लाल आभा के साथ सूर्य बादलों को चीरते हुए सौंदर्य दिखा

Updated at : 21 Mar 2026 8:21 PM (IST)
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लाल आभा के साथ सूर्य बादलों को चीरते हुए सौंदर्य दिखा

हजारीबाग जिले के बड़कागांव प्रखंड स्थित पंकरी बरवाडीह का सौर पंचांग स्थल 21 मार्च को एक अद्भुत खगोलीय घटना का साक्षी बना

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संजय सागर बड़कागांव. हजारीबाग जिले के बड़कागांव प्रखंड स्थित पंकरी बरवाडीह का सौर पंचांग स्थल 21 मार्च को एक अद्भुत खगोलीय घटना का साक्षी बना. इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर करवट लेता है, जिससे दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं. धीरे-धीरे तापमान में वृद्धि होती है और ठंड कम होकर गर्मी का असर बढ़ता है. अहले सुबह से ही लोग सूर्योदय का नजारा देखने के लिए स्थल पर जुटे थे. हालांकि घने बादलों ने शुरुआत में खगोल प्रेमियों को निराश किया, लेकिन जैसे ही घड़ी ने 6:15 का समय दिखाया, बादल छटने लगे और सूर्य अपनी लाल आभा के साथ बादलों को चीरते हुए दिखाई दिया. यह दृश्य देखकर लोग खुशी से झूम उठे. सौर पंचांग स्थल पर दो पत्थरों के बीच बने वी आकार के खड से सूर्य का अद्भुत दृश्य दिखाई देता है. इतिहासकारों का मानना है कि प्राचीन काल में लोग पंचांग के माध्यम से समय और ऋतु का निर्धारण करते थे. एजटेक सभ्यता में भी सौर पंचांग का विशेष महत्व था. पंकरी बरवाडीह के पत्थरों की संरचना देखकर प्रतीत होता है कि यहां भी सूर्य की गति को समझने की परंपरा रही होगी. साहित्यकारों और विद्वानों का कहना है कि इस स्थल को संरक्षित किया जाना चाहिए, क्योंकि यह भविष्य में खगोल विज्ञान के अध्ययन के लिए वेदशाला साबित हो सकता है. स्थानीय लोगों और विद्वानों ने सरकार से इक्विनॉक्स पॉइंट को सुरक्षित करने की मांग की है. उनका मानना है कि यह स्थल न केवल सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. 20-21 मार्च और 22-23 सितंबर को दिन और रात बराबर होते हैं खगोल शास्त्र के अनुसार, हर वर्ष 20-21 मार्च और 22-23 सितंबर को दिन और रात बराबर होते हैं. इस समय सूर्य की किरणें विषुवत वृत्त पर सीधी पड़ती हैं. 21 मार्च को उत्तरी गोलार्द्ध में वसंत ऋतु और दक्षिणी गोलार्द्ध में शरद ऋतु का आगमन होता है. पृथ्वी की घूर्णन और परिक्रमण गति के कारण दिन-रात और ऋतुओं में परिवर्तन होता है. यही कारण है कि इक्विनॉक्स का महत्व हर सभ्यता में रहा है. पंकरी बरवाडीह का यह स्थल झारखंड की प्राचीन खगोल परंपरा का जीवंत प्रमाण है. यदि इसे संरक्षण और प्रचार मिले, तो यह न केवल वैज्ञानिक अध्ययन का केंद्र बनेगा बल्कि सांस्कृतिक पर्यटन को भी नई दिशा देगा.

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VIKASH NATH

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