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Giridih News: नेताजी चौक के पास ट्रक की चपेट में आने से युवक की मौत, परिवार में मचा कोहराम

Giridih News: शहरी क्षेत्र के व्यस्तम इलाके नेता जी चौक के समीप सोमवार की देर रात एक दर्दनाक सड़क हादसे में पचंबा थाना क्षेत्र के अलकापुरी निवासी 28 वर्षीय रोहित सिंह राठौड़ की मौके पर ही मौत हो गयी. हादसे की सूचना मिलते ही मृतक के घर में कोहराम मचा हुआ है.

रोहित परिवार का इकलौता कमाऊ सदस्य था, वहीं फ़रवरी माह में उसकी शादी भी होनी थी. अचानक मौत से परिजन सदमे में हैं. मिली जानकारी के अनुसार सोमवार की देर रात शहर के झंडा मैदान में चल रहे सांसद खेल महोत्सव में रोहित अपने दोस्तों के साथ मैच देखने पहुंचा था. देर रात वह मैच देखने के बाद करीब 10:30 बजे बाइक से घर लौट रहा था. इसी दौरान नेता जी चौक के पास एक तेज रफ्तार ट्रक ने उसे अपनी चपेट में ले लिया. प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक ट्रक की टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि रोहित ट्रक के साथ काफी दूर तक घसीटता चला गया जिससे वह बुरी तरह घायल हो गया. हादसे के बाद आसपास के लोग मौके पर दौड़े और गंभीर अवस्था में उसे लेकर सदर अस्पताल पहुंचे, लेकिन चिकित्सकों ने जांच के बाद रोहित को मृत घोषित कर दिया. रोहित की मौत की खबर मिलते ही उसके घर में चीख-पुकार मच गई. उसके परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है. घटना के बाद ट्रक चालक मौके से फरार हो गया. घटना की जानकारी मिलते ही नगर थाना पुलिस मौके पर पहुंची और मामले की जांच में जुट गई है.

आक्रोशित लोगों ने सड़क किया जाम, तीन घंटे तक थमा रहा यातायात

रोहित की मौत की पुष्टि होने के बाद गुस्से से भर उठे परिजन और स्थानीय लोग उसके शव को लेकर नेता जी चौक के पास घटनास्थल पर पहुंच गए. रोहित के शव को बीच सड़क पर रखकर लोगों ने आवागमन पूरी तरह रोक दिया और ट्रक चालक की गिरफ्तारी तथा मुआवजे की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू कर दिया. इस दौरान तीन घंटे तक जाम रहा. देखते ही देखते मौके पर भारी भीड़ जुट गयी और पूरा इलाका तनावपूर्ण माहौल में बदल गया. घटना की सूचना मिलते ही नगर थाना प्रभारी ज्ञान रंजन कुमार मौके पर पहुंचे और लोगों को शांत कराने का प्रयास किया, लेकिन आक्रोशित लोग अपनी मांगों पर अड़े रहे. इसके बाद सदर एसडीपीओ जीतवाहन उराँव, प्रभारी यातायात डीएसपी कौशर अली, पचंबा इंस्पेक्टर मंटू कुमार, पचंबा थाना प्रभारी राजीव कुमार और मुफस्सिल थाना के एसआई संजय कुमार भी मौके पर पहुंचे. अधिकारियों की कोशिशों के बावजूद लोगों ने जाम नहीं हटाया और नो एंट्री खुलने के बाद ट्रकों की रफ्तार पर नियंत्रण, साथ ही आरोपी चालक की तत्काल गिरफ्तारी की मांग पर डटे रहे. स्थिति को देखते हुए सदर सीओ जितेंद्र प्रसाद भी मौके पर पहुंचे. उन्होंने सरकारी प्रावधानों के तहत परिजनों को तत्काल सहायता राशि प्रदान की और प्रशासन की ओर से आश्वासन दिया कि आरोपी ट्रक चालक को जल्द गिरफ्तार कर कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

आश्वासन के बाद सड़क से हटे लोग

प्रशासनिक आश्वासन के बाद ही लोगों का गुस्सा शांत हुआ और करीब तीन घंटे बाद जाम हटाया जा सका. सड़क जाम के कारण दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गयी थीं. अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती कर स्थिति को नियंत्रित रखा गया. जाम हटने के बाद यातायात धीरे-धीरे सामान्य हो पाया. जाम हटने के बाद रोहित के शव को पोस्टमार्टम के लिए सदर अस्पताल भेजा गया. मंगलवार को पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद शव को परिजनों को सौंप दिया गया.

स्पीड सीमा तय नही होने से बढ़ रहा हादसों का खतरा, नो एंट्री खुलते ही बेकाबू रफ्तार पर दौड़ने लगती हैं भारी गाड़ियां

शहरी क्षेत्र में हर रात नौ बजे नो एंट्री खुलते ही भारी वाहनों का परिचालन शुरू हो जाता है. लेकिन तमाम नियमों और सुरक्षा मानकों के बावजूद इन वाहनों के लिए शहर में कोई तय गति सीमा निर्धारित नहीं होने से स्थिति लगातार खतरनाक होती जा रही है. रात के समय जब शहर की सड़कें अपेक्षाकृत खाली रहती हैं, तब यह गाड़ियां इस तरह दौड़ती हैं मानो सड़कें इनकी रेस ट्रैक हों. तेज रफ्तार के कारण कई बार ऐसा भयावह दृश्य देखने को मिलता है कि राहगीरों की सांसें थम जाती हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि नो एंट्री खुलने के बाद बड़ी गाड़ियों की स्पीड इतनी अधिक हो जाती है कि आम लोगों, बाइक सवारों और पैदल यात्रियों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है. कई बार तेज रफ्तार के कारण हादसे भी हुए हैं, जिनमें लोग घायल तक हुए. कुछ घटनाएँ तो इतनी गंभीर रहीं कि लोगों ने अपनी जान तक गंवा दी. इसके बावजूद भारी वाहनों की रफ्तार नियंत्रित करने की दिशा में कोई ठोस कदम अब तक नहीं उठाया गया. शहर के बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक कई बार प्रशासन के समक्ष यह मुद्दा उठा चुके हैं कि रात के समय भारी वाहनों की आवाजाही पर स्पीड लिमिट तय की जाए. विशेषकर नेताजी चौक, बरगंडा मोड़, झंडा मैदान, पचंबा रोड, टुंडी रोड, बड़ा चौक, पदम चौक और शहर के भीड़-भाड़ वाले हिस्सों में रफ्तार कम से कम नियंत्रित हो. लेकिन लोगों की यह मांग वर्षों से केवल फाइलों और बैठकों तक सीमित रह गई है. नो एंट्री खुलने के बाद ट्रकों और हाईवा जैसी भारी गाड़ियों की रफ्तार पर नकेल कसने के लिए न तो स्पीड गन का इस्तेमाल होता है, न ही फिक्स्ड स्पीड ब्रेकर या चेतावनी संकेत लगाए गए हैं. रात के समय ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी भी नहीं होती है, जिससे चालक बेतहाशा गति से वाहन चलाने में खुद को स्वतंत्र महसूस करते हैं. प्रशासन की यही लापरवाही कई हादसों का कारण बन रही है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि शहर में रात के समय भारी वाहनों के लिए स्पष्ट गति सीमा तय कर पुलिस गश्त बढ़ाई जाए, तो हादसों पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है. इसके अलावा मुख्य मार्गों पर स्पीड डिस्प्ले बोर्ड और चेतावनी संकेत लगाने की भी जरूरत है.

तय रूट के अभाव में रात में शहर से धड़ल्ले से गुजरते भारी वाहन

रात में नो एंट्री खुलते ही गिरिडीह शहर की सड़कों पर अचानक भारी वाहनों की आवाजाही तेज़ हो जाती है. प्रशासन ने अब तक इन वाहनों के लिए कोई तय रूट निर्धारित नहीं किया है, जिसके कारण ट्रक, ट्रेलर, हाइवा और बड़े कंटेनर सीधे शहर के बीचों-बीच से दौड़ते हैं. यह स्थिति न केवल यातायात व्यवस्था को बिगाड़ती है, बल्कि सड़क सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा बन चुकी है. रात के समय जब स्थानीय लोग कम सतर्क रहते हैं और कई जगह स्ट्रीट लाइट भी ठीक से नहीं जलती, ऐसे में तेज रफ़्तार से गुजरने वाले ट्रकों के कारण हादसे की आशंका कई गुना बढ़ जाती है. बेंगाबाद रोड से पचंबा की ओर जाने वाले बायपास का निर्माण इसी उद्देश्य से किया गया था कि भारी वाहन शहर को छूए बिना अपनी मंजिल तक पहुंच जाएं. लेकिन बायपास सड़क की स्थिति वर्षों से इतनी जर्जर हो चुकी है कि चालक इस मार्ग पर चलने से कतराते हैं. बड़े-बड़े गड्ढे और साइड टूटे हुए किनारे के कारण यह सड़क भारी वाहनों के लिए बेहद जोखिम भरी हो गई है. इसी वजह से अधिकांश चालक शहर के मुख्य मार्ग को ही सुरक्षित विकल्प मानकर उसी से गुजरते हैं. इसका सीधा प्रभाव शहर की ट्रैफिक व्यवस्था पर पड़ रहा है. रात में भारी वाहनों के गुजरने से कई बार जाम की स्थिति भी बन जाती है, वहीं लोगों की जाम पर भी खतरा बन जाता है. इसी तरह टुंडी रोड की ओर से गांडेय और बेंगाबाद के वाहनों के लिए भी एक वैकल्पिक बायपास मौजूद है, लेकिन वह भी केवल कागज़ पर ही संचालित माना जा रहा है. न तो वहां संकेत बोर्ड लगाए गए हैं और ना ही प्रशासन की ओर से किसी तरह की निगरानी होती है. भारी वाहन चालक बिना किसी रोक-टोक के अपने हिसाब से शहरी मार्ग चुन लेते हैं. परिणामस्वरूप रात के समय शहर की घनी आबादी वाले इलाकों से भारी वाहन धड़ल्ले से गुजरते हैं, जिससे आम लोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. कई बार स्थानीय लोग शिकायत लेकर अधिकारियों तक पहुंचे, लेकिन तय रूट तय करने और लागू करवाने की दिशा में अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है. स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर प्रशासन पहले ही तय रूट निर्धारित कर देता और बायपास सड़कों की नियमित मरम्मत करवा देता, तो भारी वाहनों को शहरी मार्ग से होकर जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. रात के समय तेज रफ़्तार में गुजरने वाले इन वाहनों के कारण होने वाले हादसों पर भी काफी हद तक रोक लग सकती थी.

अन्य राज्यों के वाहनों से करते हैं वसूली, शहर की यातायात समस्या पर ट्रैफिक पुलिस की नहीं है नजर

गिरिडीह शहरी क्षेत्र में ट्रैफिक व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए जगह-जगह ट्रैफिक पोस्ट तो बना दिए गए हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल उलट है. अधिकांश ट्रैफिक पोस्ट कागज़ पर सक्रिय दिखते हैं, जबकि ज़मीनी हकीकत में यह महज शोपीस बनकर रह गए हैं. कई महत्वपूर्ण चौक-चौराहों पर दिनभर भारी भीड़ रहती है, लेकिन वहां तैनात ट्रैफिक पुलिस कर्मियों का कहीं अता-पता नहीं होता. स्थानीय लोग बताते हैं कि कई बार घंटों तक जाम की स्थिति बनी रहती है, फिर भी ट्रैफिक पुलिस मौके पर नजर नहीं आती. जहाँ पुलिस कर्मी तैनात होते भी हैं, वहाँ स्थिति और भी चिंताजनक है. कई ट्रैफिक जवान पोस्ट पर मौजूद जरूर रहते हैं, लेकिन वे सड़क पर उतरकर यातायात नियंत्रित करने के बजाय पोस्ट के अंदर बैठकर घंटों मोबाइल फोन में ही व्यस्त रहते हैं. शहर की मुख्य सड़कों पर बढ़ती भीड़, स्कूल बसों का दबाव, बाजार की रौनक और भारी वाहनों के दबाव के बावजूद ट्रैफिक पुलिस की यह लचर स्थिति आम लोगों को परेशानी में डाल रही है. इसके साथ ही एक और गंभीर आरोप स्थानीय लोगों की ओर से लगाया जा रहा है. उनका कहना है कि ट्रैफिक पुलिस की निगाहें अक्सर शहर की यातायात समस्या पर नहीं, बल्कि अन्य राज्यों के वाहनों पर रहती हैं. जैसे ही झारखंड के बाहर का कोई वाहन शहर में प्रवेश करता है, तुरंत ट्रैफिक पुलिस सक्रिय हो जाती है. वाहन का कागज़, परमिट, रूट या अन्य तकनीकी बातें बताकर उनसे वसूली का खेल शुरू हो जाता है. कई वाहन मालिकों ने बताया कि इस तरह की वसूली के डर से वे गिरिडीह होकर गुजरने से भी बचते हैं. इन सबके बीच शहरवासियों का कहना है कि यदि ट्रैफिक पुलिस अपनी वास्तविक भूमिका निभाए और चौक-चौराहों पर सक्रियता से तैनात रहे, तो शहर की अधिकांश यातायात समस्याएँ काफी हद तक कम हो सकती हैं. लेकिन जब तैनाती केवल कागज़ों में हो और ज़मीनी स्तर पर ढिलाई बनी रहे, तब शहर जाम, दुर्घटना और अव्यवस्था का शिकार होना लाज़मी है.

फोरलेन सड़क पर डिवाइडर नदारद, गिरिडीह में हर मोड़ पर मंडरा रहा हादसे का खतरा

गिरिडीह-पचंबा फोरलेन सड़क का निर्माण कार्य भले ही तेजी से चल रहा हो, लेकिन इसकी अधूरी संरचना लोगों के लिए लगातार खतरा बनती जा रही है. खासकर चौक-चौराहों पर डिवाइडर की कमी सबसे बड़ी समस्या बनकर सामने आई है. जहां भी फोरलेन सड़क शहर से होकर गुजरती है, वहां कई स्थानों पर सड़क के बीचों-बीच डिवाइडर का निर्माण ही नहीं किया गया है. ऐसे में बाइक, कार, स्कूटी या भारी वाहन—कोई भी बिना दूसरी ओर से आ रहे वाहनों को देखे अचानक सड़क पार कर जाता है. इससे हर पल किसी बड़े हादसे की आशंका बनी रहती है. स्थानीय लोग बताते हैं कि चौक चौराहे पर डिवाइडर नहीं होने के वजह से सड़क कई बार जानलेवा साबित हो चुकी है. ट्रैफिक का दबाव अधिक होने के कारण कई बार सामने से आ रहे वाहन को देखने का मौका भी नहीं मिलता और टक्कर की स्थिति बन जाती है. यह स्थिति साफ तौर पर निर्माण एजेंसी की लापरवाही और प्रशासन की उदासीनता को उजागर करती है. सड़क को चौड़ा जरूर किया गया है, लेकिन सुरक्षा मानकों की अनदेखी लोगों की जान पर भारी पड़ रही है. अन्य जिलों में फोरलेन सड़कों पर हर चौक-चौराहे पर मजबूत डिवाइडर दिया गया है, जिससे लोग निर्धारित जगहों से ही सड़क पार करते हैं. वहां कुछ दूरी तय करनी पड़ती है, लेकिन जीवन सुरक्षित रहता है. गिरिडीह में ठीक उलट स्थिति देखने को मिल रही है. यहां वाहन चालक शॉर्टकट के चक्कर में सड़क पर सीधे घुस जाते हैं और बिना किसी रोक-टोक के दूसरी ओर निकल जाते हैं. लोगों का कहना है कि यदि हर चौराहे पर डिवाइडर का निर्माण किया जाए और उचित यू-टर्न बनाए जाएं, तो न केवल हादसों में कमी आएगी बल्कि यातायात व्यवस्था भी सुचारू होगी. फिलहाल स्थिति यह है कि फोरलेन का लाभ मिलने के बजाय लोग डरे-सहमे इस सड़क पर सफर करने को मजबूर हैं, क्योंकि उन्हें हर पल हादसे की चिंता सताती रहती है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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