बकाया बिल के लिए 22 दिन तक नवजात बंधक

Updated at : 21 Nov 2017 5:38 AM (IST)
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बकाया बिल के लिए 22 दिन तक नवजात बंधक

मामला . फिर सुर्खियों में एक निजी अस्पताल गोड्डा : एक बार फिर गोड्डा का एक निजी अस्पताल सुर्खियों में है. एक प्रसूता की मौत 22 दिन पहले बच्चे का जन्म देने के बाद हो गयी थी. लेकिन नवजात उसी अस्पताल में बंधक रहा. अस्पताल प्रबंधन ने बच्चे को परिजनों को हैंडओवर इसलिए नहीं किया […]

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मामला . फिर सुर्खियों में एक निजी अस्पताल

गोड्डा : एक बार फिर गोड्डा का एक निजी अस्पताल सुर्खियों में है. एक प्रसूता की मौत 22 दिन पहले बच्चे का जन्म देने के बाद हो गयी थी. लेकिन नवजात उसी अस्पताल में बंधक रहा. अस्पताल प्रबंधन ने बच्चे को परिजनों को हैंडओवर इसलिए नहीं किया क्योंकि परिजनों ने बकाया राशि का भुगतान नहीं किया था. परिजन थक हार कर जिला परिषद उपाध्यक्ष लक्ष्मी चक्रवर्ती के पास गया और नवजात को लेने की इच्छा जाहिर की. जिप उपाध्यक्ष ने पहल कर अस्पताल प्रबंधन से बात की इसके बाद सुंडमारा पंचायत के पीपरजोरिया निवासी चंदर सोरेन को नवजात सौंप दिया गया. पत्नी को खोने का गम चंदन को था
लेकिन नवजात के आने से थोड़ी खुशी लौटी है. बच्चा 22 दिनों से आइसीयू में था. बता दें कि पीपरजोरिया गांव के चंदर सोरेन की पत्नी शुक्रमणी किस्कू 23 अक्तूबर को गोड्डा सदर अस्पताल पहुंचा था. मामला गंभीर देखते हुए वहां के चिकित्सकों ने मरीज को रेफर कर दिया. परिजन शुक्रमणी को लेकर भागलपुर जा रहे थे. इसी बीच किसी एंबुलेंस चालक के बहकावे में आकर उन्होंने महिला को गोड्डा के एक निजी अस्पताल में भरती करा दिया. अस्पताल में नवजात को आॅपरेशन कर बाहर तो निकाल दिया गया. लेकिन प्रसूता की मौत पांच दिनों बाद 28 अक्तूबर को मौत हो गयी. तब से लेकर 20 नवंबर तक नवजात को अस्पताल में ही रखा गया था. बच्चे को संबंधित परिजनों के जिम्मे नहीं सौंपा गया था. जब मामला को लेकर आदिवासी चंदर सोरेन जिप उपाध्यक्षा के पास पहुंचा तो ही मामले का खुलासा हुआ. बात को बढ़ता देख अस्पताल प्रबंधन ने बगैर देरी किये नवजात को परिजनों के जिम्मे सौंप दिया.
अस्पताल प्रबंधन पर परिजनों का आरोप
इधर पूछे जाने पर मृतका के पति चंदर सोरेन ने कहा कि बकाया राशि नहीं दिये जाने के कारण अस्पताल से बच्चा नहीं ले जाने को कहा गया था. चंदर का कहना था कि वह अस्पताल में जहां तहां से कुल 45 हजार रुपये का भुगतान कर चुका था. अब इसके पास पैसे नहीं थे. बीच में वह बच्चा लेने आया था लेकिन अस्पताल में कार्यरत कर्मियों ने यह कहकर लौटा दिया कि बकाये राशि का भुगतान करना होगा. इस पर वह घर लौट गया.
”ऐसा कोई मामला नहीं है. परिजनों को बार-बार फोन से सूचना दी गयी. लेकिन बच्चा लेने कोई नहीं पहुंचा. यदि एक बार भी परिजन यह आकर कह देते कि उनके पास पैसे नहीं हैं तो निश्चित रूप से उक्त बच्चे को परिजनों के जिम्मे सौंप दिया जाता. परिजनों ने ही गलती की है. अस्पताल प्रबंधन की कोई गलती नहीं है. मामले को लेकर जिप उपाध्यक्ष को भी अस्पताल प्रबंधन ने अवगत करा दिया.
-मो लबरेज, प्रबंधक, गोड्डा प्राइवेट अस्पताल.
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