बड़कागांव का रामनवमी इतिहास 124 साल पुराना है

बड़कागांव प्रखंड में रामनवमी पर्व की परंपरा अत्यंत पुरानी और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध है.
संजय सागर बड़कागांव. बड़कागांव प्रखंड में रामनवमी पर्व की परंपरा अत्यंत पुरानी और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध है. विक्रम संवत के प्रथम माह चैत्र की आहट पड़ते ही गांव-गांव में इस महापर्व की गूंज सुनाई देने लगती है. नदियों और पहाड़ों से घिरे इस क्षेत्र में रामनवमी केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है. कुंजल व नेतलाल ने झंडा उठाकर रामनवमी की शुरुआत की थी. 1936 में कुंजल राम और नेतलाल महतो ने महावीर झंडा उठाकर रामनवमी की शुरुआत की थी. धीरे-धीरे यह परंपरा पूरे कर्णपुरा क्षेत्र में फैल गयी. 1938 में बादम, हरली, विश्रामपुर और 1940 में नापो, खरांटी जैसे गांवों में भी इसकी शुरुआत हुई. 70 के दशक में किशुन साव और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बसंती दुर्गा पूजा की परंपरा शुरू की. वहीं 1942 से हरली में मेला लगना आरंभ हुआ, जिसमें दर्जनों गांवों के लोग झंडा और झांकी लेकर शामिल होने लगे. 80 के दशक से शोभा यात्रा और जुलूस की परंपरा भी जुड़ गयी 80 के दशक से शोभा यात्रा और जुलूस की परंपरा भी जुड़ गयी. पूर्व विधायक लोकनाथ महतो और अन्य स्थानीय नेताओं के नेतृत्व में यह यात्रा शुरू हुई. अंबेडकर मोहल्ला और अन्य क्षेत्रों से मूर्तिकारों द्वारा बनायी गयी हनुमान प्रतिमा पूरे गांव में घुमायी जाती थी. 2000 से ठाकुर मोहल्ला द्वारा झांकी जुलूस की शुरुआत हुई, जिसमें भगवान शंकर और महर्षि वाल्मीकि जैसी भूमिकाएं निभायी जाती थीं. रामनवमी के अवसर पर बड़कागांव चौक और डेली मार्केट में भव्य मेले का आयोजन होता है. विभिन्न पूजा समितियों और युवा क्लबों द्वारा झांकी निकालने की परंपरा ने इस पर्व को और भी जीवंत बना दिया है. विजयदशमी की रात से शुरू होकर एकादशी तक चलने वाले इन आयोजनों में पुलिस और सामाजिक कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका रहती है.
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