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श्रद्धा और सांस्कृतिक विरासत का संगम है जुड़वानीय शिव मंदिर

Updated at : 13 Jul 2025 10:12 PM (IST)
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श्रद्धा और सांस्कृतिक विरासत का संगम है जुड़वानीय शिव मंदिर

गढ़वा शहर से सटे करमडीह गांव में स्थित जुड़वानीय शिव मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का प्राचीन प्रतीक है

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जितेंद्र सिंह, गढ़वा

गढ़वा शहर से सटे करमडीह गांव में स्थित जुड़वानीय शिव मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का प्राचीन प्रतीक है, बल्कि यह सामाजिक एकता, सांस्कृतिक धरोहर और सामूहिक सहयोग का एक जीवंत उदाहरण भी बन गया है. लगभग 150 वर्षों से अधिक पुराना यह मंदिर सावन के महीने में अपनी भक्ति, भाव और भव्यता के लिए प्रसिद्ध है. दूर-दराज़ के गांवों और शहरी इलाकों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां भगवान शिव के दर्शन और जलाभिषेक के लिए जुटते हैं.इस मंदिर का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही प्रेरणादायक इसका नव निर्माण भी रहा है. वर्षों पहले जब मंदिर की संरचना जर्जर हो चुकी थी और उसका गर्भगृह क्षतिग्रस्त होने लगा, तब स्थानीय लोगों और मंदिर समिति ने मिलकर इसके पुनर्निर्माण की ठानी. आठ साल पहले समिति ने संकल्प लिया और सीमित संसाधनों के बावजूद मंदिर के जीर्णोद्धार की शुरुआत की. आज यह मंदिर करीब 51 फीट ऊंचाई के गुंबद के साथ श्रद्धालुओं के लिए एक अलौकिक अनुभूति का केंद्र बन चुका है.

मंदिर के लिए गांव के दो सगे भाइयों ने दी जमीन

इस भव्य निर्माण में करमडीह गांव के दो भाइयों—लालबिहारी महतो उर्फ गुरुजी और उनके छोटे भाई संजय महतो की भूमिका उल्लेखनीय रही. दोनों भाइयों ने मंदिर निर्माण के लिए अपनी भूमि निःस्वार्थ भाव से दान में दी. गुरुजी बताते हैं कि उनके पिता ने गांव में स्कूल निर्माण के लिए ज़मीन दान की थी, उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने यह कदम उठाया. संजय महतो ने भी अपने हिस्से की भूमि मंदिर के नाम कर दी और बताया कि वे जुड़वानीय शिव के परम भक्त हैं. यह त्याग और समर्पण न केवल श्रद्धा का परिचायक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जब समाज अपने सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने के लिए एकजुट होता है, तो असंभव भी संभव हो जाता है.

सावन में होता है विशेष धार्मिक आयोजन

दानरो नदी के तट पर स्थित जुड़वनिया शिव मंदिर में सावन के पवित्र महीने में हर सोमवार को मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं. शिवभक्तों द्वारा रुद्राभिषेक, शिव श्रृंगार, मंत्रोच्चारण और भजन-कीर्तन के माध्यम से पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण से गूंज उठता है. श्रद्धालु गंगाजल, दूध, दही, शहद, और बेलपत्र अर्पित कर भगवान भोलेनाथ से परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं.श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर परिसर में पेयजल की व्यवस्था, स्वच्छता, बैठने की जगह और सजावटी पौधों की सुंदर शृंखला बनायी गयी है. मंदिर के चारों ओर बरगद, पाकड़ और आम जैसे विशाल छायादार पेड़ लगे हैं, जो तपती धूप में भी भक्तों को शीतलता प्रदान करते हैं. वहीं मंदिर से सटी कल-कल बहती दानरो नदी इसकी सुंदरता को और भी निखार देती है.

मंदिर व परिसर में अन्य देवी देवता भी हैं विराजमान

मंदिर परिसर में भगवान श्रीराम, माता जानकी, लक्ष्मण, श्री गणेश, पंचमुखी हनुमान, शीतला माता और शनिदेव की प्रतिमाएं भी स्थापित की गयी हैं, जिससे श्रद्धालु एक ही स्थान पर समस्त देवी-देवताओं की पूजा कर पाते हैं.आज जुड़वानीय शिव मंदिर न केवल एक पूजा स्थल है, बल्कि यह स्थानीय समुदाय की पहचान, गौरव और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक बन चुका है. मंदिर समिति लगातार श्रद्धालुओं की सुविधाओं का ध्यान रखती है और सावन में विशेष तौर पर सजावट व भक्तिपूर्ण आयोजन कराती है. यह मंदिर एक सशक्त संदेश देता है कि जब धार्मिक आस्था, सामाजिक सहयोग और सांस्कृतिक विरासत एक साथ कदम से कदम मिलाते हैं, तो एक साधारण स्थल भी असाधारण प्रेरणा बन सकता है. जुड़वनीय शिव मंदिर वास्तव में गढ़वा जिले की आत्मा और संस्कृति का अमूल्य रत्न है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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