यहां सालों भर काफी संख्या श्रद्धालु पहुंचते हैं. झारखंडी बाबा के पास सामान्य दिनों से कहीं अधिक नये साल के मौके पर लोगों की भीड़ उमड़ती है. धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से झारखंडधाम में एक भी दिन ऐसा नहीं है, जिस दिन लोग भगवान शंकर का दर्शन करने यहां ना पहुंचे हों.
दूसरे राज्यों से भी आते हैं लोग
झारखंड के अलावा बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाग, छत्तीसगढ़ समेत अन्य राज्यों से भी लोग पूजा करने यहां आते हैं. मान्यता है कि झारखंडधाम में श्रद्धालुओं की सभी मनोकामना पूर्ण होती है. मनोकामना पूरी होने पर लोग अपनी क्षमतानुसार दान देते हैं.
महाभारत काल से जुड़ा है इतिहास
जानकार बताते हैं कि झारखंडधाम का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है. मान्यता है कि महाभारत युद्ध के दौरान भगवान शिव ने अर्जुन को इसी स्थान पर पाशुपतास्त्र दिया था. उस दौरान यहां घने जंगल के बीच स्वयंभू शिवलिंग की उत्पत्ति हुई, तब से यहां पूजा शुरू हुई. श्रद्धालुओं की आस्था बढ़ी तो राजधनवार के राजा ने मंदिर व शिवालय के लिए 14.20 एकड़ डिसमिल जमीन दान में दी. खतियान में भी यह जमीन महादेव स्थान के नाम पर दर्ज है. सालों भर शर्द्धालुओं का तांता यहां लगा रहता है. इस पवित्र शिवनगरी में सैकड़ों लोग फलाहार पर रहते हैं और मनोकामना पूर्ण होने पर ही घर जाकर वे अन्न ग्रहण करते हैं.
छत विहीन है प्रधान मंदिर
यहां का प्रधान छत विहीन शिवमंदिर भक्तों को मुग्ध करता है. झारखंडधाम की सुंदरता भी लोगों को आकर्षित करता है. घने जंगल, छोटे पहाड़ और नदियां झारखंडधाम के सौंदर्य और बढ़ाता है. लोग यहां पूजा के साथ पिकनिक भी मनाते हैं. यह तीर्थस्थल तीन प्रखंडों जमुआ, राजधनवार न बिरनी की सीमा पर बसा है. सभी प्रखंडों की दूरी यहां से 20 किमी है.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

