शहादत दिवस पर विशेष : साथियों को मरता देख अलबर्ट अकेले पाक सैनिकों पर टूट पड़े थे

Updated at : 03 Dec 2020 9:30 AM (IST)
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शहादत दिवस पर विशेष : साथियों को मरता देख अलबर्ट अकेले पाक सैनिकों पर टूट पड़े थे

1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की मुक्ति को लेकर हुआ था भारत-पाक युद्ध, साथियों को मरता देख अलबर्ट अकेले पाक सैनिकों पर टूट पड़े थे

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गुमला : पाकिस्तान से बांग्लादेश की मुक्ति अभियान को लेकर 1971 में भारत-पाक युद्ध हुआ था. उस समय 29 साल के अलबर्ट एक्का को बी-कंपनी में रखा गया था. गंगासागर के पास भारत का मोर्चा था. वहीं, पास रेलवे स्टेशन भी था. जहां पाकिस्तान के घुसपैठी अड्डा जमाये हुए थे. वहां 165 पाकिस्तानी थे.

भारत के सैनिकों ने गंगासागर के पास दो दिसंबर को पाक सेना पर आक्रमण किया था. युद्ध जारी रहा. तीन दिसंबर की रात 2:30 बजे भारतीय सैनिक रेलवे पार कर गये. जैसे ही भारतीय सैनिकों ने रेलवे लाइन पार किया, पाकिस्तान सेना के संतरी ने भारतीय सैनिकों को रोक लिया. भारतीय सैनिकों ने उस संतरी को गोली मार दी और दुश्मन के इलाके में घुस गये.

तभी पाकिस्तान के सैनिकों ने एलएमजी बंकर से भारतीय सैनिकों पर आक्रमण कर दिया. अलबर्ट एक्का ने बहादुरी का परिचय देते हुए अपना ग्रेनेड एलएमजी में डाल दिया. इससे पाक सेना का पूरा बंकर उड़ गया. इसके बाद भारतीय सैनिकों ने 65 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया और रेलवे के आउटर सिग्नल इलाका को कब्जे में लेने के बाद वापस आने के दौरान टॉप टावर मकान के ऊपर खड़े पाक सैनिकों ने अचानक मशीनगन से भारतीय सैनिकों पर हमला कर दिया.

इसमें 15 भारतीय सैनिक मारे गये थे. 15 भारतीय सैनिकों को मरता देख अलबर्ट एक्का दौड़ते हुए बंदर की तरह टॉप टावर के ऊपर चढ़ गये. उसके बाद टॉप टावर के मशीनगन को अपने कब्जे में लेकर दुश्मनों को तहस-नहस कर दिया. इस दौरान उन्हें 20 से 25 गोलियां लगीं. पूरा शरीर गोलियों से छलनी था. वे टॉप टावर से नीचे गिर गये, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली.

शहीद की पत्नी बलमदीना एक्का (84 वर्ष) ने अपने पति की कई पुरानी बातें प्रभात खबर से साझा कीं. उन्होंने बताया कि शहीद अलबर्ट पढ़ाई में कमजोर थे, लेकिन खेल में आगे थे. हॉकी उनका पसंदीदा खेल था. उस जमाने में घर में बनाये गये लकड़ी के हॉकी स्टिक व कपड़े की गेंद से वे हॉकी खेलते थे. सेना में रहते हुए वे जब भी छुट्टी में आते थे, तो हॉकी जरूर खेलते थे.

उनका शरीर भी मजबूत था. खेतीबारी में भी वे पूरा समय देते थे. हल चलाना उनका शौक था. उन्हें चिड़िया मारने का भी शौक था. फुर्सत के पलों में गांव के दोस्तों के साथ वे चिड़िया मारने जंगल जाते थे. बचपन से ही वह सेना में जाने की बात करते थे. खुशी है कि वह सेना में गये. दुश्मनों के छक्के छुड़ाते हुए शहीद हुए. आज पूरा देश उसे नमन करता है.

posted by : sameer oraon

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