सरकारें बदलती रही, मगर ऐतिहासिक तालाब की नहीं बदली तस्वीर

Edited by SANJEET KUMAR
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सौंदर्यीकरण के नाम पर आवंटित राशि का होता रहा बंदरबांट

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बसंतराय प्रखंड मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक तालाब के सौंदर्यीकरण के नाम पर सरकार द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किये गये. मगर तालाब का सौंदर्यीकरण तो नहीं हो सका, हां तालाब अपना अस्तित्व धीरे-धीरे खोता दिखायी दे रहा है. मालूम हो कि बहुत बड़े भूभाग में फैला यह तालाब जिसका पिंड भाग 28 बीघा 19 कट्ठा 17 धूर और जल भाग 19 बीघा 19 कट्ठा एक धूर है. प्रत्येक वर्ष 14 अप्रैल को हजारों की संख्या में सफाहोड़ और झारखंड व बिहार से लाखों की तादाद में श्रद्धालु मन्नतें मांगने और स्नान करने आते हैं. जानकारों का कहना है कि मन्नतें पूरी होने पर पाठा-पाठी का चढ़ावा चढ़ाते हैं. वहीं सौंदर्यीकरण के नाम पर वन प्रमंडल विभाग द्वारा 2015 में 65 लाख 64 हजार रुपये की लागत से चार हजार पौधों का रोपण किया गया था. मगर विभागीय लापरवाही के कारण आधे से अधिक पौधा लगने से पहले मर चुका था. 80 लाख रुपये की लागत से अतिथिशाला का निर्माण कराया गया, मगर निर्माण कार्य में भारी पैमाने पर अनियमितता बरती गयी. इतना ही नहीं आज तक बिजली पानी की समुचित व्यवस्था नहीं हो सकी और न ही भवन का दोबारा रंगाई-पुताई ही किया गया. 2015 में तत्कालीन विधायक रघुनंदन मंडल ने विधायक निधि से 14 लाख की राशि सौंदर्यीकरण के नाम पर मुहैया करायी थी, जिसमें जलकुंभी निकालने, घाट की मरम्मती, सोलर स्ट्रीट लगाने के नाम पर बिचौलियों द्वारा बंदरबांट किया गया.

पर्यटन सचिव व विधायक ने सौंदर्यीकरण के लिए उपलब्ध करायी थी राशि

स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि वर्ष 2013 में पर्यटन सचिव सजल चक्रवर्ती और तत्कालीन विधायक संजय प्रसाद यादव की उपस्थिति में सौंदर्यीकरण को लेकर शिलान्यास भी किया गया था. इसमें तीन करोड़ 64 लाख की लागत से घाट, पार्क, गेट, गार्ड रुम, पीसीसी पथ, सेनेटरी पार्क आदि का निर्माण होना था. इस संबंध में जिला प्रशासन द्वारा उदासीन रवैया आज तक रहा और सिर्फ शिलान्यास होकर रह गया. इतना ही नहीं, तालाब की जमीन को 104 लोगों द्वारा लगभग तीन बीघा अतिक्रमण किया हुआ है. मगर आज तक प्रशासन द्वारा अतिक्रमण मुक्त कराने के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति ही की गयी है.

सौंदर्यीकरण से पर्यटकों की आमद बढ़ने की थी संभावना

ऐतिहासिक तालाब का रोचक तथ्य यह है कि आदिवासी समुदाय के सफाहोड़ के साथ हिन्दू-मुस्लिम के आपसी सद्भाव का सबसे बड़ा संगम का उदाहरण भी है. पूर्वजों द्वारा बताया जाता है कि तालाब का इतिहास राजा मानसिंह से भी जुड़ा है. हर वर्ष 14 अप्रैल के दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंच कर मन्नते मांगते हैं. मन्नतें पूरी होने पर पाठा-पाठी के साथ कबूतर का चढ़ावा भी चढ़ाते हैं. तालाब में आकर चर्म रोग से मुक्ति के लिए स्नान भी करते थे. मेले में आने वाले श्रद्धालुओं में झारखंड के कई जिलों के साथ बिहार और अन्य राज्यों के भी कई जिलों से श्रद्धालु आते हैं. पूर्व में यह मेला महीनों तक लगा रहता था. अब धीरे-धीरे यहां की लोकप्रियता खत्म होती जा रही है. इसका कारण है कि यह हमेशा से प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार रहा है, जबकि प्रत्येक वर्ष मेले से कई लाख राजस्व भी प्राप्त होता है.

तालाब से जुड़ी है ऐतिहासिक मान्यता

बसंतराय तालाब की चर्चा में राजा मानसिंह की कहानी काफी चर्चित है. बुजुर्गों का कहना है कि पुराने समय में राजा मानसिंह ने अपनी बेटी के लिए इस तालाब का निर्माण कराया था. हालांकि करीब 52 एकड़ में फैला यह तालाब वर्तमान समय में अतिक्रमणकारियों द्वारा अतिक्रमण का शिकार हो चुका है. बसंतराय तालाब को धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ वैज्ञानिक खासियत भी काफी मशहूर है. लोगों का मानना है कि तालाब में स्नान करने से कई प्रकार के चर्म रोग भी ठीक होते हैं. हालांकि वर्तमान समय में तालाब का पानी साफ-सफाई के अभाव में गंदा है. आस्था और श्रद्धा के कारण गंदे पानी में भी आदिवासी समाज से संबंध रखने वाले सफाहोड़ के अनुआई आस्था की डुबकी लगाते हैं.

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