आस्था का प्रतीक है खोरा दुर्गा मंदिर

Published at :29 Sep 2017 10:11 AM (IST)
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आस्था का प्रतीक है खोरा दुर्गा मंदिर

गुमला: रांची-गुमला के नेशनल हाइवे के किनारे स्थित खोरा गांव में दुर्गा मंदिर है. यह शहर से सात किमी दूर है. यहां मां दुर्गा का प्राचीन मंदिर है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गयी सभी मन्नत पूरी होती है. कहा जाता है कि इस गांव के प्राचीन जमींदार शिखर साहब थे. उन्होंने […]

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गुमला: रांची-गुमला के नेशनल हाइवे के किनारे स्थित खोरा गांव में दुर्गा मंदिर है. यह शहर से सात किमी दूर है. यहां मां दुर्गा का प्राचीन मंदिर है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गयी सभी मन्नत पूरी होती है. कहा जाता है कि इस गांव के प्राचीन जमींदार शिखर साहब थे. उन्होंने काफी समय तक यहां का बागडोर संभाला. शिखर साहब ने ही इस प्राचीन मंदिर की स्थापना की.

श्रीदुर्गा पूजा समिति खोरा के वरिष्ठ सदस्य मनमोहन सिंह ने मंदिर के इतिहास के संबंध में बताया कि शिखर साहब को अपने जीवन काल में एक बार आर्थिक संकट से जूझना पड़ा था. अपने पुत्र की शादी में ओड़िशा राज्य के क्योंझर जिला में बारात गये थे. बारात से लौटने के क्रम में आर्थिक समस्या आ गयी, तो रांची में उन्होंने अंग्रेज सरकार के पीपी साहब से कुछ पैसा लेकर ग्राम खोरा एवं कांके रांची के ग्राम मेसरा को गिरवी रख दिया. काफी समय गुजर जाने के बाद भी शिखर साहब ने पीपी साहब को पैसा नहीं लौटाया, तो उनके द्वारा उक्त दोनों गांवों को नीलाम कर दिया गया. इस नीलामी के क्रम में ही राधा बुधिया ने उक्त दोनों गांवों को ले लिया.

1956 तक जमींदारी प्रथा उन्मूलन के पूर्व तक दोनों गांव ग्राम खोरा एवं ग्राम मेसरा के जमींदार राधा बुधिया थे. इनके मैनेजर मीना सिंह थे, जो मनमोहन सिंह (वर्तमान में लूथेरान स्कूल के शिक्षक हैं) के दादा थे. जब शिखर साहब खोरा से जाने लगे, तो दुर्गा जी की स्थापित मूर्ति को ले जाने के लिए हाथी मंगाया गया. जब मूर्ति को हाथी पर रखा जाने लगा, तो हाथी चिंघाड़ मार कर बैठ गया. उस रात्रि उन्हें स्वप्न आया कि मुझे यहां से मत ले जाओ. इसके बाद शिखर साहब यहां से चले गये. प्राचीन काल में यहां भैंसों की बलि दी जाती थी. बलि देने वाले हथियार आज भी मंदिर में हैं. हालांकि अब बलि की प्रथा बंद कर दी गयी है. मंदिर के बगल में राधा कृष्ण एवं कुछ दूरी पर शिव का मंदिर है. दशहरा पर्व पर यहां भव्य कार्यक्रम होता है. विजय दशमी में विजययात्रा एवं एकादशी में मेला एवं रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है. इस गांव में एक प्राचीन परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है. विजयदशमी की रात लोग अपने से बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.

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