सबूत देने के बाद मां को पहचाना
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :24 May 2016 12:10 AM (IST)
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सात साल पहले दिल्ली में बेची गयी थी गुमला की रीता सात साल पहले दलालों ने रीता को दिल्ली में बेच दिया था. उसे चार बार बेचा गया. सात साल बाद वह अपनी मां को भी नहीं पहचान पायी. मां ने बचपन की तसवीरें दिखायी, तो रीता को अपना बचपन और अपनी मां भी याद […]
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सात साल पहले दिल्ली में बेची गयी थी गुमला की रीता
सात साल पहले दलालों ने रीता को दिल्ली में बेच दिया था. उसे चार बार बेचा गया. सात साल बाद वह अपनी मां को भी नहीं पहचान पायी. मां ने बचपन की तसवीरें दिखायी, तो रीता को अपना बचपन और अपनी मां भी याद आयी.
दुर्जय पासवान
गुमला : मां के सबूत देने के बाद ही बेटी ने अपनी मां को पहचाना. यह कहानी गुमला प्रखंड के गिंडरा महुआटोली गांव की रीता की है. दिल्ली में सात साल पहले दलालों द्वारा बेची गयी रीता कुमारी (बदला नाम) के सामने जब उसकी मां बिरस पहुंची, तो रीता ने अपनी मां को पहचानने से इनकार कर दिया. बचपन की तसवीर दिखाने व यादें ताजा कराने के बाद ही रीता ने अपनी मां को पहचाना. इतने लंबे अरसे के बाद अपनी बेटी से मिल कर मां बिरस काफी खुश है.
रीता भी अपने परिवार में आकर काफी खुश है. सोमवार को जब रीता को गुमला के पुस्तकालय भवन स्थित सीडब्ल्यूसी कार्यालय में प्रस्तुत किया गया, तो वह अपनी बड़ी बहन से लिपट कर रोने लगी. रीता ने कहा कि अब वह कभी भी दिल्ली नहीं जायेगी. घर में ही रहेगी. गांव के स्कूल में पढ़ेगी. कागजी कार्रवाई व रीता का बयान लेने के बाद सीडब्ल्यूसी की चेयरमैन तागरेन पन्ना ने रीता को उसके परिजनों को सौंप दिया.
18 मई को गुमला पहुंची : निर्मल छाया में रीता को रखने के बाद संस्था के लोगों ने रीता के परिजनों की जानकारी ली. इसमें गुमला सीडब्ल्यूसी ने सहयोग किया. इसके बाद गुमला से दिल्ली गयी टीम रीता को 18 मई को गुमला लेकर आयी. पांच दिन तक रीता को विकास भारती द्वारा संचालित बाल गृह में रखा गया. बाल गृह के प्रोजेक्ट इंचार्ज उत्तम कुमार मोदी ने बताया कि रीता की काउंसेलिंग हुई है. वह अब दिल्ली नहीं जाना चाहती है. कागजी कार्रवाई के बाद उसे सीडब्ल्यूसी में सोमवार को प्रस्तुत किया गया. यहां से उसे परिवार को सौंप दिया गया.
सात बहन है रीता : रीता के पिता का निधन हो गया है. मां बिरस देवी मजदूरी करती है. सात बहनें हैं. घर की परवरिश की चिंता मां पर थी. सात साल पहले वह अपनी चचेरी बहन के बहकावे में आकर दिल्ली चली गयी थी.
मां को नहीं पहचान सकी : रीता निर्मल छाया में है. इसकी जानकारी जब उसकी मां बिरस को हुई, तो वह अपने दामाद के साथ दिल्ली गयी. वह रीता को वापस लाना चाहती थी, लेकिन रीता ने अपनी मां को पहचानने से इनकार कर दिया. इसके बाद बिरस अपने दामाद के साथ वापस गुमला आ गयी. बचपन की कुछ तसवीर व सबूत लेकर पुन: बिरस दिल्ली गयी और रीता से कहा कि वह उसकी मां है. पुरानी यादें बताने के बाद रीता ने अपनी मां को पहचाना.
चार बार बिकी रीता : गुमला प्रखंड के गिंडरा महुआटोली गांव की रीता को उसकी ही चचेरी बहन बिंदी ने दिल्ली में सात साल पहले ले जाकर बेच दिया था. रीता ने प्रभात खबर को बताया कि उसे चार स्थानों पर बेचा गया था. पहले बिंदी ने उसे प्लेसमेंट एजेंसी के यहां ले जाकर बेच दिया था. इसके बाद एजेंसीवाले उसे जनकपुरी में समीर व मीनाक्षी के घर में काम करने के लिए बेच दिया. एक साल तक उसने समीर के घर में काम किया. फिर वहां से वापस एजेंसी के लोग ले आये. पुन: उसे दूसरे प्लेसमेंट एजेंसी के यहां बेचा गया. प्लेसमेंट एजेंसी ने रीता को गाजियाबाद के सुदर्शन लाल के यहां बेच दिया. यहां रीता ने चार साल तक काम किया.
रीता सात साल बाद दिल्ली से मुक्त हुई है. पूछताछ के बाद उसे उसके परिजनों को सौंप दिया गया है. दिल्ली में उसने जितना दिन काम किया है, उसकी मजदूरी दिलायी गयी है.
तागरेन पन्ना, चेयरमैन, सीडब्ल्यूसी
पुलिस ने मुक्त कराया
ऑपरेशन मुस्कान के तहत चार माह पहले दिल्ली पुलिस व निर्मल छाया ने संयुक्त रूप से अभियान चला कर रीता को गाजियाबाद स्थित सुदर्शन के घर से मुक्त कराया. रीता ने कहा कि सुदर्शन के घर से मुक्त होने के बाद वह चार साल तक निर्मल छाया में रही. यहां उसे ट्यूशन पढ़ाया जाता था. गांव में कक्षा चार तक शिक्षा ग्रहण की थी. दिल्ली में बेचने के बाद वह पढ़ना -लिखना भूल गयी थी. निर्मल छाया में चार माह रहने के बाद पुन: रीता ने पढ़ना-लिखना शुरू किया.
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