झारखंड : धालभूमगढ़ में बनेगा विशाल एयरपोर्ट, कोलकाता का होगा विकल्प, द्वितीय विश्वयुद्ध से भी जुड़ा है कनेक्शन

By Prabhat Khabar Digital Desk
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धालभूमगढ़ में एयरपोर्ट बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी है. इसके लिए सर्वे का काम पूरा कर लिया गया है. जमीन चिह्नित कर ली गयी है. अब एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआइ) की टीम अंतिम बार सर्वे करने के बाद इसे हरी झंडी दे देगी. अगर सबकुछ ठीक रहा तो 2018 से एयरपोर्ट बनाने का काम शुरू हो जायेगा और 2021 तक इसका काम पूरा हो जायेगा. इसके बाद वहां से उड़ान भी शुरू हो जायेगी.यह जमशेदपुर शहर से लगभग 75 किलोमीटर दूर है.नया एयरपोर्ट चालू होने से न सिर्फ आसपास के क्षेत्र का तेजी से विकास होगा बल्कि पूरे कोल्हान की किस्मत बदलने वाली है. ब्रजेश सिंह की धालभूमगढ़ एयरपोर्ट निर्माण पर ग्राउंड रिपोर्ट..

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देवशोल गांव में उठे विरोध के स्वर

एयरपोर्ट के रनवे के बगल में ही देवशोल गांव है. इस गांव में एयरपोर्ट बनाने को को लेकर विरोध के स्वर तेज हो रहे हैं. हालांकि इसे विपक्षी दल का समर्थन भी मिल रहा है. यद्यपि इस गांव का एक भी मकान नहीं टूटने की बात कही गयी है. जो रिपोर्ट में भी दर्ज है. लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि वहां आबादी बढ़ेगी तो नुकसान होगा. पिछले दिनों धालभूमगढ़ प्रखंड की पावड़ा-नरसिंहगढ़ पंचायत अंतर्गत देवशोल गांव के माझी अखाड़ा में ग्राम प्रधान दाखिन हांसदा की अध्यक्षता में ग्रामसभा हुई. इसमें निर्णय हुआ था कि धालभूमगढ़ में हवाई अड्डा के लिए गांव की भूमि अधिग्रहण का विरोध किया जायेगा. उनका कहना था कि ग्रामसभा को सूचना दिये बिना भूमि की मापी करना पांचवीं अनुसूची के नियमों का उल्लंघन है. ग्रामसभा को बगैर सूचना के भूमि की मापी नहीं करने दी जायेगी. ग्राम सभा में कहा गया कि खेती योग्य भूमि लेने या बस्तियों को विस्थापित किया गया तो इसके विरोध में आंदोलन होगा. जल, जंगल और जमीन पर ग्राम सभा का अधिकार है. जंगल धार्मिक भावनाओं के साथ जुड़ा है. ग्रामीणों का तर्क है कि एयरपोर्ट बने से उनके परंपरागत रोजी-रोजगार छिन जायेंगे और बड़ी संख्या में पेड़ काटे जायेंगे.

हर गांव के युवा वर्ग में उत्साह

एयरपोर्ट बनने से पूर्व युवाओं में उत्साह देखा जा रहा है. हालांकि बुजुर्ग भविष्य की आशंकाओं को लेकर थोड़ा विरोध कर रहे हैं, लेकिन युवा वर्ग उम्मीद से भरा हुआ है. वे चाहते हैं कि यहां एयरपोर्ट बने. उन्हें उम्मीद है कि एयरपोर्ट बनने के साथ ही क्षेत्र में विकास के कई आयाम जुड़ेंगे. रोजी-रोजगार के अवसर सृजित होंगे. व्यवसाय भी बढ़ेगा.

अधिकतरगांव के लोग जमीन देने को तैयार

जिन गांवों का नाम एयरपोर्ट में लेने के लिए आया है, उनमें से अधिकतर लोग अपनी जमीन देने को तैयार हैं. हालांकि उनकी शर्त है कि घर तोड़ा न जाये तथा जमीन के बदले बेहतर जमीन या उसका उचित मूल्य मिले. लोग चाहते हैं कि एयरपोर्ट बने, ताकि क्षेत्र का विकास होगा, लेकिन शर्त यह है कि उन्हें उजाड़ा न जाये.

एयरपोर्ट झारखंड नहीं पूरे पूरब को देश-विदेश से जोड़ेगा

केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय के ब्लूप्रिंट के मुताबिक, जमशेदपुर से जुड़े धालभूमगढ़ एयरपोर्ट को कुछ इस तरह तैयार किया जायेगा कि इसके जरिये देश -विदेश को झारखंड समेत पूरे पूर्वी भारत से जोड़ा जा सके. प्रस्तावित एयरपोर्ट से बंगाल, ओड़िशा और झारखंड के लोगों का आसानी से जुड़ाव हो सकेगा. भारत सरकार की सोच है कि चूंकि, बंगाल का एयरपोर्ट भी अब सेचुरेशन प्वाइंट (संतृप्त बिंदु) तक पहुंच चुका है, इस कारण उसको बढ़ाने के बजाय धालभूमगढ़ एयरपोर्ट का ही बेहतर इस्तेमाल कर इसे बढ़ाया जाये. इधर, ओड़िशा और रांची के एयरपोर्ट का रनवे छोटा है, इस कारण धालभूमगढ़ रनवे को करीब 3.5 किलोमीटर तक ले जाने की तैयारी है. यह देश के बड़े रनवे में से एक होगा ताकि अंतरराष्ट्रीय विमान सेवाएं यहां से सहज संचालित हो सके. यही वजह है कि जहां घरेलू विमानों के लिए सिर्फ 500 से 600 एकड़ की जमीन की जरूरत होती है, लेकिन यहां करीब एक हजार एकड़ जमीन की तलाश की गयी है.

100 सीटर जहाज की सुविधा

धालभूमगढ़ हवाई अड्डे से पहले चरण में 100 सीटर हवाई जहाज उड़ान भरेंगे. दिल्ली से जमशेदपुर वाया कोलकाता के लिए सुबह-शाम हवाई सुविधा उपलब्ध होगी. एयरपोर्ट अथॉरिटी के मुताबिक यहां कई बड़े विमानों के उतारने की पूरी व्यवस्था होगी.

बड़े होटल व लॉज के साथ मॉल का भी वहां होगा संचालन

धालभूमगढ़ हवाई अड्डे को जमशेदपुर से जोड़ने और यहां आने-जाने वाले लोगों को कोई दिक्कत न हो, इसके लिए होटल व लॉज के साथ मॉल का भी निर्माण होगा. इसके लिए भी करीब एक हजार एकड़ जमीन ली जा रही है. यहां एयरपोर्ट अथॉरिटी के लिए रहने के मकान से लेकर तमाम चीजें भी स्थापित होकर एक नगर की तरह इसको विकसित किया जाना है.

जमीन के बदले दोगुनी जमीन या कीमत मिलेगी

वर्तमान में राज्य सरकार ने जो नीति बनायी है, इसके तहत जिस भी रैयत की जमीन एयरपोर्ट के लिए ली जायेगी, उसको विस्थापन नीति का लाभ दिया जायेगा. इसके तहत अगर रैयत जमीन के बदले जमीन या कीमत लेना चाहे तो दोगुनी जमीन या कीमत मिलेगी.

हम लोग पुलिस से बचकर हवाई जहाज को देखा करते थे : मुबारक अली

धालभूमगढ़ एयरपोर्ट की ग्राउंड रिपोर्टिंग करते वक्त ही वहां करीब 85 साल के बुजुर्ग मुबारक अली मिल गये. मुबारक अली पास के ही ढोलकी गांव के रहने वाले हैं. उन्होंने अपनी पुरानी यादों को साझा किया. उन्होंने बताया कि जब वे युवा थे तो देखा था कि किस तरह वहां हवाई जहाज उड़ान भरते थे. हम लोग पुलिस से बचकर वहां लगे कटीले तारों के किनारे से किसी तरह बचकर हवाई जहाज देखा करते थे. बहुत विमान यहां से उड़ता था और अंग्रेजी हुकूमत के लोग वहां रहते थे.

अंचलाधिकारी ने तैयार की है सर्वे रिपोर्ट, कोई नहीं उजड़ेगा

नये एयरपोर्ट के लिए अंचलाधिकारी हरीशचंद्र मुंडा को काम पर लगाया गया है. श्री मुंडा ने पूरी सूझ-बूझ के साथ सर्वे रिपोर्ट तैयार की है. कुल 1070.74 एकड़ जमीन को चिह्नित कर ली गयी है. जमीन को कुछ इस तरह से चिह्नित किया गया है कि न के बराबर ही लोग विस्थापित होंगे. इसके तहत छह मौजा देवशोल, कोकपाड़ा-नरसिंहगढ़, चार चक्का, बुरुडीह, रुआसोल, दूधचुआं मौजा की जमीन ली जा रही है, जिसमें रैयती जमीन 83.78 एकड़ है जबकि वन भूमि 961.62 एकड़, सरकारी जमीन 25.34 एकड़ है. कुल 986.96 एकड़ जमीन सरकार के हाथ में है. मात्र रैयती जमीन 83.78 एकड़ है उसमें भी एक भी मकान नहीं आ रहा है. इस रिपोर्ट की खासियत यह है कि जमीन के बगल से ही रनवे से कुछ दूरी पर सुवर्णरेखा परियोजना का नहर गुजर रहा है, लेकिन उसको भी उससे बाहर रखा गया है. रुआसोल गांव के कुछ ही मकान है, जिसको हटाना होगा और मुआवजा देना पड़ सकता है. इसके अलावा कोई बड़ी क्षति या आबादी को हस्तांतरित करने का मामला नहीं है.

क्या है इतिहास

द्वितीय विश्व युद्ध के समयबनी थीधालभूमगढ़ हवाई पट्टी

झारखंड : धालभूमगढ़ में बनेगा विशाल एयरपोर्ट, कोलकाता का होगा विकल्प, द्वितीय विश्वयुद्ध से भी जुड़ा है कनेक्शन

धालभूमगढ़ हवाई पट्टी का निर्माण द्वितीय विश्व युद्ध के समय (वर्ष 1939-1945) जंगल के बीच तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत द्वारा संचालित इस्ट इंडिया कंपनी ने कराया था. इसमें करीब चार किलोमीटर के दो रनवे और दो किलोमीटर में हवाई अड्डा फैला था. जहाज रखने के हैंगर, बिंततु भवन की व्यवस्था थी. इसका अवशेष आज भी है. उस समय चूना और सुरखी से हवाई पट्टी का निर्माण किया गया था. धालभूमगढ़ हवाई पट्टी का अंतिम बार रक्षा विभाग ने 1971 में उपयोग किया था. भारत-बांग्लादेश युद्ध के समय हवाई पट्टी, विभिन्न प्रकार के युद्ध टैंकर, मिसाइल मार करने वाली मशीन आदि रखी गयी थी.

421 एकड़ में फैली है धालभूमगढ़ हवाई पट्टी

सर्वे सेटेलमेंट में हवाई पट्टी दर्शायी नहीं गयी है, लेकिन भौतिक रूप से हवाई पट्टी लगभग 421 एकड़ में है. यह रनवे अंग्रेजी के एफ (F) की तर्ज पर बनाया गया है. यह आरएफ वन भूमि देवशोल के 342 एकड़, कोकपाड़ा-नरसिंहगढ़ में 43 एकड़, बुरूडीह में 10 एकड़, चारचक्का में 12 एकड़ कुल 421 एकड़ में फैला है.

धालभूमगढ़ की हवाई पट्टी 88 साल बाद भी ऐसी मजबूत की दौड़ जाये विमान

धालभूमगढ़ की हवाई पट्टी और चाकुलिया का हवाई पट्टी, दोनों को अगर देखा जाये तो उसका रनवे देखने लायक है. उसकी मजबूती ऐसी है कि आज 1939 से लेकर 88 साल बाद भी इसकी हवाई पट्टी काफी मजबूत है. इस हवाई पट्टी पर अगर डामर (अलकतरा) का सिर्फ कारपेटिंग कर दी जाये तो आसानी से विमान दौड़ने लग जायेगा और आज भी उड़ान शुरू की जा सकती है क्योंकि इसका रनवे सोनारी के वर्तमान एयरपोर्ट से भी बड़ा है.

चाकुलिया एयरपोर्ट भी बड़ा व एेतिहासिक, इस्तमाल में हो सकता है कारगो के लिए. भारत सरकार की सोच है कि एयरपोर्ट धालभूमगढ़ हवाई पट्टी के पास बनाया जायेगा जबकि चाकुलिया एयरपोर्ट को कारगो के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता है. कारगो यानी सामानों को हवाई जहाज से ले जाने की व्यवस्था, ताकि बंगाल, ओड़िशा, झारखंड के लोगों के सामानों व माल की आवाजाही भी हो सके. चाकुलिया स्टेशन से करीब एक किमी दक्षिण लगभग 562 एकड़ भूमि पर यह हवाई अड्डा दीघी, मौरबेड़ा, सुगनीबासा, पुरनापानी मौजा में फैला है. जंगलों से भरे इन मौजों में टैंक के प्रवेश के लिए सड़कें भी बनी हैं. दीघी के पास फायरिंग रेंज और टैंक धोने के लिए निर्मित सीमेंट के स्टेज आज भी देखे जा सकते हैं. इसके विशाल रनवे पर 10 मिग जहाज के उतरने और उड़ने की क्षमता थी. कहा जाता है कि 1945 में हिरोशिमा पर बम बरसाने वाले विमान ने इसी हवाई अड्डा से अंतिम उड़ान भरी थी. दीघी के पास अफसरों के लिए और सुनमुनिया के पास अफसरों की पत्नियों के लिए क्लब भवन था. इसके अवशेष आज भी हैं. इसलिए सुनसुनिया को मेम क्लब कहा जाता है. हवाई अड्डा के पास एक भवन सुरक्षित है. इसे सिगनल भवन कहा जाता है. कई जगह जलापूर्ति के लिए बने जल मीनार के अवशेष भी हैं. इस हवाई अड्डे का कई किमी में फैला मुख्य रनवे सुरक्षित है. इसकी मरम्मत हो सकती है. रनवे पर जहाज बांधने के लिए कई हैंगर आज भी देखे जा सकते हैं. हवाई अड्डा क्षेत्र में कई कुएं और डीप बोरिंग भी हैं. इनकी मरम्मत कर कार्य लायक बनाया जा सकता है. ब्लॉक ऑफिस के पास तब का बना बेतार संदेश भवन के अवशेष भी हैं. 1982 तक यह हवाई अड्डा सुरक्षित था. कंटीले तार की घेराबंदी थी. निर्मित सभी आवास सुरक्षित थे. तब नागरिक उड्डयन विभाग इसकी निगरानी होती थी. देखरेख के लिए गार्ड बहाल थे. कहा जाता है कि इस हवाई अड्डा का उपयोग 1965 के पाकिस्तान युद्ध में हुआ था. 1971 के बांग्लादेश युद्ध के दौरान भी भी इस हवाई अड्डा पर बांग्लादेशियों को युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया था.

2018 से निर्माण कार्य शुरू करने की योजना हमारा लक्ष्य है कि जमीन अधिग्रहण समेत तमाम प्रक्रिया को दिसंबर 2017 तक पूरी कर ली जाये. अगर सबकुछ ठीक रहा तो 2018 से निर्माण कार्य शुरू हो जायेगा. भारत सरकार चाहती है कि वर्ल्ड क्लास एयरपोर्ट बनाया जाये. इसके लिए ज्यादा जमीन ली जा रही है. 2021 तक एयरपोर्ट से उड़ान भरना शुरू कर दें, यह कोशिश है.

जयंत सिन्हा, केंद्रीय नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)

कोई नहीं उजड़ेगा, एयरपोर्ट से होगा चौतरफा विकास. सांसद विद्युत वरण महतो ने कहा कि एयरपोर्ट बनने से किसी को उजाड़ा नहीं जायेगा. जितना कम से कम नुकसान हो, इसके लिए केंद्र व राज्य सरकार संकल्पित है. लोगों को उचित मुआवजा व जमीन का खर्च मिले, लोगों का घर बनाया जाये, इस सोच के साथ सरकार एयरपोर्ट बनाना चाहती है. केंद्र और राज्य सरकार की पहल से यह क्षेत्र एक हब के रूप में विकसित होगा.

विद्युत वरण महतो, सांसद, जमशेदपुर

सर्वे पूरा, जमीन पर्याप्त

सर्वे का काम पूरा कर लिया गया है. एयर पोर्ट के लिए जमीन पर्याप्त है. कही कोई दिक्कत नहीं है. लोग सहयोग करने को तैयार है. अगर ग्रामीणों की कोई परेशानी होगी, उसे दूर की जायेगी.

हरीशचंद्र मुंडा, अंचलाधिकारी, धालभूमगढ़

विरोध करने वालों की अलग-अलग दलीलें

देवशोल गांव बड़ा है. यहां से विरोध हो रहा है. विरोध करने वालों की अलग-अलग दलीलें हैं.

हम लोगों को डर है कि हमारी जमीन न चली जाये. पुश्तैनी मकान व जमीन छोड़कर हम नहीं जा सकते है, इसका हम विरोध करेंगे.

दखिन हांसदा, ग्राम प्रधान

एयरपोर्ट से हम लोगों का क्या विकास होगा. जमीन ले ली जायेगी. अब आप ही बतायें कि जब घर ही नहीं रहेगा तो हम लोग कहां जायेंगे.

डेविड हांसदा, देवशोल गांव

हम लोग विकास विरोधी नहीं है, लेकिन हमारे विनाश की शर्त पर विकास नहीं होनी चाहिए. हम लोगों को उजाड़ने का प्रयास होगा तो विरोध करेंगे.

बिरदा सोरेन, देवशोल गांव

एयर पोर्ट बनने के बाद गांव में हम लोगों का ही आना जाना मुश्किल हो जायेगा. हमारा अस्तित्व ही मिट जायेगा. हमारे पास अपना कुछ नहीं बचेगा.

फागु मरांडी, देवशोल गांव

हवाई जहाज अगर उड़ान भरेगा तो विकास होगा. लेकिन हमारा विकास नहीं होगा. हम लोग उजड़ जायेंगे. रात दिन की हवाई उड़ान से हमारी नींद व चैन छिन जायेगा.

सरस्वती मुंडा, देवशोल गांव

एयरपोर्ट तो पहले से ही था, चालू नहीं था. जितने एरिया में है, उसी में बना लें तो हम लोगों को दिक्कत नहीं है. लेकिन हम लोगों को उजाड़ा न जाये.

सूरज मांडी, देवशोल गांव

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