परिवार की याद आते ही छलक आते थे आंसू

Updated at : 17 Oct 2019 1:18 AM (IST)
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परिवार की याद आते ही छलक आते थे आंसू

दाढ़ी और बाल बनाने की नहीं थी इजाजत टाटीझरिया : तालिबानियों के कब्जे से डेढ़ साल बाद अपने घर लौटे काली महतो के घर अभी से दीवाली शुरू हो गयी है. टाटीझरिया के बेड़म गांव में लोगों की खुशी देखते ही बन रही है. मंगलवार की रात करीब आठ बजे काली महतो जैसे ही दिल्ली […]

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दाढ़ी और बाल बनाने की नहीं थी इजाजत

टाटीझरिया : तालिबानियों के कब्जे से डेढ़ साल बाद अपने घर लौटे काली महतो के घर अभी से दीवाली शुरू हो गयी है. टाटीझरिया के बेड़म गांव में लोगों की खुशी देखते ही बन रही है. मंगलवार की रात करीब आठ बजे काली महतो जैसे ही दिल्ली से अपनी पत्नी व पुत्र चिंतामन के साथ गांव पहुंचा, पूरे गांव के लोगों ने गर्मजोशी से उसका स्वागत किया.
अफगानिस्तान में तालिबानियों के कब्जे में उसने 540 दिन तक कैसे बिताया, यह सोच कर वह सिहर जाता है. परिवार की याद में कभी वह रोता था, तो कभी भगवान को याद करता था. नयी जिंदगी मिलने के बाद वह अब गांव में ही परिवार के साथ रहना चाहता है.
काली महतो की जुबानी
काली महतो ने बताया कि वह मजदूरी का काम करने अफगानिस्तान गया था. छह मई 2018 को वह साथियों के साथ काम के लिए निकला ही था कि तालिबानी आतंकियों ने सात भारतीय समेत आठ लोगों को बलगाम शहर से बंदूक की नोक पर अगवा कर लिया था. आतंकियों ने कब्जे में लेने के बाद उनसे कहा कि उनसे उनकी कोई दुश्मनी नहीं है. अफगानिस्तान सरकार ने उनके कुछ लोगों को पकड़ लिया है. उनके रिहा होते ही उन्हें भी वह छोड़ देंगे.
उसके बाद सभी को अज्ञात स्थान पर ले जाया गया, जहां एक कैंपस में 24 घंटे की पहरेदारी के बीच उन्हें रखा गया था. काली ने बताया कि उन्हें तालिबानी चिकित्सा सुविधा भी उपलब्ध कराते थे. अगवा लोगों में एक इंजीनियर सूगर का पेसेंट था, जिसकी वे जांच कराते थे और दवा देते थे.
खाने-पानी की व्यवस्था भी थी. तालिबानियों ने अपने गुर्गों को हिदायत दी थी कि अगवा लोगों की धार्मिक आस्था पर चोट नहीं पहुंचे. सिर्फ दाढ़ी और बाल कटवाने की इजाजत नहीं थी. डेढ़ साल में उसके चेहरे पर लंबी-लंबी दाढ़ी व सिर पर बड़े-बड़े बाल हो गये थे. काली के अनुसार छह अक्तूबर को तालिबान के कैद से रिहा होने के बाद अफगानिस्तान में उसने दाढ़ी व बाल बनवाया.
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