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19 दिन में 65 बार गुमला के जंगलों में लग चुकी है आग, जानें क्या है कारण

By Prabhat khabar Digital
Updated Date
Jharkhand News : गुमला के जंगलों में लगी आग को बुझाते कर्मी.
Jharkhand News : गुमला के जंगलों में लगी आग को बुझाते कर्मी.
प्रभात खबर.

Jharkhand News, Gumla News, गुमला न्यूज (जगरनाथ) : मार्च माह में गुमला जिला के जंगलों में आगजनी की घटना हो रही है. एक मार्च से लेकर 19 मार्च 2021 तक जिले के जंगलों में एक-दो बार अथवा एक-दो दर्जन नहीं, बल्कि 65 बार आग लग चुकी है. गुरुवार को ही जिला अंतर्गत दो प्रखंडों के जंगल में आग लग चुकी है. जंगलों में आग लगने से सिर्फ पेड़- पौधों को ही नुकसान नहीं हो रहा है, बल्कि पशु- पक्षी भी इससे प्रभावित हो रहे हैं.

गुमला रेंज के सोकराहातू जंगल एवं बिशुनपुर रेंज के बरांगपाठ जंगल में आग लगी थी. सोकराहातू में लगी आग लगभग 4 हेक्टेयर एवं बरांगपाठ जंगल में लगभग 5 हेक्टेयर क्षेत्र तक आग फैल गयी थी. हालांकि, आगजनी की सभी घटनाओं से वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, गुमला सफलतापूर्वक निपट चुका है. लेकिन, आग लगने के कारण न केवल मिट्टी जल गयी, बल्कि हजारों की संख्या में छोटे-छोटे जंगली और जमीन पर निकल रहे नये पौधे भी जल गये.

लघु अनुक्रम (Short sequence) में बार-बार आग लगने के कारण प्राकृतिक पुनर्जन्म (Natural rebirth) को नुकसान पहुंचता है. साथ ही आग के कारण विभिन्न प्रकार के जंगली प्रजातियों की विविधता भी कम हो रही है. वन प्रमंडल पदाधिकारी श्रीकांत ने बताया कि आग लगने की अधिकांश घटनाएं पहाड़ और उसकी तलहटी से सटे क्षेत्र में होती हैं.

उन्होंने बताया कि झारखंड में 4 लोगों में से कम से कम एक व्यक्ति अपनी आजीविका के लिए वनों पर निर्भर होता है तथा देश में हर साल वनों की आग के कारण कम से कम सरकार को 1100 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है. हर साल देश के 647 जिलों के लगभग आधे हिस्से के वनों में आग लगती है. आग के कारण वन कवर क्षेत्रों में रहने वाली भारत की 92 मिलियन से अधिक आबादी के लिए खतरा उत्पन्न हुआ है. भारत में वनों की आग के पैटर्न और रुझानों का विश्लेषण करते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि मध्य भारत का क्षेत्र आग से सबसे अधिक प्रभावित है.

इन कारणों से लगती है आग

जंगल, पहाड़ और उसकी तलहटी से सटे क्षेत्रों में आग लगने के अलग-अलग कारण है. जिसमें कई जगहों पर जंगल से महुआ चुनने के लिए स्थानीय लोगों द्वारा ही आग दिया जाता है. कहीं-कहीं लोग जंगली क्षेत्र से गुजरने के दौरान बीड़ी अथवा सिगरेट पीते हुए गुजरते हैं और माचिस की जलती हुई तीली या जलती सिगरेट के बचे हुए हिस्से को फेकने के कारण आग लगती है. जलती हुई तीली अथवा जलती हुई बीड़ी या सिगरेट सूखे पत्ते पर गिरता है, जिससे आग लगती है. वहीं, पहाड़ और उसकी तलहटी से सटे क्षेत्रों में पत्थरों के आपसी घर्षण के कारण चिंगारी निकलती है जिससे आग लग जाती है.

आग की रोकथाम के लिए राष्ट्रीय योजना बनाने की मांग

वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा वनों की आग की रोकथाम के लिए राष्ट्रीय योजना बनाने की मांग की गयी है. वन प्रमंडल पदाधिकारी श्रीकांत ने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करने के लिए राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (एनडीसी) को पूरा करने के लिए वनों की आग को रोकने के लिए परिणाम तक पहुंचना महत्वपूर्ण है. हालांकि, MOEF ने 2000 में वन अग्नि रोकथाम और प्रबंधन (FFPM) पर राष्ट्रीय दिशा-निर्देश जारी किये थे. लेकिन, उक्त दिशा-निर्देश के आलोक में अनुपालन शुरू नहीं हो सका है. उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 से वन अग्नि निवारण एवं प्रबंधन केंद्रीय प्रायोजित 60:40 हिस्सेदारी में योजना पूरे भारत में लागू है. जिसे गुमला जिला में भी पालन किया जा रहा है.

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