Jamshedpur : 28 को चांद दिखने के बाद तरावीह शुरू, एक मार्च से रमजान के रोजे रखेंगे मुस्लिम धर्मावलंबी

Updated at : 26 Feb 2025 12:49 AM (IST)
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Jamshedpur : 28 को चांद दिखने के बाद तरावीह शुरू, एक मार्च से रमजान के रोजे रखेंगे मुस्लिम धर्मावलंबी

इस साल रमजान की शुरुआत 28 फरवरी से हो सकती है, जबकि 1 मार्च से रोजा रखा जायेगा.

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जमशेदपुर. इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, मुस्लिम समुदाय के लिए सबसे पवित्र महीना रमजान 28 फरवरी से शुरू हो सकता है. शुक्रवार को चांद देखे जाने के साथ ही तरावीह शुरू हो जायेगी, जबकि रोजा एक मार्च से शुरू होगा. मार्च के पूरे महीने में मुस्लिम समाज के लोग अल्लाह की इबादत करेंगे और रोजा रखेंगे. रमजान का महीना चांद देखने के बाद शुरू होता है और चांद दिखने पर ही ईद-उल-फितर का त्योहार मनाया जाता है. इस साल रमजान की शुरुआत 28 फरवरी से हो सकती है, जबकि 1 मार्च से रोजा रखा जायेगा. रमजान के महीने को इस्लाम में सबसे पाक माना जाता है. इस दौरान मुस्लिम समुदाय के लोग न केवल रोजा रखते हैं, बल्कि गरीबों की मदद करने, भूखे को खाना खिलाने और बुराई से दूर रहने का संकल्प लेते हैं. रमजान का मकसद इंसानियत का फर्ज निभाना और अल्लाह की इबादत करना है. रमजान इस्लामिक कैलेंडर का नवां महीना है, जिसे इस्लाम धर्म के अनुयायी अत्यंत पवित्र मानते हैं.

रोजा और नमाज का महत्व

रमजान के दौरान पांच वक्त की नमाज के साथ-साथ रोजा रखना भी फर्ज माना जाता है. इस महीने में की गयी इबादत का फल कई गुना ज्यादा मिलता है. इसलिए मुस्लिम समुदाय के लोग पूरे महीने रोजा रखते हैं और अल्लाह की इबादत करते हैं. इस पाक महीने में जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं और जहन्नुम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं.

माह-ए-रमजान में तीन अशरे

रमजान महीने के 29 या 30 दिनों को तीन भागों में बांटा गया है, जिसे अशरा कहा जाता है. इस तरह से रमजान में पहला अशरा, दूसरा अशरा और तीसरा अशरा होता है. अरबी में अशरा का मतलब 10 है. इस तरह से रमजान के महीने का पहला अशरा 1-10 दिनों का, दूसरा असर 11 से 20 दिनों का आखिरी यानी तीसरा अशरा 21 से 30 दिनों का होता है. इन्हीं तीन भागों में बंटे 30 दिनों को तीन अशरा कहा जाता है.

रमजान के तीन अशरे का महत्व

रमजान के 30 दिनों को तीन अशरों में बांटा गया है. इसमें पहला अशरा रहमत, दूसरा असरा मगफिरत (गुनाहों की माफी) और तीसरा अशरा जहन्नुम की आग से खुद को बचाने के लिए होता है. ऐसी मान्यता है कि रमजान के पहले अशरे में जो लोग रोजा रखते हैं और नमाज अदा करते हैं उनपर अल्लाह की रहमत होती है. दूसरी अशरे में मुसलामन अल्लाह की इबादत करते हैं और अल्लाह उनके गुनाहों को माफ कर देते हैं. वहीं आखिरी और तीसरे अशरे की इबादत और रोजा से जहन्नुम या दोजख से खुद को बचाया जा सकता है. इस तरह से इस्लाम में रमजान के तीन अशरे का महत्वपूर्ण बताया गया है.

रमजान की तैयारियों में जुटीं मस्जिद कमेटियां

रमजान के माह के पूर्व तैयारियों में मस्जिद कमेटियां जुट गयी हैं. मस्जिदों में सफाई का काम चल रहा है. इसके अलावा तरावीह के लिए स्थान की सफाई की जा रही है. मुहल्लों में भी तरावीह को लेकर स्थल का चयन किया जा रहा है. रमजान के शुरू होते ही मुस्लिम मुहल्लों में पूरी तरह से दिनचर्या बदल जायेगी.

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