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सतबहिया के बिरहोर शिकार छोड़ अब कर रहे हैं खेती-बारी, जैविक खेती पर दे रहे हैं जोर

Updated at : 27 Nov 2020 4:34 PM (IST)
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सतबहिया के बिरहोर शिकार छोड़ अब कर रहे हैं खेती-बारी, जैविक खेती पर दे रहे हैं जोर

Jharkhand news, Hazaribagh news : हजारीबाग जिला अंतर्गत बड़कागांव प्रखंड का एक गांव है सतबहिया. यह महूदी पहाड़ के नीचे स्थित है. यहां के बाशिंदे हैं बिरहोर आदिम जनजाति. जंगल ही इनका जीवन है. साथ ही जंगल का संरक्षण करना उनकी परंपराओं और जीवनशैली में है. इनका मुख्य पेशा शिकारी करना है, लेकिन अब उन्होंने पौष्टिक अनाजों की जैविक खेती करना भी शुरू किया है. घरों में किचन गार्डन के माध्यम से सब्जियों और फलदार वृक्षों की खेती भी कर रहे हैं. सतबहिया में बिरहोरों के 130 जनसंख्या है. यहां के बिरहोर अन्य गांव के बिरहोरों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गये हैं, जबकि प्रखंड के करमाटांड़, नापो, पोटंगा के बिरहोर जंगलों में शिकारी किया करते हैं.

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Jharkhand news, Hazaribagh news : बड़कागांव (संजय सागर) : हजारीबाग जिला अंतर्गत बड़कागांव प्रखंड का एक गांव है सतबहिया. यह महूदी पहाड़ के नीचे स्थित है. यहां के बाशिंदे हैं बिरहोर आदिम जनजाति. जंगल ही इनका जीवन है. साथ ही जंगल का संरक्षण करना उनकी परंपराओं और जीवनशैली में है. इनका मुख्य पेशा शिकारी करना है, लेकिन अब उन्होंने पौष्टिक अनाजों की जैविक खेती करना भी शुरू किया है. घरों में किचन गार्डन के माध्यम से सब्जियों और फलदार वृक्षों की खेती भी कर रहे हैं. सतबहिया में बिरहोरों के 130 जनसंख्या है. यहां के बिरहोर अन्य गांव के बिरहोरों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गये हैं, जबकि प्रखंड के करमाटांड़, नापो, पोटंगा के बिरहोर जंगलों में शिकारी किया करते हैं.

बिर का अर्थ जंगल और होर का अर्थ आदमी होता है. यानी जंगल का आदमी. बिरहोर विशेष रूप से पिछड़ी जनजाति में से एक है. यह घुमंतू जनजाति मानी जाती है. सतबहिया के बिरहोर धान की मैसाई कर चुके हैं. फिलवक्त आलू, मूली, सरसों की खेती कर रहे हैं.

शनिचर बिरहोर 2 एकड़ में धान की खेती कर चुके हैं. मुकेश बिरहोर, छोटन बिरहोर 10-10 कट्ठा, बिरसा बिरहोर एक एकड़, बलकहिया बिरहोर 1.15 एकड़, मगरा बिरहोर 1.15 एकड़, महावीर बिरहोर, सुरेंद्र बिरहोर, पांडेय बिरहोर, विनोद बिरहोर, खाटू बिरहोर, पाता बिरहोर, मंजू मोसोमात, सुरेश बिरहोर, मुन्ना बिरहोर और चरका बिरहोर धान की खेती कर चुके हैं. अब आलू की खेती में लगे हुए हैं.

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मालती बिरहोर ने बताया कि यहां केवल शनिचर बिठूर को एक ट्रैक्टर खेती करने के लिए मिला है. बाकी हम सभी 40 बिरहोरों को खेती करने के लिए हल- बैल की आवश्यकता है. यहां के पूर्व में शिकार करते थे और वनोपज एकत्र करते थे. बंदरों का शिकार उन्हें बहुत प्रिय था, लेकिन अब शिकार पर कानूनी प्रतिबंध है. अब बिरहोर मुख्यतः रस्सी बनाकर बेचते हैं.

पटुआ ( पौधा) और चोप की छाल से रस्सी बनती है

खेती- किसानी में काम आनेवाली रस्सियां एवं मवेशियों को बांधने के लिए रस्सियां बनाते हैं. जोत, गिरबां, सींका, दउरी आदि चीजों से रस्सी बनाते हैं. इनमें से जोत एवं गिरबां गाय- बैल को बांधने एवं हल बक्खर में काम आते हैं. खेती और पशुपालन साथ- साथ होता है. इसके अलावा सरई पत्तों से दोना- पत्तल बनाकर भी बेचते हैं. इस सबसे ही उनकी आजीविका चलती है. इनकी जीवनशैली अब भी जंगल पर आधारित है. इनमें पढ़े- लिखे बहुत कम हैं, हालांकि अब साक्षर एवं शिक्षित होने लगे हैं. यहां 2 बिरहोर मैट्रिक पास है. शनिचर बिरहोर की बेटी अनिता कुमारी स्नातक पास है. फिलवक्त वह बीएड कर रही है.

Posted By : Samir Ranjan.

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