के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. यह सम्मान फिल्म के निर्माता-निर्देशक रविराज मुर्मू को मिला है. इस उपलब्धि ने न केवल संताली सिनेमा, बल्कि झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय प्रतिभाओं को राष्ट्रीय स्तर पर नयी पहचान दिलायी है.

रवि राज मुर्मू मूल रूप से जादूगोड़ा के रहने वाले हैं, उन्होंने जमशेदपुर के करीम सिटी कॉलेज के मास कम्युनिकेशन (वीडियो प्रोडक्शन) विभाग से वर्ष 2011-14 सत्र में अपनी पढ़ाई पूरी की है. इसके बाद फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआइआइ) , पुणे से संपादन (एडिटिंग) में विशिष्टता के साथ स्नातक की डिग्री हासिल की. कुछ वर्षों तक मुंबई में काम करने के बाद वर्तमान में वे जमशेदपुर के सोनारी में रहकर सिनेमाई कला को समृद्ध कर रहे हैं.

जमशेदपुर से इलाकों में की गयी है फिल्म की शूटिंग

करीब 12 मिनट की इस लघु फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी मौलिकता और स्थानीय परिवेश है. फिल्म की शूटिंग जमशेदपुर से सटे आदिवासी बहुल क्षेत्रों करनडीह, तुरामडीह, छोलागोड़ा और किनुटोला में की गयी है. ग्रामीण परिवेश, प्राकृतिक सौंदर्य और स्थानीय जीवनशैली को फिल्म में बेहद संवेदनशील और प्रामाणिक तरीके से प्रस्तुत किया गया है. फिल्म में रामचंद्र मार्डी, सलोनी, जीतराय हांसदा और फूलमनी ने सशक्त अभिनय से कहानी को जीवंत बनाया है.

संताली लोककथा पर आधारित है 'आंगेन' की कहानी

'आंगेन' की कहानी संताली लोककथाओं और आदिवासी सांस्कृतिक परंपराओं से प्रेरित है. निर्देशक रविराज मुर्मू के अनुसार, आदिवासी समाज की लोककथाओं में इतिहास, संस्कृति, संघर्ष और जीवन-दर्शन की गहरी छाप मिलती है. फिल्म की कहानी धरती और देवलोक के बीच बुनी गयी है, जहां देवलोक की एक अलौकिक युवती को धरती के एक चरवाहे से प्रेम हो जाता है. वह उसे अपनी दिव्य शक्तियों से देवलोक ले जाती है, लेकिन सम्मोहन टूटने के बाद चरवाहे के धरती पर लौटने के संघर्ष के साथ कहानी कई भावनात्मक और रोमांचक मोड़ लेती है.

सुरीले संगीत और उत्कृष्ट टीम वर्क ने दिलायी राष्ट्रीय पहचान

फिल्म को इस मुकाम तक पहुंचाने में इसके बेजोड़ संगीत का बहुत बड़ा योगदान रहा है. जाने माने साहित्यकार, गीतकार और लोकगायक दुर्गाप्रसाद मुर्मू ने इस फिल्म की जादुई धुन तैयार की है, जबकि नुनाराम ने फिल्म में बेहतरीन संगीत दिया है. फिल्म के संगीत निर्देशन की कमान निशांत राम टेके ने संभाली है. इस राष्ट्रीय पुरस्कार ने यह साबित कर दिया है कि जब झारखंड के स्थानीय हुनर को सही दिशा मिलती है, तो वे देश के सबसे बड़े मंच पर अपनी चमक बिखेरने में पूरी तरह सक्षम हैं.

यह विभाग के लिए गौरव की बात है : डॉ नेहा तिवारी

इस ऐतिहासिक सफलता पर करीम सिटी कॉलेज मास कम्युनिकेशन विभाग की विभागाध्यक्ष (एचओडी) डॉ नेहा तिवारी ने कहा कि यह विभाग के लिए बेहद गौरव की बात है. उन्होंने कहा कि रवि मुर्मू कॉलेज में अध्ययन के दौरान उसने खूब सारी सिनेमाई कृतियों को देखा और खुद फिल्में बनाना शुरू किया. आज वह इसी मेहनत के बल पर इस मुकाम तक पहुंचा है गर्व की बात यह है कि रवि राज ने अपनी मातृभाषा संथाली में सिनेमा बनाया है. पूरी उम्मीद है कि वह आने वाले दिनों में संथाली भाषा के सिनेमा को दुनिया भर के मंचों पर स्थापित करेंगे.

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दशमत सोरेन

लेखक के बारे में

By दशमत सोरेन

दशमत सोरेन ने रांची विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर किया है. वे 29 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उनकी विशेषज्ञता मुख्य रूप से झारखंड की आदिवासी-मूलवासी राजनीति, स्थानीय समुदायों की भाषा-संस्कृति और यहां के सामाजिक ताना-बाना है. वे वर्ष 2010 से प्रभात खबर के साथ एक ट्राइबल रिपोर्टर के रूप में काम कर रहे हैं.

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