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पर्यटन स्थल का दर्जा प्राप्त करने को तरस रहा गुमला

गुमला : अदभुत प्राकृतिक छटा. धार्मिक स्थल. ऐतिहासिक धरोहर. कल-कल बहती नदी की धारा. सुंदर पत्थर. आसपास घने जंगल. ऊंचे पहाड़. शांत वातावरण. यह पहचान गुमला जिला की है. गुमला अपने अंदर कई ऐतिहासिक व धार्मिक स्थलों का समेटे हुए हैं, लेकिन अभी तक इसे पर्यटन स्थल का दर्जा नहीं मिला है. हर चुनाव में […]

गुमला : अदभुत प्राकृतिक छटा. धार्मिक स्थल. ऐतिहासिक धरोहर. कल-कल बहती नदी की धारा. सुंदर पत्थर. आसपास घने जंगल. ऊंचे पहाड़. शांत वातावरण. यह पहचान गुमला जिला की है. गुमला अपने अंदर कई ऐतिहासिक व धार्मिक स्थलों का समेटे हुए हैं, लेकिन अभी तक इसे पर्यटन स्थल का दर्जा नहीं मिला है. हर चुनाव में यह चुनावा मुद्दा बनता है. परंतु चुनाव खत्म होते ही विधायक व सांसद मुद्दे भूल जाते हैं. यही वजह है कि आज भी गुमला के प्रमुख स्थल विकास को तरस रहे हैं.

हालांकि समय-समय पर स्थानीय लोग गुमला को पर्यटन स्थल का दर्जा देने की मांग करते रहे हैं, लेकिन स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के कारण आज भी गुमला जिला को पर्यटन स्थल का दर्जा नहीं मिला है, जबकि पर्यटन स्थल का दर्जा पाने के लिए गुमला के पास सभी आधारभूत संरचनाएं व यहां की सुंदर बनावट है. गुमला के प्रमुख धार्मिक व ऐतिहासिक स्थल जिसे जानने के बाद कहा जा सकता है कि हां गुमला वाकई में सुंदर जिला है.
हीरादाह. यह जिला मुख्यालय से करीब 45 किमी दूर है. यह धार्मिक सहित पर्यटन स्थल के रूप में विश्व विख्यात है. इसका नामकरण नदी से हीरा मिलने के कारण हीरादह पड़ा. यह नागवंशी राजाओं का गढ़ है. इस इलाके का अनुसंधान हो, तो यहां से अभी भी हीरा मिलने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. इस गढ़ में आज भी कई रहस्य छुपे हुए हैं. नागवंशी राजाओं के अंत के बाद यह स्थल वर्षों से गुमनाम है.
नागफेनी. यह जिला मुख्यालय से 16 किमी दूर है. यह अपने अंदर कई ऐतिहासिक व धार्मिक धरोहर समेटे हुए है. यह जिला के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से एक है. यह गांव नागवंशी राजाओं का गढ़ था, जिनके भवनों के अवशेष आज भी देखने को मिलते हैं. यहां जगन्नाथ मंदिर, शिवलिंग पर लिपटे अष्टधातु निर्मित नाग, अष्टकमल दल, पाटराजा व नागसंत्थ देखने योग्य हैं. कोयल नदी की धारा आकर्षित करती है.
देवाकीधाम. घाघरा प्रखंड से तीन किमी दूर केराझारिया नदी के तट पर स्थित देवाकी बाबाधाम धार्मिक स्थल के अलावा पर्यटन स्थल के रूप में विख्यात है. महाभारत काल में पांडव के अज्ञातवास के समय भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पांच शिवलिंग की स्थापना की गयी थी. इसमें से एक शिवलिंग देवाकीधाम में है, इसलिए इस स्थल का नाम श्रीकृष्ण की मां देवकी के नाम पर देवाकीधाम पड़ा. पांडवों के अज्ञातवास की समाप्ति के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने देवाकीधाम में ही शंख बजाया था.
पंपापुर. पंपापुर को वर्तमान में पालकोट प्रखंड से जाना जाता है. यह गुमला से 25 किमी दूर है. यह दर्शनीय स्थल है. यहां सुग्रीव का गुफा साक्षात है. गोबर सिल्ली पहाड़, काजू बगान, पहाड़ की चोटी पर तालाब, पहाड़ के बीच में मंदिर, निरक्षर झरना देखने लायक हैं. यहां का इतिहास नागवंशी राजाओं से जुड़ा हुआ है. यह पर्यटन स्थल के रूप में विश्व विख्यात है. यह ऋषि मुनियों की तपोभूमि है. इसके बावजूद पंपापुर पर्यटन स्थल का दर्जा को तरस रहा है.
बाघमुंडा. यह बसिया प्रखंड में है. गुमला से 50 किमी दूर है. यहां जो एक बार आता है, बार-बार आने की इच्छा लेकर जाता है. यहां तीन दिशाओं से निकलने वाली नदी की धारा देखते ही बनती है. यह घने जंगल व पहाड़ों के बीच अवस्थित है. जिला प्रशासन के प्रयास से इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का कवायद शुरू किया गया था. इसके बाद यह ठंडे बस्ते में पड़ गया है.
टांगीनाथ धाम. यह डुमरी प्रखंड में है. गुमला से 75 किमी दूर है. यह धार्मिक स्थल है. यहां भगवान टांगीनाथ के त्रिशूल को देख सकते हैं. यहां कई प्राचीन स्रोत हैं, जो देखने लायक है और दिल को छूता है. मझगांव में होने के कारण यहां आसपास के गांव भी देखने योग्य है. सरकार व प्रशासन की उपेक्षापूर्ण रवैये के कारण आज भी यह इलाका विकास की बाट जोह रहा है.
आंजनधाम. यह गुमला से 20 किमी दूर है. यहीं भगवान हनुमान का जन्म हुआ था. अंजनी मां का निवास स्थान था. पहाड़ की चोटी पर भगवान हनुमान का मंदिर है. यह देश का पहला मंदिर होगा, जहां माता अंजनी की गोद में भगवान हनुमान बैठे हुए हैं. यहां की हसीन वादियों दिल को रोमांचित करती है, लेकिन यह उपेक्षित है. लंबे समय से इस क्षेत्र के विकास की मांग चुनावी वादों तक सिमट कर रह गया है.
Prabhat Khabar Digital Desk
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