काली मां के दरबार से कभी खाली हाथ नहीं लौटा कोई

Published at :19 Oct 2017 12:03 PM (IST)
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काली मां के दरबार से कभी खाली हाथ नहीं लौटा कोई

गुमला: गुमला शहर के जशपुर मार्ग पर स्थित काली मंदिर में बिराजे काली मां के दरबार से आजतक कोई खाली हाथ नहीं लौटा है. यहां दिल से मांगी हर मुराद पूरी होती है. बनारस, देवघर, रामेश्वर, रजरप्पा व उज्जैन की तरह यह भी शक्ति पीठ के रूप में प्रसिद्ध है. गुमला में मां काली की […]

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गुमला: गुमला शहर के जशपुर मार्ग पर स्थित काली मंदिर में बिराजे काली मां के दरबार से आजतक कोई खाली हाथ नहीं लौटा है. यहां दिल से मांगी हर मुराद पूरी होती है. बनारस, देवघर, रामेश्वर, रजरप्पा व उज्जैन की तरह यह भी शक्ति पीठ के रूप में प्रसिद्ध है. गुमला में मां काली की मूर्ति वर्ष 1948 में स्थापित की गयी थी, तब से यह हिंदुओं के लिए श्रद्धा का केंद्र बन गया. आज यहां दूर-दूर से श्रद्धालु मां काली के दर्शन के लिए आते हैं.

काली पूजा के अवसर पर यहां भक्तों की भीड़ देखते ही बनती है. ऐसे यहां हर रोज सुबह शाम भक्तों की लंबी कतार देखी जा सकती है. मंदिर के सामने से गुजरने वाला हर शख्स एकबार जरूर मां के दरबार में सिर झुका कर गुजरता है. यहां मां काली की मूर्ति व मंदिर निर्माण की भी पुरानी कहानी है. मंदिर के पुजारी ने बताया कि स्वतंत्रता सेनानी गंगा महाराज (अब स्वर्गीय) ने यहां सबसे पहले खपड़ानुमा मंदिर में मां काली की मूर्ति स्थापित की थी. उसके बाद 1970 में मंदिर का निर्माण हुआ. यहां मां काली के अलावा भगवान शिव व अन्य देवी-देवताओं की मूर्ति हैं.

गढ़वाल से गुमला में आकर बसे थे गंगा : गंगा महाराज गढ़वाल के रहने वाले थे. वे स्वतंत्रता सेनानी थे. अपने कुछ साथियों के साथ उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद किया था. इसके बाद अंग्रेज उन्हें पकड़ने के लिए खोजने लगे. अंग्रेजों से बचने के लिए वर्ष 1945 में वे गुमला आ गये. उस समय गुमला जंगली इलाका था. बहुत कम घर थे. वे गुमला के कांसीर गांव में बस गये. अभी जो काली मंदिर के समीप से गुजरने वाली नदी पर पुल है, उस समय पुल नहीं था. नदी से पार करके लोग आते-जाते थे. गंगा महाराज अपने कुछ साथियों के साथ 35 किमी पैदल चल कर हर रोज कांसीर से गुमला आते थे और नदी के किनारे पूजा पाठ करते थे. उसी समय उनके मन में मां काली की मूर्ति स्थापित करने का विचार आया. कुछ लोगों के सहयोग से उन्होंने मां काली की मूर्ति स्थापित की और पूजा पाठ करने लगे. मंदिर के सबसे पुराने पुजारी थे. चार अक्तूबर 1985 को उनकी मृत्यु हो गयी.

दीपावली में मुर्गा की बलि देने की प्रथा : गुमला. गुमला जिला के ग्रामीण क्षेत्रों में दीपावली की अमावस्या को सोहराई पर्व के रूप में मनाया जाता है. इस दिन रात को लाल रंग के मुर्गा की बलि दी जाती है. माना जाता है कि अमावस्या की रात इष्ट देव को बलि पंसद है, इसलिए ग्रामीण क्षेत्र में लोग अपने देवता को खुश करने के लिए मुर्गे की बलि देकर सुख शांति की कामना करते हैं. मान्यता है कि इष्ट देव को खुश करने के लिए गोहार में ही बलि दी जाती है और घर के मुखिया जो बलि देते हैं, वहीं उस मुर्गा का सेवन भी करते हैं. माना जाता है कि ऐसा करने से घर में लक्ष्मी का वास होता है.

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