खतरे में कझिया नदी का अस्तित्व

Updated at : 19 Jun 2017 5:00 AM (IST)
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खतरे में कझिया नदी का अस्तित्व

खेती पर संकट. जल स्तर नीचे जाने से परेशान हैं जिले के किसान पिछले चार व पांच वर्षों से लगातार बालू के उठाव से नदी का जल स्तर नीचे गिर गया है. किसानों की लाइफ लाइन कहे जानेवाली कझिया नदी अब दाड़ की शक्ल में दिख रही है. पहले 15 जून के बाद किसान धान […]

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खेती पर संकट. जल स्तर नीचे जाने से परेशान हैं जिले के किसान

पिछले चार व पांच वर्षों से लगातार बालू के उठाव से नदी का जल स्तर नीचे गिर गया है. किसानों की लाइफ लाइन कहे जानेवाली कझिया नदी अब दाड़ की शक्ल में दिख रही है. पहले 15 जून के बाद किसान धान के बिचड़ा का पटवन नदी से करते थे. अब खासे परेशान हैं.
गोड्डा : जिले की लाइफ लाइन माने जाने वाली कझिया नदी का दोहन हाल के वर्षों में जितना हुआ है. वह किसी से छिपा नहीं है. जिस प्रकार से कझिया को हाल के वर्षों में बरबाद करने में तत्परता दिखी है, उसे बचाने में कम ही दिखी है. जैसे- तैसे जिले की लाइफ लाइन कझिया नदी भगवान भरोसे है. यहां तक की वैसे लोगों ने भी इसे बरबाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जो कझिया को बचाने के पैरोकार रहे हैं.
आज कझिया पहली वाली कझिया नहीं रह गयी है. यह इसलिए कि कझिया आसपास के गांव के लिये भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी. जितने गांवों से होकर कझिया नदी गुजरती है उस पंचायत के आधे दर्जन गांव के लिये यह अमृत थी. लेकिन इसके उलट आज जो कझिया की हालत दयनीय हो गयी है.
दांड़ तक पानी पहुंचना हुआ दूभर
बाकी बची खुची कसर इंट भट्ठा संचालकों ने कर दी है. बालू का स्तर नीचे जाने से नदी का स्तर भी नीचे चला गया. इसके कारण दांड़ तक पानी पहुंचना अत्यंत ही दूभर हो गया. तब कझिया नदी से सटे ईंट भट्ठे का कारोबार करने वाले की चांदी हो गयी. इन्होंने नदी में घुस कर ही ईंट बनाना शुरू किया. यहां तक की नदियों से सटे छोटे, मंझोले व बड़े दांड़ो को भी नेस्तनाबूद कर दिया. जेसीबी से दांड़ आदि को तोड़ दिया. पहले जहां दांड़ होते थे आज वहीं बड़े- बड़े गड्ढे हो गये हैं. अब तो इन रजदांड़ों को पुनजीर्वित करना भी दुष्कर कार्य है. हालात पर किसानों में खासा आक्रोश देखा जा रहा है. प्रभावित किसान आंदोलन करने के मूड में दिख रहे हैं.
क्या कहते हैं ग्रामीण
”ईंट भट्ठा के संचालकों ने रजदांड़ के पूरे कांसेप्ट को ही बरबाद कर दिया है. देखने वाला भी कोई नहीं रहा. पहले हजारों बीघे की पटवन होती थी. अब एक बीघा के पटवन का प्राकृतिक स्रोत नहीं रहा.”
-राजू सिंह, ग्रामीण
पुराने दांड़ लगभग समाप्त हो गये हैं. पहले बालू के ठेकेदारों ने बरबाद किया, फिर ईंट भट्ठा के संचालकों ने पूरे सिस्टम को बरबाद कर दिया है. पूरे किसानी व्यवस्था को चौपट करने काम किया गया है.”
-अवधेश सिंह, उपमुखिया, नेपुरा
खरीफ के पटवन में आयेगी समस्या
पहले कझिया में बालू की कमी नहीं थी. बारिश के समय में बारिश होने पर कझिया में पानी का स्तर मेंटेन रहता था. पुराने कई रजदांड़ कझिया से थे. जमनी पहाड़पुर के गांव, बेलारी, कन्हवारा पंचायत के कई गांव मसलन हरिपुर,परसा आदि कई गांव के खेतों में तो कझिया से खरीफ की फसल तैयार हो जाती थी. पटवन के लिये किसान चिंतित नहीं रहते थे. आसानी से पटवन का काम हो जाता था. गत चार से पांच सालों में बालू के खनन से नदी का जलस्तर नीचे गिर गया है. इससे पटवन में दिक्कत हो गयी है. वहीं नदी से सटे रजदांड़ व छोटे- छोटे दांड़ जो नदी से निकलने वाली पानी को लेकर खेतों तक पहुंचाये जाने का काम करते थे आज पुर्णरूप से बंद हो गया है. इसलिए किसानों की चिंता भी जायज है. किसान बालू उठाव पर रोक लगाने को लेकर हंगामा तो करते हैं लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है.
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